संस्करण: 08 फरवरी-2010

भाजपा में राजनीतिक प्रशिक्षण का प्रस्ताव
विचार तो अच्छा है, भविष्य जैसा भी हो
 

वीरेंद्र जैन

त्ता सुख के अभ्यस्त हो चुके संघ परिवार से सत्ता छिनने के बाद परिवारी जन इतने बेचैन हो गये हैं कि सत्ता पाने के लिये दिन- प्रतिदिन नये नये प्रयोग करने के विचार करने लगे हैं। भाजपा में बने रहने वाले कुछ शिक्षित और समझदार लोगों में से एक अरुण शौरी ने हम्पी डम्पी और एलिस इन वंडरलेंड जैसे जुमले यों ही नहीं उछाले थे अपितु इनमें वे सारे बिम्ब निहित थे जिन्हें वे भाजपा में महसूस कर रहे थे। आडवाणी और राजनाथ सिंह को हटाने और लोकसभा तथा राज्यसभा में वकीलों को नेता पद देने का मामला ही नहीं अपितु नितिन गडकरी को अध्यक्ष बनाने की घटना भाजपा के अन्दर भी ठीक से हजम नहीं हो रही है भले ही वह अभी खुल कर सामने नहीं आयी हो। इनकी परम्परा को देखें तो पता चलता है कि इनका सच तब ही खुल कर सामने आता है जब कोई साहस करके पार्टी से बाहर आ जाता है। जनसंघ के पहले अध्यक्ष मौल्लि चन्द्र शर्मा, बलराज माधोक, से प्रारम्भ कर मदन लाल खुराना, गोविन्दाचार्य, उमा भारती, कल्याण सिंह, सुब्रह्यम स्वामी, जसवंत सिंह, बाबू लाल मराण्डी समेत ऐसे नेताओं की एक लम्बी श्रृंखला है।

सत्ता लोलुपों के जमावड़े में बदल चुकी भाजपा पर संघ द्वारा थोपे गये नये अध्यक्ष ने एक बहुत ही आदर्श प्रस्ताव किया है कि भाजपा में उदीयमान नेताओं के लिये तीन साल का कोर्स लागू किया जाये, जिसमें संसद की कार्यवाही से लेकर जमीनी जुड़ाव तक की सारी बातें समझाई जायें। गडकरी के राजनीतिक सलाहकार विनय सहस्त्रबुद्धे इस को लागू करने के लिये गम्भीरता पूर्वक काम करते हुये बताये गये हैं।

असल में ऐसे प्रशिक्षण की जरूरत भाजपा में उदीयमान नेताओं को ही नहीं है अपितु उदित होकर फल फूल रहे नेताओं को भी इसकी जरूरत है और अपेक्षोंत अधिक है, क्योंकि बाद में आने वाले तो अपने वरिष्ठजनों का ही अनुशरण करके सीखते हैं। वे जो संसद और विधान सभाओं में भेजे जाने की अपीलों के साथ जनता के बीच जाते हैं व उस अपील को सुन लिये जाने के कारण चुन लिये जाने के बाद सदन में नजर ही नहीं आते अपितु किसी उद्योगपति के फार्म हाउस, किसी ठेकेदार के पाँच सितारा होटल, या किसी भ्रष्ट अधिकारी के प्रकरण में मध्यस्थता करने हेतु सरकारी कार्यालयों में चक्कर लगाते देखे जाते हैं। इनमें बहुत सारे तो वे लोग होते हैं जिन्हें चुनाव जीतने के लिये उनकी लोकप्रियता के आधार पर कहीं से आयात किया हुआ होता है और वर्षों से काम कर रहे समर्पित कार्यकर्ता की जगह टिकट से नवाजा जाता है। वे सदन में एक वोट बड़ा देने का काम करने के बाद सम्पत्ति और सुख बटोरने के अपने मूल काम में जुट जाते हैं और एक गम्भीर सांसद को प्राप्त सारे विशेष अधिकारों का निज हित में दुरुपयोग करते रहते हैं। भाजपा के नये अध्यक्ष यदि सचमुच भाजपा की समीक्षा करना चाहेंगे तो वे पायेंगे कि पूरे ही कुँए में भांग पड़ी हुयी है। आज भाजपा का जो आकार दिख रहा है वह दरअसल एक झाग है जो सच्चाई की किरणों के आने पर बैठ जाने वाला है और अभी उन से भी बड़ा झाग उठाने वालों के आगे छोटा पड़ चुका है।

