संस्करण: 09मार्च-2009

अब बंद हो सकती है :
पूर्व इंजीनियरिंग परीक्षा (P.E.T.)

 

डॉ. गीता गुप्त

केंद्र सरकार विद्यालयों में अधययनरत्, विद्यार्थियों को एक ऐसी सुविधा देने की सोच रही है जिससे उनके इंजीनियर बनने का सपना आसानी से साकार हो सकेगा और इसके लिए उन्हें प्रवेश-परीक्षा में सफल होने की जी-तोड़ मेहनत भी नहीं करनी होगी। अभी तक तकनीकी शिक्षा-संस्थानों में प्रवेश हेतु विद्यार्थियों को पी.एम.टी.,पी.पी.टी., पी.ई.टी. जैसी स्पऱ्धाओं के दौर से गुजरना पड़ता है। इसमें सफल होने के बाद ही शासकीय संस्थानों में प्रवेश मिल पाता है। निजी तकनीकी शिक्षा संस्थानों में अवश्य ऐसी परीक्षाएँ नहीं होती परंतु वहाँ सिर्फ आर्थिक दृष्टि से संपन्न विद्यार्थी ही शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि सन् 1981 में प्री इंजीनियरिंग मंडल का गठन किया गया था और प्री इंजीनियरिंग टेस्ट की परंपरा आरंभ हुई। सन् 1982 में उक्त मंडल का नाम परिवर्तित करके व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापक) नाम दिया गया। इस मंडल द्वारा पी.ई.टी. समेत कई महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं का आयोजन किया जाता है। आरंभिक दौर में ही प्री इंजीनियरिंग टेस्ट में लगभग दस हजार विद्यार्थियों ने अपना भाग्य आजमाया। गत वर्ष करीब एक लाख विद्यार्थी इस परीक्षा में शामिल हुए थे। प्रवेश-परीक्षा का परिणाम घोषित होने के बाद काउंसिलिंग और प्रवेश-प्रक्रिया संपन्न होने में दो-तीन माह सहज ही बीत जाते हैं। ऐसी स्थिति में, जो असफल विद्यार्थी तकनीकी संस्थाओं में प्रवेश नहीं ले पाते, उन्हें विलंब हो जाने के कारण अन्य पाठयक्रमों/संस्थाओं में भी प्रवेश से वंचित होना पड़ता है। वैसे तो प्रवेश-परीक्षा का परिणाम घोषित होने के पूर्व ही अन्य (गैर तकनीकी) पाठयक्रमों/संस्थाओं में वैकल्पिक प्रवेश दिये जाने का प्रावधान है ताकि विद्यार्थियों का एक वर्ष का समय व्यर्थ नष्ट न हो।

विगत कुछ वर्षों से तकनीकी शिक्षा संस्थानों का कैलेण्डर गड़बड़ हो गया है। उनके शैक्षणिक सत्र दो से तीन माह पिछड़ रहे हैं। यही नहीं, सन 2003 से प्री इंजीनियरिंग टेस्ट में कट ऑफ सीमा समाप्त कर दिये जाने के कारण शून्य अंक पाने वाले विद्यार्थी भी इंजीनियरिंग की उपाधि के लिए प्रवेश पाने लगे हैं। जबकि इससे पहले 33: अंक लाने पर ही प्रवेश की पात्रता मानी जाती थी।

