संस्करण: 08जून-2009

 

अब भी कायम है
सूकी का खौफ
 

नीरज नैयर

दुनिया भर के लोकतंत्र समर्थकों के लिए मिसाल बन चुकीं आंग सान सूकी म्यांमार की फौजी हुकूमत के लिए इतने बरस यातनाएं झेलने के बाद भी खतरा बनी हुई हैं. इस खौफ के चलते ही फौज ने सूकी की को नए मुकदमें में फंसाने की चाल चली है. दरअसल सूकी की नजरबंदी मई के अंत में खत्म होनी थी और 2010 में देश में चुनाव होने हैं, फौजी सरकार सूकी के समर्थन को बखूबी जानती है. उसे पता है कि अगर सू की आजाद रहीं तो उसके लिए परेशानी खड़ी कर सकती हैं. इसलिए उन्हें ऐसे आरोप में फंसाया जा रहा है जिसकी पूरे विश्व में भर्त्सना हो रही है. कुछ दिन पहले जॉन यट्टाव नाम का एक बुजुर्ग अमेरिकी, अपने पैरों में पतवार बांध कर झील के रास्ते उनके मकान के पिछवाड़े पहुंच गया. जहां उसकी तबीयत इतनी बिगड़ गई कि सूकी की सहायिकाओं ने उसे वहीं फर्श पर सो जाने दिया. वापसी में झील पार करते वह पकड़ लिया गया. अब म्यांमार की फौजी सत्ता जॉन यट्टाव, आंग सान सू की और उनकी तीनों सहायिकाओं पर इस बात का मुकदमा चला रही है कि उन्होंने नजरबंदी के कानून का गंभीर उल्लंघन किया है. सूकी को इस वक्त इनसीन जेल में रखा गया है, अगर यह आरोप साबित हो जाता है तो उनको कम से कम पांच साल की सजा हो सकती है. अब से उन्नीस साल पहले उनकी पार्टी नैशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी ने देश के एकमात्र आम चुनाव में एक तरफा बहुमत हासिल किया था, लेकिन म्यांमार की आजादी के बाद से ही वहां की सत्ता पर छाई फौज ने न सिर्फ उस चुनाव को रद्द कर दिया बल्कि सू की को जेल या नजरबंदी में रखने का एक सिलसिला ही शुरू कर दिया, जो तब से अब तक लगातार जारी है. पिछले 6 सालों से अपने ही घर में उनकी नजरबंदी इतनी जबर्दस्त थी कि कोई बाहरी व्यक्ति तो क्या, म्यांमार का कोई नागरिक भी उनसे नहीं मिल सकता था. सिर्फ वे और उनकी तीन सहायिकाएं जबर्दस्त फौजी पहरे में एक झील के किनारे स्थित अपने घर में रहती थीं. ऐसे में इस बात की उम्मीद कम ही नजर आती है कि कोई फौजी घेरा तोड़कर अपनी मर्जी से उनके घर में दाखिल हो सकता है, हां अगर निगरानी में तैनात जवान स्वयं ही आंखें मूंद ले तो यह मुमकिन है. जुंटा सरकार आंन सान सूकी को चुनाव से दूर रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. वो काफी वक्त से मौके की तलाश में थी और जब मौका नहीं मिला तो उसने नजरबंदी के उल्लंघन की पटकथा रच डाली, इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. हो सकता है कि वो अमेरिकी फौज के इशारे पर वहां आया हो या उसे जबरदस्ती भेजा गया हो. सूकी पर इस तरह के आरोपों का जुंटा के लिहाज से यह बिल्कुल मुनासिफ वक्त है क्योंकि पांच साल की सजा का मतलब है, 2014 तक सरकार सूकी के खौफ से आजाद रह पाएगी और 2010 में होने वाले चुनाव पर उनकी शख्सियत के प्रभाव का कोई जोखिम भी नहीं रहेगा. सूकी का पूरा जीवन संषर्घ भरा रहा है, उन्होंने करीब 13 साल नजरबंदी में बिताए. 19 जून 1945 को रंगून में जन्मी सू की के पिता आजादी की लड़ाई के सिपहसलाहर थे. सूकी के जन्म के महज दो साल बाद ही यानी 1947 में उनकी हत्या कर दी गई. सूकी और उनके दो भाईयों की परवरिश मां डॉ किन की ने की. जब सूकी आठ साल की थीं तो उनके एक भाई की दुर्घटना में मौत हो गई, जिसे वो बेहद प्यार करती थीं. बाद में उनका दूसरा भाई भी कैलीफोर्निया जाकर बस गया.