दूसरे दलों से दल बदल कर आये या मेनका गांधी वरुण गांधी की तरह आयात किये गये सबसे अधिक लोग भाजपा में हैं और ये लोग केवल पद के लिये टिकिट पाने हेतु ही भाजपा में आये हैं। उनके जातिवादी, क्षेत्रवादी आदि मूल आधारों के कारण उन्हें सदनों में पहुँचाया गया है। उनसे भाजपा के घोषित कार्यक्रमों के अनुसार काम करने की उम्मीद करना बेमानी है। गत कई वर्षों से लगातार पूर्व राजे महाराजे दोनों सदनों के लियेचुने जाते रहे हैं जिनकी संख्या सदन के कुल सदस्यों की एक चौथाई के आस पास रही है। इनमें से एक बड़ा हिस्सा भाजपा के सद्स्यों का रहा है। राजस्थान में सारे वरिष्ठ नेताओं को परे रख कर वसुन्धरा राजे को मुख्य मंत्री पद अर्पित किया गया था और उनके राजसी ठाट-बाठ ने प्रदेश भाजपा का भट्ठा ही नहीं बैठा दिया अपितु पार्टी को दो भाग में फाड़ कर रख दिया। वहाँ सरकार तो गयी ही पर जब हाई कमान ने विपक्ष के नेता पद से त्यागपत्र मांगा तो उन्हें अपनी औकात समझ में आ गयी। और दूसरी तरफ अगर ये राजे महाराजे न हों तो भी भाजपा को अपनी सच्ची हैसियत का पता चल जाये। पूर्व राजे महाराजे ही नहीं भगवा भेष का स्वाँग भरने वाले तथाकथित संत, सावी, मठाधीश, आदि भी वोट बटोरने के लिये जुटाये जाते रहे हैं, भले ही बाद में उन्होंने भी पार्टी की खूब ले दे की हो। भोली भाली और सरल चित्त जनता को बहकाने के लिये फिल्मी, और टी वी कलाकारों को चारा बना कर प्रस्तुत किया जाता रहा है जिनमें, शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, हेमा मालिनी, धर्मेन्द्र, दारा सिंह, नितीश भारद्वाज, दीपिका चिखलिया, अरविन्द त्रिवेदी, स्मृति ईरानी, आदि दर्जनों के रूप, अदाओं, भूमिकाओं, और लटकों झटकों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया की जड़ें हिलाने के लिये स्तेमाल किया गया। फूहड़ ढंग से अश्लील चुटकले सुनने सुनाने के लिये जाने जाने वाले पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी की लोकप्रियता को वोटों में बदलने से पहले यह भी नजीं देखा गया कि सम्बंधित पर एक हत्या मुकदमा भी चल रहा है। चेतन चौहान जैसे कुछ दूसरे खिलाड़ियों और मंच के असांस्कॄतिक कवियों की लोकप्रियता को भी संसद सदस्यता का चारा डाल कर भुनाया गया। तरह तरह के आर्थिक अपराधियों को गठबंधन में सम्मलित करने के लिये वे सारी बातें भुला दी जाती रहीं जो उससे पूर्व उनके खिलाफ बोली जाती रहीं थीं। असल में ये तो कुछ मोटे मोटे उदाहरण हैं, किंतु विस्तार में जाने पर सत्तालोलुपता के लिये किये गये सैद्धांतिक विचलनों और अनैतिक समझौतों के साथ आर्थिक भ्रष्टाचार का बहुत ही काला इतिहास भरा हुआ है। ये इतिहास साम्प्रदायिकता से सरावोर मूल सिद्धांतों के दोषों से अलग है जो मन और वचन के दोहरेपन के नंगा उदाहरण प्रस्तुत करता है।

अभी प्रस्तावित कोर्स का पाठयक्रम घोषित नहीं हुआ है और पता नहीं कि भाजपा के नये अध्यक्ष उदीयमानों को ऐसा क्या सिखाने वाले हैं जिससे उपरोक्त हथकण्डों से भाजपा को मुक्ति मिल सके, किंतु इतना तो तय है कि प्रस्तावित आदर्श प्रयास में उनका तात्कालिक बनावटी विस्तार किसी फूले हुये गुब्बारे की हवा निकल जाने की तरह हो जायेगा, क्योंकि आजकल भाजपा की पहचान और अस्तित्व के पीछे इन्हीं अनैतिकताओं की प्रमुख भूमिका है। ऐसी दशा में उनका आकार मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के आकार जैसा हो जायेगा जिसने विस्तार न होने की कीमत पर भी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। नये अध्यक्ष से वैसे तो उम्मीदें होना स्वाभाविक हैं किंतु झारखण्ड में शिबू सोरेन के साथ किये गये समझौते ने- प्रथम ग्रासे मक्षिकापात- वाला दॄष्य उपस्थित किया हुआ है। आदर्शों के लिये बलिदान देना पड़ता है और जब तक भाजपा अपने विस्तार का लालच छोड़ कर सिद्धांतों को आगे नहीं रखेगी तब तक बड़बोली घोषणायें उसे और अधिक हास्यास्पद और अविश्वसनीय ही बनायेंगीं, और फिर कोई अरुण शौरी एलिस इन वंडरलेंड़- का जुमला दुहरायेगा।

 
वीरेंद्र जैन