पिछले तीन दशकों से जारी व्यवस्था को बदलने के लिए केंद्र ने राज्य-सरकारों से राय मांगी है। केंद्रीय मानव संसाधान विकास मंत्रालय ने राज्य सरकारों को भेजे गये प्रस्ताव में जो जानकारियां मांगी हैं उनमें राज्य में प्री इंजीनियरिंग टेस्ट की स्थिति, प्रवेश-प्रक्रिया, निधर्रित वांछनीय योग्यता और इसके माधयम से प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की स्थिति जैसे बिंदु शामिल हैं। इसके अलावा इस व्यवस्था को बंद करने के बारे में राज्यों से राय भी मांगी गयी है। केंद्र सरकार के उक्त प्रस्ताव के पीछे जो महत्वपूर्ण कारण अनुमानित हैं उनमें से एक तो, तकनीकी शिक्षा संस्थानों के शैक्षणिक कैलेण्डर का गड़बड़ाना है। दूसरे, पी.ई.टी. में कट ऑफ सीमा का समाप्त कर दिया जाना है, जिसके कारण शून्य अंक पाने वाला विद्यार्थी भी प्रवेश पा लेता है। तीसरे, पी.ई.टी. में सम्मिलित विद्यार्थियों के बाद भी रिक्त रह जाने वाली सीटों पर बारहवीं कक्षा के अंकों के आधाार पर ही प्रवेश दिया जाना है, जिसके कारण प्रवेश परीक्षा के औचित्य पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है। अब राज्य-सरकारों को अपनी सहमति/असहमति से केंद्र सरकार को अवगत कराना है, क्योंकि उनकी रायशुमारी के बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा।

यदि मधय प्रदेश की राज्य सरकार केंद्र के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है तो यहाँ मौजूदा सत्र में होने वाली पी.ई.टी. अंतिम परीक्षा होगी। यह प्रदेश विद्यालयीन शिक्षा में बदहाली के दौर से गुजर रहा है। शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की एक अनोखी लहर चल रही है। पांचवी और आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाएं अब बंद की जा चुकी हैं। दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा को भी विद्यार्थियों को तनाव-मुक्त करने की दृष्टि से समाप्त किये जाने का विचार प्रकाश में आया है। अब चूंकि बी.ई. में प्रवेश बारहवीं कक्ष के प्राप्तांक पर निर्भर करेगा अत: विद्यार्थियों को अपना सारा धयान इस कक्षा की पढ़ाई पर केंद्रित करना होगा। चिंता की बात यह है कि बाल और किशोर वय में प्रतिस्पधाए का उत्साह बच्चों के भविष्य के लिए लाभदाय होता है किंतु यहाँ पांचवी और आठवीं की बोर्ड परीक्षा में अव्वल आने की होड़ समाप्त की जा चुकी है, दसवीं कक्षा में समाप्त की जा सकती है, तो अंतिम वर्ष की पढ़ाई में विद्यार्थियों पर अच्छे परिणाम के लिए मानसिक दबाव अधिक रहेगा। जबकि शिक्षा को कभी भी तनाव का कारण नहीं माना जाना चाहिए। शिक्षा जीवन की बुनियाद होती है, उसे मज़बूत करने के लिए अधययन और ज्ञानवर्धान करना तनाव का पर्याय कैसे हो गया ? कक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन की स्वस्थ स्पऱ्धा तो अनवरत जारी रहनी चाहिए। मध्यप्रदेश सरकार तो स्पधर्एं समाप्त कर शिक्षा की नींव खोखली कर रही है। स्कूल-शिक्षा में सुधाार हेतु शिक्षाविदों की बजाय अफसरों की बुध्दि को महत्व दिया जा रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि अफसरों के बूते पर शिक्षा-व्यवस्था में सुधार संभव ही नहीं है।

बहरहाल, केंद्र सरकार का प्रस्ताव विद्यार्थियों को बहुत राहत पहुंचाने वाला है क्योंकि निजी तकनीकी शिक्षा संस्थानों में तो बिना प्रवेश-परीक्षा और कठिन स्पर्धाए के ही धान-बल के सहारे मंद बुध्दि विद्यार्थी भी प्रवेश पा जाते थे। ऐसे में कठिन प्रतियोगिता और मेहनत के बल पर प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों को किंचित क्षोभ अवश्य होता था। अब यदि सब कुछ ठीक रहा और राज्य सरकारों ने भी हरी झंडी दे दी तो आगामी सत्र से बारहवीं कक्षा के प्राप्ताकों के आधार पर प्रावीण्यता के क्रम से बी.ई. में प्रवेश दिये जा सकेंगे। इसके लिए प्रवेशार्थी द्वारा आवेदन या पंजीयन की व्यवस्था की जा सकती हैं। तदुपरांत प्रावीण्यता के आधार पर काऊंसिलिंग आयोजित कर प्रवेश-प्रक्रिया संपन्न हो सकती है। यद्यपि यह आशंका जतायी जा रही है कि प्रायोगिक विषयों के अंक शिक्षक की अनुकंपा पर निर्भर होते हैं अत: शिक्षकों से यदि संबंधा ठीक नहीं रहे तो परीक्षाफल बिगड़ने का अंदेशा विद्यार्थी को अवश्य सतायेगा। लेकिन इसे सौ फीसदी सच नहीं माना जा सकता और अपवाद कहां नहीं होते ?

