संस्करण: 09मार्च-2009

कोयले पर केंद्र्र सरकार से टकराव का निंदनीय प्रयास

 

एल.एस.हरदेनिया

ध्यप्रदेश के इतिहास में पांच बार ऐसे अवसर आए हैं जब केन्द्र और राज्य में पृथक-पृथक पार्टियों की सरकारें सतारूढ़ रही हैं। इस तरह के अवसर सन् 1969 से 1972, 1990 से 1992, 1996 से 2003, 2004 से 2008, और अब 2008 दिसंबर से आज तक आए हैं। इन सभी अवधियों में केन्द्र व राज्य के संबंध में तनाव के अवसर तो आए, परन्तु कभी भी सड़क पर विरोधा करने की नौबत नहीं आई ।

इस बार केन्द्र व राज्य के बीच तनाव ने आंदोलन का रूप ले लिया है। इस समय संपूर्ण मधयप्रदेश में बिजली की कमी महसूस की जा रही है। बिजली के अभाव के साथ-साथ पानी के लिए भी हाहाकार मचा हुआ है। बिजली की कमी के कारण पानी का संकट और गंभीर हो जाता है क्योंकि सभी नगरों और बड़ी संख्या में गांवों में भी बिजली की कमी के कारण पानी की आपूर्ति में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है।

2003 में भारतीय जनता पार्टी पानी, बिजली और सड़क की दुर्दशा से आक्रोशित जनता का झुकाव अपनी ओर करने में सफल रही थी। यही झुकाव बाद में मतों में परिवर्तित हो गया। 2003 में सत्ता में आने के बाद भाजपा की सरकार ने सड़कों की स्थिति में तो सुधा]र किया परन्तु पानी और बिजली के मामले में स्थिति यथावत बनी रही। कहीं-कहीं तो स्थिति और भी बदतर हुई। इस असफलता को छुपाने के लिए कोई न कोई बहाना चाहिए। भाजपा के नेतृत्व ने इस बुनियादी तत्व को समझने से इंकार किया कि हम आज एक ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं जब बिजली की स्थिति में सुधार एक अत्यधिक कठिन काम हो गया है। यदि यह तथ्य राजनीतिक पार्टियां आम लोगों को समझा देतीं तो बिजली का अभाव होने पर भी वे आक्रोशित नहीं होते और स्थिति से समझौता कर लेते। इस समय भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान उल्टे बिजली की कमी के लिए केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। वे यह दावा कर रहे हैं कि बिजली की कमी इसलिए है क्योंकि भारत सरकार हमारी आवश्यकतानुसार कोयला नहीं दे रही है। अपने पक्ष को जनता के समक्ष रखने के लिए राज्य सरकार ने विज्ञापन प्रकाशित करवाए। विज्ञापनों में दावा किया गया कि वर्ष 2002-03 में 122.4 लाख मीट्रिक टन कोयले का प्रदाय किया गया और वर्ष 2007-08 में 120.2 लाख मीट्रिक टन कोयले का प्रदाय किया गया जबकि इस बीच राज्य में नए बिजलीघरों में कोयले की नई मांग सृजित हुई। 1 मार्च 2009 तक राज्य सरकार ने कोयले के 1537 करोड़ के बिल के विरूध्द 1434 करोड़ का भुगतान किया और 10 फरवरी 2009 तक के कोयले के सभी बिलों का भुगतान हो चुका है। केन्द्र सरकार ने बिना कारण केन्द्रीय पूल से आवंटित की जाने वाली बिजली में 382 मेगावाट की कमी की है।

राज्य शासन द्वारा लगाए गए इन आरोपों का उत्तर कोल इंडिया लिमिटेड और कांग्रेस की ओर से दिया गया। यद्यपि प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व ने इस मामले में अपेक्षित सर्तकता नहीं बरती, परंतु उनकी इस कमी की पूर्ति पूर्व मुख्यमंत्री एवं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव श्री दिग्विजय सिंह ने कर दी। भोपाल में एक पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए श्री सिंह ने कहा कि मधयप्रदेश में पिछले पांच सालों में ताप विद्युत गृहों की उत्पादन क्षमता 25 प्रतिशत बढ़ी है, किन्तु अकुशल संचालन के कारण उत्पादन लगभग पांच प्रतिशत घट गया है। विद्युत उत्पादन, वितरण एवं वित्तीय प्रबंधान में अक्षमता के कारण बिजली कंपनियां दीवालिया होने के कगार पर पहुंच गई हैं। प्रदेश सरकार द्वारा किया गया तथाकथित ''कोयला मार्च'' बिजली संकट से जनता का धयान हटाने के लिए किया गया पाखंड मात्र है।

