संस्करण: 08जून-2009

 

म.प्र. में शिक्षकों के बगैर कैसे संभव है

शिक्षा में गुणवत्ता

डॉ.सुनील शर्मा

 स समय म.प्र. में बोर्ड परीक्षाओं के खराब परिणाम चर्चा में है,यहाँ दसवी के इम्तहान में लगभग सत्तर फीसदी बच्चे असफल रहे हैं। सिर्फ अंग्रेजी विषय मे अनुत्तीर्ण छात्रों की संख्या तीन लाख से अधिक है।लगभग इतने ही छात्र गणित विषय मे अनुत्तीर्ण हुए है।

यह बात सामने आई है कि अनुत्तीर्ण छात्रों में निजी स्कूलों की तुलना में सरकारी स्कूल के छात्रों का प्रतिशत अधिक है। इस खराब परिणाम पर चिंतन-मनन किया जा रहा है,शिक्षकों पर शिकंजा कसा जा रहा है। भीषणा गर्मी में सुविधा विहीन, शिक्षक विहीन स्कूलों में कक्षाएँ लगाने के फरमान भी जारी किये गयें है।इन सबके बीच यह भी विचारणीय है कि इन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की पद-स्थापना की स्थिति क्या है?पदस्थ शिक्षकों की योग्यता की कसौटी क्या है?वास्तव में इन दोनो बिन्दुओं पर म.प्र सरकारी स्कूलों की स्थिति चिंतनीय है। म.प्र. के स्कूलों में 60 हजार अतिथि शिक्षक छात्रों को पढ़ाने के काम में लगाये गये हैं। ये अतिथि शिक्षक पूण्राकालिक शिक्षकों के रिक्त पदों के विरूध्द पढ़ाने काम कर रहे हैं। इन्हें कालखंड के आधाार पर मानदेय का भुगतान किया जाता है एवं जरूरत होने पर पढ़ाने के लिए बुला लिया जाता है। शिक्षाकर्मी और संविदा शिक्षक की तीसरी पीढ़ी ही है अतिथि शिक्षक की परंपरा। वास्तव में म.प्र. में इन अधाूरे शिक्षकों ने शिक्षा का कवाड़ा किया है। अल्पवेतन पर काम करने वाले ये शिक्षक शिक्षा में गुणवत्ता की अलख कैसे जगा सकते हैं? इस समय अंग्रेजी विषय का विगड़ा परिणाम काफी चर्चा में है। कहा जा रहा है कि इसके पर्चे के नये पेटर्न को छात्र समझ नहीं पाये और फैल हो गये, यह स्वीकारोक्ति सच हो सकती है। अगर इसके साथ यह जोड़ा जाये कि छात्रों को समझाने के लिये स्कूलों में अंग्रेजी के शिक्षक ही नहीं मिले। वास्तव में यह बात सही है कि म.प्र0 के हाई स्कूलों में अग्रेजी विषय के शिक्षकों की भारी कमी है। क्योंकि वर्ष 2003 के बाद से यहां अंग्रेजी विषय के शिक्षकों की नियुक्ति बंद है। उल्लेखनीय है कि म0प्र0 में हाई स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति संविदा शिक्षक वर्ग-2 के पद पर की जाती है, और वर्ष 2003 के बाद से यहां भाषायी शिक्षकों की नियुक्ति न कर सिर्फ समाजिक विज्ञान के शिक्षकों की नियुक्ति की जा रही है।

अब सामाजिक विज्ञान के शिक्षक तो अंग्रेजी पढ़ा नहीं सकते हैं। और अतिथि शिक्षक रिजल्ट के प्रति जवाबदेह बन नहीं सकते हैं। ऐंसे में अंग्रेजी विषय में छात्र अनुत्तीर्ण होंगे ही। जहां तक गणित विज्ञान जैसे कठिन विषयों के शिक्षकों की बात है तों वर्तमान नियुक्तियों में दिये जा रहे अल्पवेतन के कारण कोई भी प्रतिभाशाली व्यक्ति म.प्र. में अब शिक्षक नहीं बनना चाहता है। ऐसे में थके हारे व्यक्ति ही संविदा शिक्षक के रूप में स्कूलों में आ रहे हैं। पिछले वर्ष शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम में यह बात सामने आई थी कि शिक्षक गणित के साधारण सवाल भी हल नहीं कर पा रहे हें और ना ही उन्हें संख्याओं के स्थानीय मान का ज्ञान है।

