संस्करण: 09मार्च-2009

भाजपायी हिंदुत्व के मायने
 

 


महेश बाग़ी

कुछ समय पहले जब अमरनाथ मामला गहरा गया था, तब भाजपा ने इसे चुनावी मुद्दा बनाने का ऐलान किया था। उसके अनुवांशिक संगठन विश्व हिंदू परिषद ने इस मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी चक्काजाम किया था, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ-साथ भाजपा ने भी खुलकर भाग लिया था। लेकिन जब केंद्र की पहल पर अमरनाथ श्राइन बोर्ड को ज़मीन देने का मामला सुलझा लिया गया, तब भाजपा के हाथ निराशा ही लगी थी, क्योंकि हिंदुओं को भरमाने का एक हथियार उसके हाथ से निकल गया था। भाजपा जानती है कि सत्ता पर सवारी करने के लिए हिंदू मतों का धारवीकरण ज़रूरी है और इसी के बल पर वह तीन बार (तेरह दिन, तेरह माह और पांच साल) केंद्रीय सत्ता का सुख भोग चुकी है। इसलिए अब होने वाले आम चुनाव के लिए उसे फिर हिंदुत्व की याद आई है और एक बार फिर राम मंदिर मुद्दा भाजपा ने आगे कर दिया है। केंद्र में तीन-तीन बार सरकार रहने के बावजूद भाजपा राम मंदिर निर्माण की बुनियाद में एक पत्थर तक नहीं डाल सकी। उसकी सफाई थी कि हम बहुमत में नहीं हैं और सहयोगी दल ऐसा होने नहीं दे रहे हैं। भाजपा एनडीए के सहयोगी दलों के साथ फिर चुनावी समर में उतरने जा रही है और उसका एक भी सहयोगी दल राम मंदिर का हिमायती नहीं है। ऐसे में मंदिर मुद्दा फिर से उठाकर भाजपा फिर हिंदू वोटों की फसल बाट कर सत्ता हथियाना चाहती है।

वैसे भाजपा खुद को दक्षिणपंथी मानती है और हिंदुत्व का राग अलापती रहती है, लेकिन असल में हिंदुत्व उसके लिए सत्ता पाने का एक मुखौटा भर है। सत्ता से बाहर रहो तो हिंदू हित पर टेसुए बहाओ और सत्ता मिलते ही हिंदुत्व को खूंटी पर टांग दो। अगर भूले भटके एनडीए को बहुमत मिल गया और सहयोगी दलों ने फिर अपना असर दिखाया तो सत्ता की ख़ातिर भाजपा फिर हिंदुत्व को खूंटी पर टांगने में देर नहीं करेंगी। हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसके लिए तैयार नहीं होगा, किंतु भाजपा एक क्षण की देर नहीं करेंगी। सत्ता सुख की ही खातिर हिंदूवादी जनसंघ का 'दीपक' बुझाकर जनता पार्टी का दामन थामा गया था और जब सत्ता गई तो जनता पार्टी में से भारतीय जनता पार्टी को पैदा कर दिया गया। भाजपा का यह चरित्र क्या यह सिध्द नहीं करता कि उसके लिए सत्ता सर्वोपरि है, हिंदुत्व नहीं। आपातकाल के दिनों में भी संघी यह कहने से घबराते रहे कि हम हिंदुत्व से पीछें नहीं हटेंगे। कल्पना कीजिए, अगर जनता पार्टी यानी संपूर्ण विपक्ष की पार्टी का प्रयोग सफल रहा होता तो क्या भाजपा अस्तित्व में आ पाती ? नहीं, कभी नहीं, क्योंकि भाजपा को हिंदुत्व की नहीं सत्ता की तलाश है।

