संस्करण: 08 फरवरी-2010

मध्यप्रदेश में सत्ता की राजनैतिक साजिश
दोषी हो रहे दोषमुक्त, निर्दोषों पर प्रकरण दर्ज

 

अजय सिंह 'राहुल'

  ध्यप्रदेश की भाजपा सरकार को न तो प्रदेश के विकास-कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में रूचि है और न ही प्रदेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने की कोई चिंता। प्रदेश में, हर क्षेत्र में अराजकता का बोलबाला है तथा चारों तरफ भ्रष्टाचार पनप रहा है। सत्ता में बैठे क्षत्रप अपना राजनैतिक विद्वेष भुनाने के लिए सरकारी जांच एजेंसियों को हथियार बना रहे हैं। अनेक ऐसे उदाहरण देखे जा सकते हैं जिनमें आर्थिक अपराध अनुसांधान ब्यूरो का सरकार द्वारा राजनैतिक आधार पर इस्तेमाल किया जा रहा है। ब्यूरों में सत्ता द्वारा झूठे प्रकरण दर्ज कराये गये हैं और राजनीति से झूठे प्रकरण दर्ज कराये गये हैं और राजनीति से जुड़े सत्तारूढ़ दल के लोगों की अनियमितताओं को बख्शा जा रहा है तथा कांग्रेस पार्टी के नेताओं को झूठे प्रकरण बनाकर उन्हें फंसाया जा रहा है। अनियमितताओं से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों को भी निर्दोष करार कर भेदभाव और पक्षपात पूर्ण कार्यवाही की जा रही है। केंद्रीय जिला सहकारी बैंक ग्वालियर और मप्र सहकारी आवास संघ के इस ब्यूरों में दर्ज प्रकरणों में की जा रही साजिश पूर्ण कार्यवाही राजनैतिक विद्वेष का सबसे बड़े उदाहरण के रूप में देखी जा सकती है। मध्यप्रदेश में आर्थिक अपराध ब्यूरो द्वारा जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित ग्वालियर के एक प्रकरण में वास्तविक अपराधियों को बचाकर राजनैतिक विद्वेष और कपटपूर्वक निर्दोष लोगों को फंसाने के लिए अपराध दर्ज किया गया है। प्रकरण में जिन बिंदुओं का उल्लेख कर रु 50.00 क़रोड़ से अधिक के गबन का आरोप लगाया गया है वह गबन नहीं बल्कि ऋण वितरण है। इसमें अधिकांश ऋण् की वसूली भी हो चुकी है। बैंक के कुछ ऋणी मौजूद हैं, जिनमें से बैंक ऋण वसूल नहीं कर रहा है आरोप में रु 400.00 क़रोड़ से अधिक की अनियमितता होने की संभावना व्यक्त की गई है। जो अपने आप में हास्यास्पद है। क्योंकि जिला सहकारी बैंक, ग्वालियर द्वारा सभी प्रकार के ऋणों को मिलाकर भी रु 400 क़रोड़ से अधिक के ऋण नहीं बांटे गये हैं। ऐसे में रु 400 क़रोड़ से अधिक की ऋण अनियमिताओं के प्रकरण बताना, अपने आप में मानसिक दिवालिया होने का प्रमाण है। वहीं जिन रु 50 क़रोड़ की बात की जा रही है उनमें भी लगभग रु 30 क़रोड़ के ही ऋण बांटे गये हैं। जिनमें से लगभग 20 करोड़ के ऋणों की वसूली हो चुकी है। जो ऋण प्रकरण शेष है, उनमें बैंक के वर्तमान प्रबंधन द्वारा कालातीत ऋणियों से वसूली की प्रभावी कार्यवाही न करने के कारण स्थिति निर्मित हुई है।

राजनैतिक रागद्वेष के कारण भाजपा की सरकार ने इंदौर एवं देवास में पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह, पूर्व मंत्री चौधरी राकेश सिंह, श्री चंद्रप्रभाष शेखर तथा श्री मोहन सिंह बुंदेला के विरुद्ध भी साजिश पूर्वक अपराध पंजीकृत किये हैं। विभिन्न अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा की गई अनियमितताओं में लिप्त संबंधित अधिकारी कर्मचारियों को प्रदेश सरकार द्वारा बचाया जा रहा है तथा राजनैतिक विरोधियों के विरुद्ध झूठे अपराध पंजीकृत कर आर्थिक अपराध ब्यूरों को अपने विरोधियों के विरुद्ध एक हथियार के रूप में उपयोग किया जा रहा है। हर स्तर पर झूठे मामले तैयार करके राजनैतिक विरोधियों को बिना किसी अपराध फंसाने की साजिश की गई है। शासन तथा आर्थिक अपराध ब्यूरों के द्वारा पक्षपात एवं साजिश का प्रथम दृष्टया यह प्रमाण है कि ग्वालियर बैंक में जिन लोगों के विरुद्ध अपराध पंजीकृत किये गये हैं, उनका ऋण स्वीकृत करने से कोई संबंध नहीं था। यही नहीं प्रकरण में कुछ शासकीय अधिकारियों के विरुद्ध भी एफआईआर दर्ज की गई है, जबकि उन्हीं बैठकों में उपस्थित अन्य शासकीय अधिकारियों के नाम छोड़ दिये गये हैं। इस प्रकार कुछ शासकीय अधिकारियों के नाम शामिल कर तथा कुछ के नाम छोड़ देना, अपने आप में पक्षपात तथा साजिशपूर्ण कार्यवाही का प्रमाण है। यही नहीं संचालक मंडल के कांग्रेसी सदस्यों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की गई है परंतु तत्समय कांग्रेस में रहे तथा वर्तमान में भाजपा में शामिल हो चुके संचालकों के नाम एफआईआर से हटा दिये गये हैं।