यह दुखद स्थिति है और शिक्षा में सुधार की सारी संभावनाओं को खंडित करती है। जहां तक प्राथमिक शिक्षा की बात है तो यह पूर्णत: निजी क्षेत्र में जा रही है। क्योंकि सरकारी स्कूलों के धूल भरे सुविधाविहीन स्कूलों में अब बच्चों को कोई नहीं भेजना चाहता है। सरकारी स्कूलों के मधयान्ह भोजन का लोभ भी सिर्फ वंचित वर्ग के बच्चों को अपनी ओर आकर्षित कर पाया है। परंतु यहां भी मधयान्ह भोजन की व्यवस्था के नाम पर पढ़ाई बंद हैं। क्योंकि शिक्षक भोजन व्यवस्था में मशगूल हैं। संकुल व्यवस्था की बाबूगिरी में भी काफी संख्या में शिक्षक पढ़ाने के कार्य से दूर हो गये हैं। अब शिक्षकों के बीच से ही जनशिक्षक हैं, बी.ए.सी. हैं, बी.आर.सी. हैं ये सब निरीक्षण करेंगे, मीटिंगों की डाक इकट्ठी करेंगे पर पढ़ायेंगे नहीं। वास्तव में कई स्तर शिक्षा व्यवस्था ने म0प्र0 की प्राथमिक और माधयमिक स्तर की शिक्षा व्यवस्था का कवाड़ा कर दिया है। म0प्र0 में शिक्षकों के काफी प्रशिक्षण चलते है परंतु इन प्रशिक्षणों से शायद ही कोई सार निकलता हो क्योंकि शिक्षकों को शिक्षण विधियां एवं शिक्षा मनोविज्ञान का ज्ञान नहीं कराया जा रहा है। प्रशिक्षण कार्यक्रम महज औपचारिक बन गये हैं।

स्कूलों के निरीक्षण का काफी हल्ला रहता है। जब प्रधानपाठक एवं प्राचार्यों की नियुक्ति स्कूलों में की जाती है तो उनकी जबावदेही होनी चाहिये कि शिक्षा की गुणवत्ता बनी रहे। स्कूल निरीक्षण का सैर सपाटा फायदेमंद नहीं है। स्कूल शिक्षा में देखा गया है कि यहां शिक्षकों की सी.आर. का ज्यादा मायना नहीं है क्योंकि निलंबित व्यक्ति भी आसानी से पदोन्नति पा जाता हैं। सरकारी स्कूलों के गिरते परीक्षा परिणाम एवं सुविधा विहीनता के लिये शासन की नीतियां ही जिम्मेदार हैं। वास्तव में म.प्र. में शिक्षा के प्रति शासन की नीतियों से कभी-कभी ऐंसा प्रतीत होता है कि सरकार अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा का निजीकरण करना चाहती है,एवं सरकारी स्कूलों को सुविधाहीन कर लोगों को अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने के लिए मजबूर कर रही है।लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अधिकांश निजी स्कूल भी गुणवत्ता से कोसों दूर हैं। सिर्फ विज्ञापन बाजी और चमक-दमक के सहारे ये निजी दुकानें चल रही हैं। अधिकांश में योग्य शिक्षकों का अभाव है। मात्र हजार-दो हजार रूपये मासिक में बेरोजगार इनमें शिक्षक बनकर अपनी जिंदगी काट रहे हैं। विचारणीय है कि शोषण के शिकार निजी विद्यालयों के ये शिक्षक गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा कैसे दे सकते हैं। वास्तव में शिक्षा सत्र की शुस्आत बदलने से या फिर योग कराने से शिक्षा का स्तर सुधारने वाला नहीं है। प्रदेश में शिक्षा का स्तर एवं परीक्षा परिणामों में सुधार करना है तो स्कूलों में शिक्षकों की पदपूर्ति विषयानुसार की जाना जरूरी है। शिक्षको को प्रशिक्षण भी समय-समय पर दिया जाना चाहिये शिक्षकों में वर्गभेद समाप्त कर उच्च वेतन का फायदा दिया जाये जिससे योग्य व्यक्ति इस पेशे की ओर आकृष्ट हो सकें।

डॉ.सुनील शर्मा