संस्करण: 08जून-2009

 

नार्को परीक्षण :
सच्चाई उगलने वाली तकनीक का झूठ
 

सुभाष गाताड़े

न्यायमूर्ति ए आर लक्ष्मणन् की अगुआईवाला विधि आयोग इन दिनों नार्को परीक्षण पर अपनी रिपोर्ट का मसविदा तैयार करने में व्यस्त है। (नवभारत टाईम्स, नई दुनिया 28 मई 2009)  रिपोर्ट तैयार होने के बाद आयोग के सदस्यों के बीच उसे रखा जाएगा और वहां से सहमति लेकर उसे सरकार के सामने पेश किया जाएगा। अख़बारी रिपोर्टों पर यकीन करें तो विधि आयोग नार्को परीक्षण पर पाबन्दी की सिफारिश करनेवाला है।

दरअसल लम्बे समय से यह मसला आयोग के अन्दर विचाराधीन रहा है कि किस तरह इस परीक्षण से मानवधिकार का हनन होता है। पिछले कुछ सालों में इस सम्बधो में आयोग अपनी राय जाहिर करता रहा है। उसने इस परीक्षण के बढ़ते प्रयोग पर चिन्ता जाहिर की थी और इस बात को भी रेखांकित किया था कि दुनिया भर में इसकी विश्वसनीयता सन्देह के घेरे में है। प्रस्तावित रिपोर्ट शायद इस बात का दावा करती है कि पेशेवर अपराधी दवा के प्रभाव में भी झूठ बोल सकते हैं और वास्तविक तथ्यों को सफलतापूर्वक छिपा सकते हैं।

वैसे यह कोई पहली दफा नहीं कि नार्को टेस्ट की वैज्ञानिकता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। यह जानना भी दिलचस्प है कि अपने यहां भले ही नार्को परीक्षण लोगों को नया नज़र आता हो, विकसित देशों में तो वह वर्ष 1922 में नार्को परीक्षण मुख्यधारा का हिस्सा बना था जब राबर्ट हाउस नामक टेक्सास के डॉक्टर ने स्कोपोलामिन नामक ड्रग का दो कैदियों पर प्रयोग किया था।

क्या किसी शख्स को जो पुलिस की कस्टडी में हो, कोई दवा पिला कर जिससे वह अर्ध्दबेहोशी की हालत में चला जाए, वह सही-गलत सोचने की स्थिति में न रहे, हम ऐसे जवाबों की उम्मीद कर सकते हैं जो किसी घटनाविशेष में उसकी कथित सहभागिता या सक्रियता को उजागर करती हो ? विकसित दुनिया के बाकी हिस्सों ने ऐसे परीक्षणों से भले ही तौबा की हो, - ज्यादातर जनतांत्रिक दुनिया जिसमें अमेरिका और ब्रिटेन भी शामिल हैं, वहां ऐसे परीक्षण बदनाम हुए हों - पिछले कुछ समय से अपने यहां ऐसे परीक्षणों की 'लोकप्रियता' बढ़ती ही जा रही है।

पिछले साल संसद में विश्वासमत पर चर्चा के दौरान नोट लहरानेवाले सांसदों के नार्को टेस्ट की मांग करके जनाब लालू यादव ने इसकी इसी 'लोकप्रियता' को रेखांकित किया था। किसी अपराध के संदिग्ध पकड़े जाने के बाद लोग ही मांग करने लगते हैं कि इनका अगर नार्को टेस्ट हो जाए तो सच्चाई उगल देंगे। एक ऐसी हालत बन रही है कि इसकी छदम् वैज्ञानिकता से अभिभूत प्रबुध्द समुदाय के लोग भी यह नहीं सोचने को तैयार होते कि ऐसे परीक्षणों के माधयम से हम अभियुक्त के मानवधिकारो के हनन को, उसे यातना देने के काम को नयी वैधाता प्रदान कर रहे हैं।

नार्को टेस्ट को लेकर अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सी आई ए का अपना अनुभव रेखांकित करने लायक है। शीतयुध्द के दिनों में जबकि उसे हर जगह कम्युनिस्ट क्रान्ति का खतरा दिखता रहता था, उसने नार्को टेस्ट को आजमाकर लोगों से सच उगालने की काफी कोशिश की, और यही निष्कर्ष निकाला कि ऐसे परीक्षण कत्ताई फलदायी नहीं होते। न सूचनाएं मिलती हैं, न सच उगला जाता है अधिक-से-अधिक यही होता है कि बन्दी विभ्रम का शिकार हो और मनोरोगी की तरह व्यवहार करने लगे, जो किसी भी तरह मामले की जांच में सहयोगी नहीं बन सकता । यह अकारण नहीं कि अमेरिकी सीनेट के सामने हुई सुनवाई में उसने उसी वक्त (1977) यह बता दिया था कि 'सच उगलनेवाली कोई जादूई दवाई की बात अधिक से अधिक जनमानस के कल्पनाजगत का हिस्सा' हो सकती है, लेकिन उसका कोई भौतिक आधार नहीं है।

