संस्करण: 08जून-2009

 

अब 'मुख्यमंत्री' बन रहे हैं शिवराज

महेश बाग़ी

शीर्षक पढ़ कर चौंकिए नहीं। दरअसल शिवराज सिंह अब मुख्यमंत्री की असली भूमिका का वहन कर रहे हैं। हालांकि उनके नेतृत्व में पिछली सरकार ने एक हज़ार दिन से अधिक का कार्यकाल पूरा किया था और इस बार भी उन्हीं के नेतृत्व में सरकार बनी है, मगर अब लग रहा है कि शिवराज मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। अपने पिछले कार्यकाल में वे पांव-पांव वाले भैया, मामा, दादा जैसी भूमिकाओं में थे। मुख्यमंत्री सचिवालय में बैठे सलाहकारों की सलाह पर वे कभी छापामार बने तो कभी सायकल पर निकले। कभी लाड़ली लक्ष्मी का दुलार करने तो कभी कन्यादान करने चले। दोबारा सत्ता में आने के बाद लोकसभा चुनाव की चुनौती थी। इसलिए कोयले को लेकर न्याय यात्रा पर निकले। अब जबकि चुनाव संपन्न हो चुके हैं और किसी नौटंकी की आवश्यकता नहीं है, शिवराज को याद आया कि वे मुख्यमंत्री भी हैं। इसलिए अब मंत्रालय में बैठ कर काजकाम निपटा रहे हैं। अख़बारों में ख़बर छपी है कि मुख्यमंत्री ने मंत्रालय में बैठ कर कामकाज किया। वैसे यह ख़बर ठीक वैसी ही है जैसे अफसर ने मातहतों को निर्देश दिए। बाबू ने नोटशीट तैयार की और भृत्य ने लिफाफा डिस्पेच किया। मुख्यमंत्री का यह दायित्व है कि वह मंत्रालय में बैठे, अफसरों से विचार-विमर्श करे, उन्हें दिशा-निर्देश दे। लेकिन शिवराज को इसकी फुर्सत नहीं थी। अब फुर्सत मिली है, इसलिए उनका मंत्रालय में बैठना ख़बर है।

यह शुभ संकेत है कि इस बार शिव सरकार पंचायतों की नौटंकी नहीं कर पा रही हैं। करे भी कैसे ? ख़जाने की ऐसी हालत ही नहीं है कि ऐसे आयोजन किए जाएं। इसलिए मन मार कर ही सही, मंत्रालय में बैठ कर सरकारी कामकाज निपटाना पड़ रहा है। इसे इस प्रदेश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि पिछले कार्यकाल में कोई ख़ास उपलब्धिा दर्ज न करवा पाने के बावजूद भाजपा फिर सत्ता में लौट आई। पिछली सरकार द्वारा की गई फिज़ूलखर्ची के कारण इस बार प्रशासन का सामान्य कामकाज चलाना भी मुश्किल हो रहा है। शिवराज ने पिछले कार्यकाल में इतनी घोषणाएं कर रखी हैं, जिन्हें पूरा करने में सरकार को पसीना आ रहा है। याद रहे कि अपने पिछले कार्यकाल में शिवराज सिंह ने 3200 घोषणाएं की थीं। इन्हें पूरा करने के लिए 20 हज़ार करोड़ रुपयों की जरूरत है और सरकारी ख़जाने की हालत ख़स्ता है।

विधानसभा चुनाव जीतने के लिए शिवराज सरकार ने राज्य कर्मचारियों को छठे वेतनमान का लाभ देने और किसानों के बिजली बिल माफ़ कर तीन प्रतिशत ब्याज पर कर्ज देने की घोषणाएं की थीं। अब जबकि उसकी सत्ता में वापसी हो चुकी है, ये घोषणाएं सरकार के गले की हड्डी साबित हो रही हैं। राज्यकर्मियों को छठे वेतनमान का लाभ देने में उसके छक्के छूट रहे हैं। घोषणा पूरी न होने से नाराज कर्मचारी संगठन लामबंद हो रहे हैं। निकट भविष्य में उनके राज्यव्यापी आंदोलन की भी संभावना है, जिससे राज्य का प्रशासनिक ढांचा चरमराने की आशंका है। कर्मचारियों के बाद किसान संगठन भी सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर सकते हैं। शिवराज सरकार किसानों के बिजली बिल माफ़ करने, उन पर दर्ज मुकदमें वापस लेने और सस्ती दर पर ऋण उपलब्धा कराने में नाकाम रही है। वैसे घोषणाएं कर मुकर जाना भाजपा के लिए नई बात नहीं है। 1999 के विधानसभा चुनाव के पूर्व भाजपा के घोषणापत्र में सौ दिन में बिजली उपलब्धा कराने और प्रदेश में वृत्ति कर समाप्त करने के वादे किए गए थे। सौ दिन में बिजली का वादा हवा हवाई हो गया। पूरे पांच साल तक सत्ता में रहने के बाद भाजपा सरकार बिजली मामले में पूरी तरह नाकाम रही। फिलहाल हालत यह है कि जिलों, तहसीलों से लेकर गांव स्तर तक भारी बिजली कटौती की जा रही है, जिससे आम जनजीवन तो प्रभावित हुआ ही है, साथ ही औद्योगिक और कृषि उत्पादन में भी गिरावट आई है। इसके लिए भाजपा सरकार ही जिम्मेदार है।