उन्होंने जिंदगी के उतार-चढ़ाव को अपनी मां के साथ बढ़ी बारीकी से देखा. 1960 में जब बर्मा जो अब म्यांमार के नाम से जाना जाता है में पहली सरकार बनी तो डॉ किन की को भारत-नेपाल के लिए बर्मा का राजदूत नियुक्त किया गया. इस दौरान सूकी को भारत के करीब आने का मौका मिला. उन्होंने 1964 में दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की. 1972 में उनकी शादी हो गई, उनके पति भूटान में रहते थे इसलिए उन्हें भी भूटान जाना पड़ा. वहां उन्होंने दो संतानों को जन्म दिया. 1988 में अपनी मां से मिलने वो बर्मा लौटी लेकिन फिर वापस नहीं जा पाईं. उन दिनों मुल्क में लोकतंत्र के लिए चल रहे आंदोलन ने उन्हें खासा प्रभावित किया, धीरे-धीरे वो इसकी अगुवाई करने लगीं. लंबे इंतजार के बाद उनके पति ने 1995 में सूकी से बर्मा जाकर मुलाकात की मगर उन्होंने वापस लौटने से इंकार कर दिया. बाद में उनके पति कैंसर से पीड़ित हो गये, वो आखिरी वक्त में सूकी के पास आना चाहते थे लेकिन बर्मा सरकार ने इसकी इजाजत नहीं दी, उसका तर्क था कि बर्मा में कैंसर के इलाज की सुविधा नहीं है. सूकी उस वक्त बड़ी शख्सियत के रूप में पहचान बना चुकी थीं लिहाजा फौजी सरकार की आंखों में वो खटकने लगी थी, सूकी को आशंका थी कि अगर वो पति से मिलने मुल्क के बाहर गईं तो जुंटा सरकार उसे दोबारा बर्मा में आने नहीं देगी. इसकरके उन्होंने आखिरी वक्त में अपने पति को देखने जाना तक गंवारा नहीं समझा. 27 मार्च 1999 को उनके पति की मौत हो गई. उनके दोनों बच्चे यूनाइटिड किंगडम में रहते हैं, पूरी तरह होश सभांलने के बाद शायद ही उन्होंने अपनी मां को कभी देखा हो.
                                                                             ऐसा नहीं है कि सूकी के साथ हुए अन्यायपूर्ण व्यवहार पर विश्व समुदाय ने चुप्पी साधे रखी. अमेरिका, ब्रिटेन, संयुक्त राष्ट्र आदि ने समय-समय पर इसकी मुखालफत की मगर फौजी हुकूमत पर कोई फर्क नहीं पड़ा. भारत ने भी जब कभी ऐसा करने की कोशिश की तो फौजी सरकार ने घुसपैठ के लिए सीमाओं को खुला छोड़ दिया. मौजूदा दौर में भी जुंटा के रवैये की तीखी भर्त्सना हो रही है. अमेरिका ने सूकी को जल्द रिहा करने को कहा है, जबकि ब्रिटेन का कहना है कि सैन्य सरकार बहाने ढूंढ रही थी ताकि आंग सान सूकी की नजरबंदी को बढ़ाया जा सके, वहीं संयुक्त राष्ट्र ने इसे अन्याय करार दिया है. विश्व समुदाय के इस रुख के बाद भी कोई उम्मीद दिखाई नहीं देती कि जुंटा अपनी नफरत भरी नीतियों में कोई बदलाव लाएगा.

नीरज नैयर