357;ाई करने की बात पुन: दोहरायी जा रही है।

उल्लेखनीय है कि निम्न स्तर की पॉलीथिन का प्रयोग पर्यावरण के लिए बहुत ख़तरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। तमाम प्रतिबंधों की अवहेलना करके दुकानदार रंगीन पॉलीथिन में खाद्य सामग्री बेच रहे हैं। पढ़े-लिखे ग्राहक भी मूक बने यह देख रहे हैं। यद्यपि एकाधिक बार यह जानकारी प्रकाश में आ चुकी है कि रिसाइकल की गयी 25 माइक्रोन से कम की पॉलीथिन को रंगीन कर दिया जाता है जबकि मानक स्तर की पॉलीथिन बनाने हेतु अलग से आई एस कोड होता है। परंतु उपभोक्ता तनिक भी जागरूक नहीं है इसलिए दुकानदार निर्भीक होकर प्रतिबंधित पॉलीथिन का उपयोग कर रहे हैं। विभिन्न शहरों के रेल्वे स्टेशन, बस स्टैंड, उद्यान और सार्वजनिक स्थलों पर सरेआम पॉलीथिन का कचरा फेंकने वाले लोग भी देखे जा सकते हैं। कभी-कभी शहरों को पॉलीथिन मुक्त बनाने के अभियान भी छेड़े जाते हैं कितु इसका सकारात्मक परिणाम नहीं निकलता। दरअसल घरों में वर्षों से हो रहे पॉलीथिन के उपयोग को सीमित या नियंत्रित करने हेतु एक दिवसीय या साप्ताहिक आंदोलन की अपेक्षा सतत अभियान जारी रखना होगा। एक सीमित अवधि तक कागज और कपड़े के थैले बांटकर लोगों को पॉलीथिन का उपयोग बंद करने के लिए जागरूक नहीं किया जा सकता।
उल्लेखनीय है कि शहरों को पॉलीथिन के कचरों से मुक्ति दिलाने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने एक कार्ययोजना पर्यावरण मंत्रालय को सौंपी है। तदनुसार देश के 147 सीमेंट कारखानों में इस कचरे की खपत सुनिश्चित कर दी जाएगी। शीघ्र ही इस संबंधा में अधिसूचना जारी होने की उम्मीद है। मंडल की योजना 1200 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान की जरूरत वाले उद्योगों को भी इसके दायरे में लाने की है। केंद्रीय प्रदूषणा नियंत्रण मंडल के अधयक्ष डॉ. एस.पी. गौतम का कथन है-'इससे न केवल शहरों को पॉलीथिन के प्रदूषण से काफी हद तक छुटकारा मिलेगा बल्कि कोयले की खपत में कमी भी आएगी। सीमेंट के बाद स्टील और थर्मल पावर प्लांट को भी इसके दायरे में लाने का विचार है।' गौरतलब है कि मधयप्रदेश के छ: सीमेंट कारखानों में जुलाई 2008 से शहरों में एकत्र किये गये पॉलीथिन-कचरे की खपत जारी है।

यह अच्छी बात है कि मधयप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मंडल के नेतृत्व में भी पुन: एक समिति बनायी गयी है जो घटिया स्तर की पॉलीथिन के उत्पादक, संग्रहकर्ता व उपभोक्ता के विरुध्द सख्त कार्रवाई करने का अभियान छेड़ेगी। मंडल के सदस्य, नगर-निगम, जिला प्रशासन के प्रतिनिधि, ड्रग एंड फूड कंट्रोलर के प्रतिनिधि, पुलिस बल और एन.जी.ओ. के सदस्य मिलकर शहर भर में ऐसे स्थानों को चिन्हित करेंगे जहां अमानक स्तर की पॉलीथिन का निर्माणा जारी है। दोषी पाये जाने वाले व्यक्ति को पांच वर्ष की कैद और एक लाख रुपये तक का अर्थदंड भुगतना पड़ सकता है। छोटे दुकानदारों को भी नहीं बख्शा नहीं जाएगा। आमजन की सूचना पर भी समिति द्वारा छापामार कार्रवाई किये जाने की योजना है। इसके लिए मधयप्रदेश नियंत्रण मंडल के कार्यालय में दूरभाष पर कोई भी व्यक्ति अमानक स्तर की पॉलीथिन के संबंधा में सूचना दे सकता है। भले ही अमानक स्तर के पॉलीथिन का उत्पादन बंद करने की कवायद अपनी जगह सही है परंतु प्रतिदिन उपयोग में आने वाली पॉलीथिन के कचरे से शहरों को छुटकारा दिलाने हेतु भगीरथ प्रयास करने होंगे। भोपाल में तो कागज़ पर यह अभियान एक वर्ष से चल रहा है, पर इसमें कोई गति सचमुच दिखाई नहीं देती। अब एन.जी.ओ. के माधयम से पॉलीथिन की थैलियां और कचरा एकत्र करवाकर सीमेंट कंपनियों को भेजा जा रहा हैं। नगर निगम से प्राप्त जानकारी के अनुसार-राजधानी भोपाल में प्रति वर्ष सात हज़ार टन पॉलीथिन का कचरा निकलता है। यह प्रतिदिन निकलने वाले कुल कचरे का सात प्रतिशत है। प्रदूषण नियंत्रण मंडल द्वारा हरदा स्थित हिडनबर्ग एवं अन्य सीमेंट कंपनियों में ऐसा कचरा भेजकर उसे भस्म करवाया जा रहा है। सीमेंट उद्योग में इस कचरे की खपत एक स्थायी समाधान साबित हो रही है।

अब अशासकीय और समाजसेवी संस्थाओं ने पॉलीथिन का कचरा एकत्र करवाने का