संस्करण: 08जून-2009

 

शख्सियत काम से बनती है
मीडिया प्रबंधन की कलाबाजियों से नहीं।
 

 राजेंद्र जोशी

राजनैतिक क्षेत्र में नेताओं की शख्सियत निखारने के लिए मीडिया प्रबंधान की कलाबाजियां इन दिनों खूब देखने को मिल रही हैं। राजनीति का क्षेत्र सेवा का है और इस क्षेत्र में तमाशों का खेल ज्यादा समय तक नहीं चल पाता है। नाटकों के रंगमंच पर और फिल्मों और टेलिविजन के बड़े-छोटे पर्दों पर तो नायक को उसके किरदार के हिसाब से सजाया-संवारा जाता है किंतु सत्ता के सिंहासन पर पहुंचने और उस पर बैठ जाने के बाद किसी सामान्य से सामान्य व्यक्ति को असाधारण व्यक्तित्व का धनी प्रदर्शिन करने की कलाबाजियां कई बार हास्यास्पद बनती हुई देखी जाती है।
        प्रजातांत्रिक व्यवस्था का एक बेहतर पक्ष यह है कि इसमें छोटे से छोटा गरीब से गरीब, साधारण से साधारण व्यक्ति भी जनता का विश्वास अर्जित कर समाज की सेवा के लिए अपने आपको प्रस्तुत कर सकता है। जब भी कोई हमारे अपने बीच का आदमी सत्ता में पहुंचने का अवसर हासिल कर लेता है, तो स्वाभाविक है कि जनता उसकी शख्सियत की विशेषताओं से वाकिफ होना चाहती है। ऐसे में अपने नेता की शख्सियत में निखार लाने और उसके चरित्र का महिमा-मंडित करने के लिए निजी मीडिया-प्रबंधान की जरूरत महसूस होती है। निजी मीडिया-प्रबंधान से जो लोग जुड़े होते हैं, उन्हें उस शख्सियत की लोकप्रियता बढ़ाने की चुनौतियां होती ही है साथ ही उन लोगों को अपनी भूमिका के निर्वहन के दौरान अपनी प्रतिभा और छवि-निर्माण कला का बढ़-चढ़कर प्रदर्शन करना भी जरूरी हो जाता है। मीडिया-प्रबंधान में कुछ ऐसे ही प्रतिभा संपन्न और कुशल विशेषज्ञों को लगाया जाता है जो अति विश्वसनीय होते हैं और लोहे के पत्तर पर स्वर्ण पालिश करने जैसे कार्य में उनके हाथ मंजे हों। कुछ हद तक तो मीडिया-प्रबंधान की कला अपने नेता की जनप्रियता बढ़ाने के लिए सौ-टका सही बैठती है, किंतु अनेक बार अति प्रवीणता के अति प्रदर्शन से उस शख्सियत की भद्द उड़ाने में भी पीछे नहीं रहती है।

संवैधानिक पदों पर विराजे ऐसे नेताओं जिनके हाथ में सत्ता की बागड़ोर होती है, उनके कद को ऊंचा उठाने की चुनौतियों का सामना करने के लिए उनसे जुड़े 'थिंक-टैंक' दिन-प्रतिदिन अपने टैंक में से कोई न कोई ऐसी पुड़िया छोड़ते रहते हैं जिससे कि वे जनता पर वशीकरण का जाल फेंककर अपने नेता के आचरण, व्यवहार, कार्य की शैली, और उसके विविधा चारित्रिक गुणों से लोगों को उनका 'फेन' बना दे। शख्सियत के प्रचार की ऐसी-ऐसी कलाबाजिंया देखने को मिलती है कि कतिपय लोगों को लगने लगता है कि यह नेता कोई ईश्वर का अवतार है और पापियों के पापोंको इस धारा को पावन करने के लिए अपने जीवन में त्याग, तपस्या और समर्पण का प्रण लेकर वह जनसेवा के लिए कूद पड़ा है। आधुनिकता, भौतिकता और विकास के इस आपाधापी वाले युग में आज व्यक्ति इतना अधिक डूबा हुआ है कि वह राजनीति में खेले जा रहे खेलों का हिस्सा नहीं बनना चाहता। आज जनता चाहती है कि सेवा के क्षेत्र में जनता ने यदि किसी को सत्ता संचालन का जनादेश दिया है तो वह अपने कर्तव्यों से कुछ उपलब्धियाँ दिखाये और जिसका परिणाम जमीन पर उतरते हुए दिखे। मीडिया-प्रबंधान भी इस स्थिति को बेहतर ढंग से समझता है और अपनी लच्छेदार शब्दावलियों और आंकड़ेबाजियों के गुणा-भाग के जाल में लोगों को फांसने का उपक्रम करता रहता है।

