संस्करण: 09मार्च-2009

''मानव संसाधन विकास को चुनौती देता-कुपोषण''

 

स्वाति शर्मा

फ्रांस के गणिता मारक्विज कंडरसेट ने लिखा था कि अगर बच्चे खुशहाली के लिए पैदा किए जाएँ, न कि मात्र अस्तित्व के लिए, तो जनसंख्या में स्वयं ही स्थिरता आ जाएगी। प्रश्न् यह है कि खुशहाली के लिए बच्चे पैदा करने का यह सिध्दांत हम अपने देश में कैसे लागू कर सकते हैं। हमारे यहाँ कुपोषण की शुरूआत गर्भ से ही हो जाती है और लड़कियों व महिलाओं में तो जीवन भर पौष्टिक भोजन का अभाव बना रहता है। इससे न केवल व्यक्तिगत स्तर पर स्वास्थ्य की हानि होती है बल्कि भावी पीढ़ी को भी क्षति पहुँचने की आशंका बनी रहती है। परिवार में तनाव बढ़ने से बच्चों की देखभाल भी नहीं हो पाती। इन हालातों में जो लड़कियाँ अपना अस्तित्व बचा पाती हैं, वे आगे चल कर कम भार वाले शिशुओं को जन्म देती हैं, जिनके जीवित रहने की संभावना सामान्य भार वाले शिशुओं से कम होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पांच वर्ष से कम आयु के एक करोड़ बीस लाख शिशु हर साल काल के ग्रास बन जाते हैं जिनमें से आधो से अधिक मामलों में मौत कुपोषण के कारण होती हैं। कुपोषण से ग्रस्त बच्चे बार-बार बीमार होते हैं। वे शारीरिक एवं मानसिक परिपक्वता हासिल नहीं कर पाते। यह दुष्चक्र चलता रहता है। ताज़ा आंकड़ों से पता चलता है कि पिछली सदी में बच्चों को कुपोषण से बचाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की गई। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह देखा गया कि अल्प भार व छोटे कद के बच्चों की संख्या में कमी आई है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं।
पोषण संबंधी प्रमुख चुनौती जन्म के समय भार का कम होना है। विकासशील देशों में हर साल करीब 3 करोड़ ऐसे शिशु पैदा होते हैं, जिन्हें गर्भ में ही मंद विकास की समस्या झेलना पड़ती है। इन देशों में कुल नवजात शिशुओं में करीब 24 प्रतिशत बच्चे ऐसे होते हैं। विश्व भर में आज भी 15 करोड़ से अधिक बच्चे ऐसे हैं जो अल्प भार की समस्या से ग्रस्त हैं और 20 करोड़ से अधिक छोटे कद की समस्या से। यह अल्पपोषण् और बौनापन तो समस्या का आंशिक पहलू है। कितने ही बच्चे ऐसे होंगे जो पूर्ण विकास नहीं कर पाते। सुधार की वर्तमान गति को देखते हुए सन् 2020 तक करीब एक अरब बच्चे मानसिक क्षीणता से ग्रस्त होंगे। कुपोषण की चुनौती अर्धापोषित वयस्कों के रूप में भी सामने आती है। एशिया और अफ्रीका में बड़ी संख्या में माताओं को पूर्ण पौष्टिक भोजन नहीं मिल पाता। खाद्य सामग्री की मौसमी कमी से यह समस्या और बढ़ जाती हैं। विकासशील देशों में करीब 24.3 करोड़ वयस्क अर्धापोषण की समस्या से ग्रस्त है क्योंकि उनका शारीरिक द्रव्यमान सूचकांक 17 किग्रा/मी.से. भी कम है। अल्प पोषण शारीरिक तथा कार्य क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है और संक्रमण प्रतिरोधा क्षमता घटाता है। इसके अलावा कुपोषण एनीमिया के रूप में भी सामने आता है। शैशवकाल में एनीमिया से मस्तिष्क का समुचित विकास नहीं हो पाता। माँ के अर्धापोषण से ग्रस्त होने की स्थिति में यह और बढ़ जाता है एवं स्कूली बच्चों व किशोरों में भी यह अधिक व्याप्त है। कुछ देशों में 80 प्रतिशत से अधिक माताएँ इस समस्या से ग्रस्त हैं और इसकी वजह से प्रसूति के दौरान उनमें ऊंची मृत्यु दर पाई जाती है।