सहकारी बैंक की उपविधियों के अनुसार ऋण स्वीकृत करने का अधिकार बैक के प्रबंधक /महाप्रबंधक या ऋण समिति को ही हैं और इसके लिए ऋण वितरण में अनियमितता करनेवाले ही मूलत: दोषी हैं। परंतु शासन-द्वारा ऐसे दोषियों को बचाकर अपने राजनैतिक विरोधियों पर कार्यवाही करना स्पष्टत: राजनैतिक विद्वेष की कार्यवाही है।

आर्थिक अपराध ब्यूरों की साजिश एवं पक्षपातपूर्ण तथा अपराधियों को संरक्षण देने का दूसरा प्रमाण यह है कि मप्र राज्य सहकारी आवास संघ में 50 करोड़ से अधिक के प्रमाणित फर्जी ऋण वितरण के अपराध मेरी अनुशंसा पर पंजीकृत किये गये थे, जिसमें ऋण वितरण के दोषी सभी को एफआईआर में आरोपी बनाया गया था। परंतु आवास संघ में आर्थिक अपराध ब्यूरों द्वारा मूल दोषी अधिकारियों पदाधिकारियों को पूर्णत: निर्दोष बताकर आवास संघ के अत्याधिक निचले स्तर के कर्मचारी को मात्र दोषी बता दिया गया। जबकि फर्जी ऋण स्वीकृत करके वितरण करने वाले और उसका सत्यापन करनेवाले प्रबंधक संचालक, महाप्रबंधक, अभियंता को एफाआईआर में दोषी बताने के बाद छोड़ दिया गया और क्षेत्रीय कार्यालय मात्र को ही पूरी तरह दोषी बताया गया। इस प्रकार आवास संघ में फर्जी ऋण वितरण कर आवास संघ को बंद करने की कगार पर पहुंचाने वाले मूल दोषियों को आर्थिक अपराध ब्यूरो तथा सहकारिता विभाग द्वारा पूरा संरक्षण दिया गया। लिपिक स्तर के निर्दोष कर्मचारी, जिन्होंने केवल प्राप्त होने वाले प्रकरणों को अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत किये गये थे, उनके विरुद्ध चालान प्रस्तुत कर मूल आरोपियों को निर्दोष कर दिया गया है। आवास संघ में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर ऋण वितरण के लिए उत्तरदायी आवास संघ के प्रबां संचालक महाप्रबंधक तथा अभियंताओं के विरुद्ध कार्यवाहीं नहीं की गई। जबकि एक प्रकरण में आर्थिक अपराध ब्यूरों के एक अपराध के विरुद्ध माननीय उच्च न्यायालय में याचिका प्रस्तुत करने पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा स्पष्टत: प्रबंधक संचालक एवं अन्य के विरुद्ध वर्ष 2004 में कार्यवाही के आदेश दिये थे। परंतु माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के 5 वर्ष पश्चात भी उस प्रकरण् में प्रबंधक संचालक एवं अन्य अधिकारियों के विरुद्ध आज तक कार्यवाही नहीं की गई है वहीं आवास संघ के अन्य 13 प्रकरणों में भी प्रबां संचालक, महाप्रबंधक एवं अन्य पदाधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज होते हुए भी, चालान प्रस्तुत करते समय कनिष्ठ कर्मचारियों पर धोखाधाड़ी का आरोप लगाकर वरिष्ठ अधिकारियों को दोषमुक्त कर दिया गया। किन्हीं एक या दो प्रकरणों में तो कनिष्ठ कर्मचारी इस तरह की गतिविधि कर सकते हैं परंतु हजारों की संख्या में ऐसे प्रकरणों में केवल लिपिक स्तरीय कर्मचारी को दोषी बताकर प्रबां संचालक महाप्रबंधक अभियंता एवं पदधिकारियों को निर्दोष बता देना, अपने आप में ये प्रमाणित करता है कि आर्थिक अपराध ब्यूरो निष्पक्ष जांच न कर अपने राजनैतिक आकाओं के इशारों पर निर्दोषों को फंसाने तथा दोषियों को बचाने का राजनैतिक हथियार बन चुका है।

उपरोक्त दोनों प्रकरणों में आर्थिक अपराध ब्यूरों स्वयं अपराधियों को बचाकर निर्दोषों को फंसाने की साजिश कर रहा है इसलिए आर्थिक अपराध ब्यूरों की भूमिका पूरी तरह स्वयं साजिशकर्ता की हो गई है। इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि आवास संघ और जिला बैंक, ग्वालियर के सभी ऋण प्रकरणों के संबां में लोकायुक्त द्वारा जांच अपने हाथ में लेना चाहिये तथा जांच में वास्तविक अपराधियों के विरुद्ध कार्यवाही के साथ निर्दोषों को फंसाने की साजिश करनेवाले आर्थिक अपरधा ब्यूरों के अधिकारियों तथा सहकारिता विभाग के साजिशकर्ता अधिकारियों के विरुद्ध भी कार्यवाही की जानी चाहिये।

आवास संघ एवं जिला सहकारी बैंक ग्वालियर के प्रकरणों में राजनैतिक विद्वेष से कार्यवाही जारी रहेगी तथा वास्तविक अपराधियों को बचाकर निर्दोषों को फंसाया जायेगा तो मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार द्वारा की जा रही ऐसी कार्यवाहियों का विरोध करते हुए वौधानिक संघर्ष किया जायेगा।

अजय सिंह 'राहुल'
(लेखक मप्र विधानसभा के सदस्य और प्रदेश कांग्रेस चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष हैं)