सरकारी मीडिया प्रबंधान की अपनी मर्यादा होती है और वह कार्यों की सफलता और जनकल्याण के कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार की प्रवीणता प्रदर्शित करता है। वहाँ सब ठीक-ठाक रहता है किंतु जब राजनैतिक प्रबंधाक किसी बड़े पर बैठे नेता की शख्सियत को बुलंद बनाने के लिए उसके चेहरे-मोहरे, चाल-ढाल और उसके बोल चाल के मामलों में उसे सजा धाजाकर प्रस्तुत करने का प्रयास करता है तो लगता है कि वह जनता को भ्रमित कर रहा है। अनेक बार शख्सियत को लोकप्रिय बनाने के नाम पर उसकी दिनचर्या को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करना पड़ता है। ऐसे में यह खतरा सदैव बना रहता है कि जिस बड़े नेता की महिमामंडित करने के लिए जिस तरह से उसे पेश किया जाता है, तो वह सेवक या नेता नहीं, बल्कि किसी नाटक या फिल्म का कोई कलाकार लगने लगता है, जिसने मेकअप किया हुआ है, वह रटे-रटाये डायलाग बोल रहा है और किसी पर्दे के पीछे के निदेशक के इशारों पर एक्टिंग कर रहा है। इस तरह के मामलों में नाटकीयता और नकलीपन साफ-साफ देखने को मिलता है।

संवैधानिक पदों पर विराजे महत्वपूर्ण लोगों की दिनचर्या के निजी मामलों को भी बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत कर उन्हें लोगों के बीच एक सहज सरल,साधारण, मृदुभाषी विनम्र और त्याग-तपस्या की मूर्ति के रूप में लोगों के दिलों में उतारने के लिए मीडिया प्रबंधान का प्रयास होता है। उदाहरण के लिए यदि सत्तासीन बड़े नेता का चारित्रिक स्वरूप जब जनता के सामने आता है कि वह गांवों में कभी-कभी अचानक हवाई मार्ग से उतरता है, कभी गांव की गलियों में पांव-पांव चलने लगता है, कभी गेंती-फावड़ा उठा लेता है, कभी गांव में टूटी-फूटी खटिया पर बैठ जाता है कभी बाइक पर किसी के पीछे बैठ जाता है, कभी साइकिल चलाता है तो कभी गरीबों के साथ जमीन पर बैठकर पत्तल में दाल बाफले खाता है। वह कभी मंदिर में पहुंच जाता है, आरती उतारता है, पवित्र नदियों में डुबकी लगा लेता है। कभी कभी तो मीडिया प्रबंधाक के मसीहागण उस नेता को अति विनम्र और क्षमादान करने वाला घोषित कर देते हैं तो कभी उसे अचानक कार्यालयों, गोदामों और दूकानों में छापा मारते हुए बता देते हैं और सड़क की खराब याताया व्यवस्था में रात बेंरात चेकिंग करने के लिए भेज दिया जाता है। ऐसे मामलों में उसकी शख्सियत को बहुत ही सख्त और कठोर प्रदर्शित कर दिया जाता है। उपलब्धियों के समाचारों की तुलना में शख्सियत-निर्माण के समाचारों से अखबार रंगे पड़े होते हैं। यह मानाकि सत्त्धीश को कभी कभी विनम्र, संवेदनशील और सहज बन जाना चाहिए तथा कभी कभी सख्त हो जाना चाहिए। किंतु उसके प्रोजेक्शन में अति हो जाने से उसकी शख्सियत नाटकीय दिखने लगती है। देश की जनता सत्त्धीशो के चरित्रों से भलीभांति वाकिफ हो चुकी है। वह जानती है कि संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं की शख्सियत मीडिया प्रबंधाक की कलाबाजियों से नहीं बल्कि बेहतर उपलब्धियों और कार्यों से बुलंद बनती है।

राजेंद्र जोशी