वैसे इन परीक्षणों से जुड़े अन्य आयामों की चर्चा के पहले यह जान लेना जरूरी है कि नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग और लाई डिटेक्टर टेस्ट आदि में होता क्या है ? नारको एनैलिसिस टेस्ट एक फोरेन्सिक टेस्ट है जिसे टेस्ट जांच अधिकारी, मनोवैज्ञानिक, डॉक्टर और फोरेन्सिक एक्स्पर्ट की मौजूदगी में अंजाम दिया जाता है। इसमें संदिग्धा व्यक्ति को सोडियम पैंटोथेल नामक कैमिकल का इंजेक्शन दिया जाता है, जिससे न केवल वह अर्ध्दबेहोशी की हालत में चला जाता है बल्कि उसकी तर्कबुध्दि/रीजनिंग भी खत्म हो जाती है और फिर उससे सवाल पूछ कर जानकारी उगलवायी जाती है। वह व्यक्ति जो एक तरह से सम्मोहनावस्था में चला जाता है वह अपनी तरफ से ज्यादाकुछ बोलने की स्थिति में नहीं होता बल्कि पूछे गए कुछ सवालों के बारे में कुछ बता सकता है। जो लोग यह मानते हैं कि नार्को परीक्षणों में व्यक्ति हमेशा सच ही उगलता है। दरअसल उस अवस्था में भी वह झूठ बोल सकता है, विशेषज्ञों को भरमा सकता है।

दूसरी तरफ ब्रेन मैंपिंग में अभियुक्त को कम्प्युटर से जुड़ा एक हेलमैट पहनाया जाता है जिसमें कई सेन्सर और इलैक्ट्रानिक उपकरण लगे होते हैं। फिर जांच अधिाकारी एवम फोरेन्सिक विशेषज्ञ की मौजूदगी में उसे अपराधा से जुड़ी तस्वीरें दिखायी जाती है। इसे देख कर अभियुक्त के दिमाग में उठी हलचलों की इलैक्ट्रिकल फिजियोलॉजिकल गतिविधियों का विश्लेषण किया जाता है। लाइ डिटेक्टर टेस्ट में अभियुक्त के शरीर के अलग-अलग भागों पर रक्तचाप नापने की मशीन लगाई जाती है और उससे सवाल पूछे जाते हैं। यह धारणा काम करती है कि अगर अभियुक्त अपराधा में शामिल रहा होगा तो उसके रक्तचाप में अधिाक उतार-चढ़ाव होंगे, जिसे नापा जा सकेगा। संविधान का एक अहम तत्व है धारा 20 (3) जो कहता है कि किसी व्यक्ति को ''जिस पर कोई आरोप लगे हैं उसे अपने खिलाफ गवाह के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाएगा "no person accused of any offence shall be compelled to be a witness against himself"। अगर हम नार्को टेस्ट की बुनियादी अन्तर्वस्तु को समझने की कोशिश करेंगे तो यही कह सकते हैं कि इसके जरिए व्यक्ति को एक तरह से 'अपने खिलाफ गवाह के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की सम्भावना रहती है। इसमें कोई दोराय नहीं कि नार्को टेस्ट में कोई व्यक्ति कुछ भी प्रलाप करे या पुलिस उससे जबरन कबूलवाये, अपराधा को साबित करने के लिए प्रमाणों की आवश्यकता होती ही है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि अभियुक्त की मर्जी के खिलाफ दवा पिला कर उससे जानकारी लेने की इस कोशिश को मद्रास हाईकोर्ट तथा बम्बई हाई कोर्ट ने यातना के श्रेणी में रखने से मना किया और ऐसा तर्क दिया कि 'अभियुक्त को भले ही उसकी इच्छा के विरूध्द प्रयोगशाला में ले जाया जाए, लेकिन परीक्षणों के दौरान वह जो बात प्रगट करे वे स्वैच्छिक हो सकती है।' सुप्रीम कोर्ट में वकील के तौर पर कार्यरत श्री राकेश शुक्ला, जो मानवाधिाकार आन्दोलन से भी जुड़े हैं, अपने आलेख 'द टूरथ मशीन' ( इंडियन एक्स्प्रेस 16 जुलाई 2008) में कहते हैं कि 'यह उसी तरह से हुआ कि किसी व्यक्ति को इतना पीटा जाए कि वह टूट जाए और बाद में जब वह कुछ बात उगलने लगे तो इस प्रगटीकरण को 'स्वैच्छिक स्वीकृति' कहा जाए।

 

 

सुभाष गाताड़े