श्री सिंह ने बिजली और पेयजल संकट को लेकर प्रदेश सरकार की जमकर खिंचाई करते हुए कहा कि उज्जैन शहर में आठ दिन में एक बार पानी मिल रहा है, लेकिन सूखा राहत के नाम अभी तक कलेक्टरों को राशि मुहैया नहीं कराई गई है। इन हालातों से कई जिलों की जनता को गुजरना पड़ रहा है। उन्होंनें बिजली संकट के लिए प्रदेश सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में किसानों के लिए ऊर्जित पंप सेटस की संख्या 13.25 लाख थी, जो अब घटकर 11.35 लाख रह गई है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2002-03 में कृषि विद्युत दर मात्र 90 पैसे प्रति यूनिट थी, जिसे अब 2.62 रूपये प्रति यूनिट कर दिया गया है। जबकि औद्योगिक मद में विद्युत दर में कमी की गई है। प्रदेश में विद्युत उत्पादन भी 2003-04 और 2007-08 में 15801 और 15808 मिलियन यूनिट रहा है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार की रूचि अपने संयत्रों को कमजोर कर ज्यादा दरों पर विद्युत क्रय करने में है। इसी कारण 7-8 रूपये प्रति यूनिट बिजली खरीदते हुए एक कंपनी दीवालिया घोषित होने की कगार पर आ गई है। उन्होंने प्रदेश सरकार द्वारा किए गए कोयला सत्याग्रह को पाखंड बताते हुए कहा कि केन्द्र में एनडीए की सरकार राज्य को 111.1 लाख टन कोयला आवंटित करती थी जबकि यूपीए सरकार ने आवश्यकतानुसार यह आवंटन 120.1 लाख टन कर दिया है फिर भी पूरी मात्रा का कोयला न उठाने का कारण मुख्यमंत्री को सोचना चाहिए न कि अपनी अक्षमता को दूसरे पर गलत आरोप लगाकर छिपाना चाहिए।

जो दावा श्री दिग्विजय सिंह ने किया उस की पुष्टि सेन्ट्रल इलेक्ट्रिकसिटी एथारिटी के आंकड़े भी करते हैं। इन आंकड़ों के अनुसार मधयप्रदेश के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जा रहा है। कोयले की कमी का सामना मधयप्रदेश समेत देश के सभी राज्य कर रहे हैं। दिनांक 25 फरवरी 2009 को जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार मधयप्रदेश के अमरकंटक प्लांट के पास 15 दिन का कोयला, संजय गांधी के पास 5 दिन का, सतपुड़ा के पास दो दिन का तथा विधयांचल के पास 6 दिन का कोयला उपलब्धा है। वहीं महाराष्ट्र के बिजली कारखानों के पास 5, 2, 5, 3, 2, 6 एवं 4 दिन के लिए ही कोयला उपलब्धा है। इसी तरह एक अन्य कांग्रेस शासित राज्य हरियाणा के पास 11, 1, और 5 दिन के लिए ही कोयला उपलब्धा था। लगभग इसी तरह के आंकड़े अन्य राज्यों के हैं। एथारिटी के एक प्रवक्ता के अनुसार कोयले की कमी पूरे देश में है तथा किसी के साथ भी भेदभाव नहीं किया जा रहा है।

स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री ने जनमत को केन्द्र सरकार के विरूध्द करने के लिए ही एक तरह का सत्याग्रह किया जिसकी कतई आवश्यकता नहीं थी। इस आंदोलन से केन्द्र व राज्य के रिश्तों में खटास आ गई है।
 

एल.एस.हरदेनिया