विटामिन 'ए' की अत्यधिक कमी के मामलों में हालांकि सभी क्षेत्रों में कमी दर्ज हुई है किंतु विकासशील देशों में 4 से 25 करोड़ के बीच छोटे बच्चे हैं जिनमें इसकी कमी है। इन बच्चों में चूंकि बड़े बच्चों और किशोरों की गणना नहीं की गई है अत: समस्या की समग्रता का सही अनुमान नहीं हो पाया है। विकासशील एवं औद्योगिक दोनों ही देशों से प्राप्त साक्ष्यों से पता चलता है कि मातृत्व और प्रारंभिक शैशवकाल में अल्प पोषण के कारण वयस्क जीवन में गैर संचारी रोगों की आशंका बढ़ जाती है, जैसे-जवानी में ही मधामेह, हृदय रोग और हाइपरटेंशन होना। संतुलित भोजन न करने से अधिाक वजन व मोटापे की समस्या भी बच्चों तथा बड़ों दोनों में तथा सभी क्षेत्रों में तेज़ी से बढ़ रही है। कुछ विकासशील देशों में तो यह समस्या इतनी बढ़ गई है कि स्वास्थ्य संबंधी परंपरागत चिंताओं में अधिक धयान इन समस्याओं पर दिया जाने लगा है। आयोडीन की कमी से होने वाली बीमारियों के उपचार व रोकथाम के लिए पिछले दशक में नमक को आयोडीनयुक्त बनाने का सार्वभौमिक कार्यक्रम चलाया गया था जिसमें उल्लेखनीय प्रगति हुई। इस प्रगति को स्थायी बनाने के लिए निगरानी प्रणाली, गुणवत्ता नियंत्रण और सुदृढ़ कानून को प्राथमिकता देना और साथ ही अलग-थलग पड़े समुदायों तक पहुँचने में सुधार लाना जरूरी है।

मातृत्व पोषण की खराब स्थिति एवं कम भार व बौनेपन के रूप में उसके प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव पर तत्काल धयान देने की आवश्यकता है। इस संबंधा में सामाजिक पुनर्गठन, महिलाओं की खुशहाली, सफाई और पोषण जैसे मुद्दों पर धयान देना अपेक्षित है। ऊंची शिशु एवं मातृ दर व कुपोषण जैसी अन्य समस्याओं में कमी करने की दिशा में काम किया जाए। महिलाओं एवं बालिकाओं की उपेक्षा न हो। जनसंख्या संबंधा नीतिया अगर पारिस्थितिक, सामाजिक, लैंगिक समानता एवं भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा व पूर्ण रोजगार जैसे उद्देश्यों को आधार बना कर तैयार की जाएं तो जन्म दर व मृत्यु दर में जनसांख्यिकीय परिवर्तन लाया जा सकता है। हालांकि केंद्र एवं राज्य दोनों सरकारों ने कुपोषण् एवं गरीबी से लड़ने के लिए खाद्य वितरण प्रणाली, स्कूलों में मधयान्ह भोजन जैसी अनेक योजनाएं चला रखी हैं और इनमें कुछ हद तक सफलता भी प्राप्त हुई है। लेकिन किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सुदृढ़ राजनीतिक प्रतिबध्दता और कार्रवाई अनिवार्य है। गरीबी उन स्थितियों में पनपती है जब मानव संसाधानों का अवमूल्यन होता है तथा भूमि व अन्य भौतिक संसाधानों का अधिमूल्यन होता है। अत: किसी भी देश के विकास के लिए मानव संसाधान का सक्षम होना बहुत आवश्यक है। अत: आज कुपोषण, भुखमरी, गरीबी जैसी सभी चुनौतियों का सामना करते हुए मानव विकास पर तत्काल धयान दिया जाना चाहिए, ताकि देश सभी बाधाओं को पार करते हुए प्रगति के मार्ग पर बढ़े।

स्वाति शर्मा