किसानों को सस्ती बिजली देने का वादा करने वाली यह सरकार अब बिजली दरें बढ़ाने की भी तैयारी कर रही है। विद्युत वितरण कंपनियों की स्थापना करने, दूसरे राज्यों से महंगी बिजली खरीदने और उसे कम दाम पर बेचने से विद्युत मंडल घाटे में है और इसकी भरपायी के लिए आम उपभोक्ताओं पर भार लादने की कवायद की जा रही है। सरकार की नाकामी का खामियाजा जनता को भुगतने को मजबूर किया जा रहा है। जहां तक वृत्ति कर समाप्त करने का मामला है, तो इस मामले में भी भाजपा सरकार पूरी तरह नाकाम रही है। पूरे पांच साल तक सत्ता में रहने के बाद इस मसले पर विचार तक नहीं किया गया और अब खबर आ रही है कि सरकार इसमें और वृध्दि करने जा रही है। अपने चुनावी घोषणापत्र के ठीक उलट कार्य करने की इस शैली से समझा जा सकता है कि वोट पाने के लिए भाजपा कैसा भी झूठा वादा कर सकती है और चुनाव जीतने के बाद वादे के विपरीत क़दम भी उठा सकती है।

प्रदेश की जनता को 'स्वर्णिम मधय प्रदेश' का ख्वाब दिखाने वाली भाजपा सरकार की असलियत अब सामने आ रही है। एक दर्ज़न से अधिक पंचायतें-महापंचायतें कर जो घोषणाएं की गईं वे फाइलों में ही क़ैद हैं। औद्योगिक विकास के लिए आयोजित इन्वेस्टर्स मीट भी दिखावा साबित हुई हैं। प्रदेश के औद्योगिक विकास का ताना बाना बुनने से पहले सरकार को उद्योगों की बुनियादी जरूरते पूरा करने पर विचार करना चाहिए। मुख्यमंत्री और उनके सलाहकारों को यह छोटी सी बात समझ में क्यों नहीं आती कि उद्योगों के लिए सड़क, पानी और बिजली बुनियादी ज़रूरत है और इन तीनों मामलों में मधयप्रदेश फिसड्डी है। फिर कोई उद्योगपति यहां अपनी पूंजी बर्बाद करने आगे क्यों आएगा ? यही वजह है कि इन्वेस्टर्स मीट में किए गए अनुबंधा परवान नहीं चढ़ सके हैं। जानकारों का मानना है कि शिव सरकार ने इन्वेस्टर्स मीट पर जितना पैसा बहाया है, उतना पैस किसी उद्योग में लगाया होता तो कुछ लोगों को रोजगार मिल सकता था।

बहरहाल, शिवराज सिंह अब मुख्यमंत्री की भूमिका निभा रहे हैं। उनकी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अर्थ संकट है। इससे उबरना आसान नहीं है। अर्थसंकट से उबरने का सबसे बड़ा उपाय यही है कि सरकारी खर्च में कटौती की जाए। मंत्रियों-अफसरों के बंगलों पर अतिरिक्त खर्च बंद किया जाए तथा उनकी हवाई और विदेश यात्राओं पर पूरी तरह प्रतिबंधा लगाया जाए। मंत्रियों-अफसरों के वाहन कम किए जाएं और उनके परिजनों को उपलब्धा सरकारी वाहन, राज्य वाहन डिपो में खड़े किए जाएं। सभी जिला कलेक्टरों को राजस्व संग्रहण का लक्ष्य तय कर सौंपा जाए। लक्ष्य की पूर्ति न करने वाले अफसरों को मैदान से हटा कर संचालनालय-मंत्रालय में पदस्थ किया जाए और योग्य अफसरों को ही फील्ड में भेजा जाए। उम्मीद है कि शिवराज सरकार इस दिशा में आवश्यक कदम उठाएगी।


महेश बाग़ी