उल्लेखनीय है कि यदि बारहवीं कक्षा के अंकों के आधार पर ही प्रवेश दिया जाना तय हो गया तो विद्यार्थियों को यह लाभ होगा कि वे प्रवेश परीक्षा के तनाव और परिश्रम से छुटकारा पा लेंगे। जबकि उनके माता-पिता को जबरदस्त राहत मिलेगी क्योंकि बच्चों की कोचिंग पर होने वाले अनावश्यक भारी-भरकम व्यय से उन्हें मुक्ति मिल जाएगी। इसके अलावा, शैक्षणिक सत्र समय पर आरंभ हो सकेगा क्योंकि प्रवेश-परीक्षा की संपूर्ण प्रक्रिया के संपन्न होने में दो-तीन माह का समय लगता था, वह अब नहीं लगेंगा। चूंकि बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा के परिणाम जून मधय तक घोषित कर दिये जाते हैं, अत एव जुलाई में आसानी से प्रवेश प्रक्रिया पूर्ण कर सत्रारंभ किया जा सकता है।

प्रसंगवश यह कहना अनुचित न होगा कि सरकार को इंजीनियरिंग ही नहीं, तमाम तकनीकी शिक्षा-उपाधिायों के लिए प्रवेश-परीक्षा समाप्त कर सिर्फ योग्यता/प्रावीण्यता के आधार पर ही प्रवेश देने की परंपरा का सूत्रपात करना चाहिए। चूंकि व्यवस्था बदलनी ही है, तो जातिगत आरक्षण को भी समाप्त कर सिर्फ प्रावीण्यता के आधाार पर प्रवेश देने की शुरूआत भी की जानी चाहिए। ताकि योग्यता को सम्मान मिल सके और हर धार्म व जाति का विद्यार्थी योग्य बनने के लिए लालायित और सचेष्ट हो सके। विलंब से ही सहीं, विद्यार्थी जगत और इस विशाल देश के हित में उठाया गया यह एक साहसिक, सार्थक और निश्चित रूप से सही कदम होगा।

इस सच को नकारा नहीं जा सकता कि जातिगत आरक्षण की बैसाखी योग्यता के विकास में बाधाक है। इससे वर्ग-भेद की खाई निरंतर गहरी हो रही है। इसलिए आरक्षण को समाप्त कर एक स्वस्थ शैक्षणिक वातावरण के निर्माणा हेतु सरकार को इसी बहाने पहल करनी चाहिए। यदि तमाम राज्य सरकारें ऐसा ही सोच सकें और केंद्र को ऐसी पहल के लिए सहमत कर सकें तो तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में सचमुच एक जबरदस्त क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिलेगा। कोचिंग संस्थानों की दुकानदारी बंद हो जाएगी। माता-पिताओं को अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य के लिए कर्ज नहीं लेना पड़ेगा। व्यावसायिक परीक्षा-मंडल का कार्य भार भी कम हो जाएगा। सर्वाधिाक महत्वपूर्ण बात यह कि जाति-धार्म पर आधारित विघटनकारी व्यवस्था से मुक्ति पाकर युवा पीढ़ी अपनी योग्यता और मेहनत के बल पर देश को उन्नति के शिखर पर ले जाने की दिशा में अग्रसर होगी। बहरहाल, केंद्र सरकार ने तो गेंद राज्य सरकारों के पाले में डाल दी है। देखना है कि क्या निर्णय होता है।



डॉ. गीता गुप्त