भाजपा का रामनामी दुपट्टा सत्ता की हवा मिलते ही उड़ जाता है। हालांकि खुद को अन्य पार्टियों से अलग दिखाने की चाह में भाजपा यह ज़रूर कहती आई कि उसका चाल, चरित्र और चेहरा अलग है,किंतु सत्ता सुंदरी का संगम होते ही वह अपने असली रूप में आ जाती है और हिंदुत्व का मुद्दा तिरोहित हो जाता है। एक समय था, जब भाजपा के साथ अन्य दल अछूत जैसा व्यवहार करते थे, लेकिन बदलते राजनीतिक परिदृश्य के चलते चंद छोटे दल भाजपा को सत्ता का खेवनहार मानने लगे हैं और इन्हीं के भरोसे वह केंद्र में काबिज़ भी हो चुकी है। पर अब परिस्थितियां पहले जैसी नहीं रही हैं। भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए में कभी चौबीस दल हुआ करते थे, आज चौदह भी नहीं हैं। फिर भी उसके प्रतिक्षारत प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी मुंह धाऐ बैठे हैं कि अबकी बार उनका नंबर लग ही जाएगा। जिस भाजपा के नख-शिख-दंत कभी राक्षस की तरह होते थे, सत्ता मिलते ही उन्हें पोटली में बांधाकर पेटी में रख लिया गया और शाकाहारियों की जमात के साथ सत्ता सुख भोगा गया। अब सत्ता पाने की खातिर भाजपा फिर अपने राक्षसी नख-शिख-दंत के साथ सामने हैं और कोई शक नहीं कि सत्ता मिलते ही वह फिर शाकाहारी हो जाएगी और उसके हिंदू समर्थक टापते रह जाएंगे। जब गोविंदाचार्य ने अटलबिहारी वाजपेयी को भाजपा का उदारवादी मुखौटा कहा था तो उस पर संघ और उसके चट्टे-बट्टे संगठनों को ज़रा भी बुरा नहीं लगा था, क्योंकि तब यही मुखौटा सहयोगी दलों को आश्वस्त कर रहा था कि हिंदू कट्टरवाद नहीं पनपेगा यह ठीक वैसा ही है कि कुत्ते को हड्डी का टुकड़ा मिले तो गुर्राहट ग़ायब और टुकड़ा खत्म होते ही गुर्राहट शुरू। भाजपा के लिए कल्याणसिंह से बढ़कर कोई दूसरा हिंदूवादी नेता नहीं हुआ, जिसने अपनी सरकार की बलि चढ़ा कर बाबरी मस्जिद का विधवंस किया। आज वहीं कल्याणसिंह अपने धार विरोधी मुलायम सिंह यादव की छत्र-छाया में बैठकर लाल टोपी धाारण किए हुए हैं। हिंदुत्व के ज्वार को उफनाने के लिए भाजपा ने देश की समरसता को भी दांव पर लगाने से परहेज़ नहीं किया था। आज वहीं ज्वार उफनाने वाला भाजपा के साथ नहीं है। भाजपा की दूसरी दिक्कत यह है कि उसने जिस आडवाणी के गले में रामनामी दुपट्टा डाला है, उसकी विश्वसनीयता सहयोगी दलों की दृष्टि में संदिग्धा है। अपनी कट्टरवादी छवि पर पर्दा डालने और उदारवादी दिखाने की गरज से आडवाणी ने पाकिस्तान में जिन्ना की तारीफ के कशीदे गढ़े थे। अब वहीं आडवाणी फिर रामनामी चादर ओढ़ कर वोट मांगने निकल पड़े हैं। यह है भाजपा का 'असली चरित्र और असली चेहरा' यही वजह है कि कट्टरवादी आडवाणी के कारण सहयोगी दल लगातार छिटकते जा रहे हैं। ऐसे में आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश पर सवालिया निशान लग गया है। आडवाणी के साथ दिक्कत यह है कि पार्टी ने भले ही उन्हें अपना भावी प्रधानमंत्री घोषित कर रखा है, लेकिन पार्टी के ही अन्य नेता उन्हें इस रूप में देखने से पहले ही खदबदा उठे हैं। भैरोसिंह शेखावत तो खुल कर ऐलान कर चुके हैं कि वे भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। यद्यपि भाजपा ने उनकी दावेदारी यह कहकर ख़ारिज करने की कोशिश की है कि वे पार्टी के प्राथमिक सदस्य नहीं रह गए हैं। याद रहे कि उप राष्ट्रपति बनने के लिए शेखावत ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दिया था। चूंकि वे शीर्ष पद पद रह चुके थे, इसलिए भाजपा ने उन्हें दोबारा अपना सदस्य बनाना ज़रूरी नहीं समझा, मगर इससे तो शेखावत की आकांक्षा मर नहीं सकती। इसलिए वे भी मुकाबले को तैयार हैं। आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने की राह में नरेंद्र मोदी भी बड़े स्पीड ब्रेकर दिखाई दे रहे हैं। हालांकि मोदी बार-बार यह कह चुके हैं कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं, किंतु मीडिया ने उन्हें भी प्रतिद्वंद्विता का परचम थमा दिया है। विभिन्न एजेंसियों द्वारा किए गए जनमत सर्वेक्षण में आडवाणी की अपेक्षा मोदी को अधिक मत मिलेन से भी आडवाणी को अपना सपना पूरा होता नज़र नहीं आ रहा है। यह तो ठीक वहीं स्थिति हो गई है कि न सूत, न कपास और जुलाहों में जबरन की लट्मलट्ठा। बेचारे आडवाणी की हालत वैसे ही दुबले ऊपर से दो-दो आषाढ़ जैसी थी, उस पर शेखावत और मोदी नामक ग्रहण और लग गए। ऐसे में काठ की हांडी दोबारा चूल्हे पर चढ़ती दिखाई नहीं दे रही है। भाजपा-संघ लाख कोशिश कर ले, पर आडवाणी का प्रधानमंत्री बनना आसान नहीं है। भाजपा भले ही अपने मुखौटे बदल-बदल कर हिंदुत्व को भुनाना चाहे, पर अब उसका यह हथियार भोथरा हो चुका है और हिंदूवादी वोटों की फसल काटना उसके लिए लोहे के चने चबाने जैसा है।


 

महेश बाग़ी