संस्करण: 07 मार्च -2011

बाजार पर नियंत्रण से घटेगी मॅहगाई

? डॉ. सुनील शर्मा

 

केन्द्र सरकार के खुसनुमा बजट के बाद भी मंहगाई का डर हावी है। मंहगाई रोकने के उपायों पर विचार करने केन्द्र सरकार द्वारा गठित टास्कफोर्स की रिपोर्ट भी आ गई है। पिछले तीन सत्रों से जारी मंहगाई के कहर से देश भर में आम उपभोक्ता त्रस्त है,सरकार की तमाम कोशिशों के बीच उपभोक्ता वस्तुओं के दाम काम नहीं हो पा रहें हैं। फसलों के बारें में कोई भी खबर बाजार को हिला डालती है,कीमतों के विषय में इतनी संवेदनशीलता है कि हर घंटे दाम बदल जाते है। मौसम, हवा और पानी की रफतार भी मिनटों में बाजार के हालात बदल देते हैं। बाजार के हालात ऐसे है कि वस्तुओं के थोक मूल्यों की तुलना में फुटकर मूल्यों का कोई निर्धारित पैमाना नहीं है बल्कि विक्रेता के मनमर्जी पर निर्भर है कि वो किस मूल्य पर कौन सा सामान बेंच रहा है। कीमतों की मनमर्जी पैक सामान के साथ साथ खुले सामान जैसे कि खाद्यान्न वस्तुओं पर सामान रूप से चल रही है। मनमानी कीमतों के बाद गुणवत्ता का कोई ठिकाना ही नहीं है क्योंकि बाजार के रेला में हर माल बिक रहा है। दुकानों में तो कोई न तो मूल्य की सूची मिलती है और न ही गुणवत्ता की जानकारी। वस्तुओं के थो और खुदरा मूल्यों में दुगुना तक अंतर चल रहा है। सब्जी और फलों के मामले में भी स्थिति और भी ज्यादा गंभीर है। कुल मिलाकर मंहगाई ने आम आदमी का जीवन कष्टमय कर दिया है। मॅहगाई का रेला सिर्फ खाद्यान्न ही सीमित नहीं है बल्कि हर उपयोगी वस्तुओं के दाम आसमान पर है। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि बाजार की कीमतों का फायदा कच्चे माल के उत्पादकों अर्थात किसानों को नहीं मिल पा रहा है। जैसे बाजार में किसान को चने की कीमत 20 से 22 रूपए प्रति किलोग्राम मिलती हैं जबकि उपभोक्ता को चने से तैयार बेसन की खुदरा कीमत पचास रूपए प्रति किलोग्राम देना पड़ रही है। जहॉ किसान को गेंहू की अधिकतम कीमत 13 रूपये प्रति किलोग्राम मिल रही है वहीं उपभोक्ता को मैदा 30 रूपये प्रति किलोग्राम मिल रही है। किसान को खड़ी तुअर की कीमत 30 से 35 रूपये प्रति किलोग्राम मिल रही है वहीं उपभोक्ता को  इसकी दाल 70 से 80 रूपये प्रति किलोग्राम  मिल रही है। मसालों के मामले में कीमतों का अंतर और भी ज्यादा क्योंकि उपभोक्ता कम मात्रा में और कभी कभी खरीदता है इसलिए वह इनकी कीमत से लगभग अनजान सा रहता है और जिस कीमत पर दुकानदार यह सामान बेचता है उसे ग्राहक यह सोचकर कि मंहगाई बढ़ गई हेै अत: इनकी कीमते भी ज्यादा हो गई होगीं। उपभोक्ता को पैक सामान की कीमतों में ठगा जा रहा है जैसे नमक जैसे अत्यावश्यक उत्पाद के खुदरा पैक पर मनमानी कीमत अंकित रहती है फिर दुकानदार की मर्जी वो कितने रूपयें में इसे बेच रहा है। अक्सर सामान की कीमतें दुगुना लिखकर उसपर छूट का आफर चलता है कुछ समय बाद यह छूट समाप्त कर बढ़ी हुई कीमतों पर ही सामान बेंचा जाने लगता है। आज की स्थिति में देश का उपभोक्ता असहाय है व्यापारियों पर सरकारी तंत्र का कोई असर नजर नहीं आता है। आज व्यापारियों की जमाखोरी के चलते कभी भी किसी वस्तु के दाम बेलगाम हो जाते है। नई फसल आने पर भी दाम बढ़ने लगते है। मॅहगाई की आग को वायदा बाजार हवा देने का काम करता है। वायदा बाजार की हवा वस्तुओं की कीमतों में पंख लगा देती है इससे उपभोक्ता लुट रहा है व्यापारियों और दलालों की चॉदी है।वायदा बाजार से उत्पादक किसानों को कोई लाभ नहीं होता है उनके उत्पाद तो व्यापारी सस्ते में खरीद लेते है।

आज व्यापारी और दलालों की वजह से बेलगाम होती कीमतों पर रोक के उपायों पर चिंतन की आवश्यकता है। पहला उपाय तो ये होना चाहिए कि खुदरा व्यापारियों पर नियंत्रण किया जाए सरकारी अमला ये सुनिश्चित करे की वो थोक मूल्यों के आधार पर एक निश्चित मार्जिन से सामान बेचें,हरेक सामान का बिल अनिवार्य रूप से दें तथा स्टाक का खुलासा करते रहें। दुकान के बाहर खुदरा और फुटकर दामों की सूची लगाए। लेकिन बिल की अनिवार्यता, वस्तुओं की गुणवत्ता और कीमतों के अंतर से बचने के इनके पास हजारों तरीके हैं। भ्रष्ट अफसरशाही और उदारीकृत व्यवस्था के बीच देश भर के करोड़ों व्यापारियों को नियंत्रित करना कठिन कार्य है। इसका दूसरा उपाय हो सकता है कि सुपर बाजार सरीखें माल या संगठित रिटेल मार्केट को प्रोत्साहित किया जाए क्योंकि इनकी तमाम आलोचनाओं के बीच यह सबके सामने है कि इनमें हरेक खरीदी का बिल मिलता हैं जिसें कीमत के साथ सरकारी टैक्स तथा वस्तु की गुणवत्ता के अनुसार उस पर कीमतें अंकित रहती हैं इनमें कीमतों की मनमर्जी कम ही नजर आती है। इनके समूहीकृत और कम्प्यूटरीकृत होने के कारण इनपर पर नजर रखना ज्यादा सहज है।इन्हें प्रोत्साहन से उत्पन्न प्रतिस्पर्धा की वजह से खुदरा व्यापारी अपने अस्तित्व को बचाने स्वयं सुधरने मजबूर होगें। मंहगाई नियंत्रण का दूसरा उपाय है कि वायदा बाजार से अत्यावश्यक उपभोक्ता वस्तुओं को दूर रखा रखा जाए, क्योंकि वायदा बाजार अनुमानों के आधार पर चलता है और उत्पादन के अनुमान मानसून आधारित हमारे देश के लिए हर दिन बदलते है और इससे कीमतों में लगातार उतार चढ़ाव होता रहता है। जिससे उपभोक्ता को तो नुकसान होता ही साथ ही किसान को कोई फायदा नहीं मिलता है और कीमतों की सारी मलाई व्यापारी लूटते हैं। मंहगाई रोकने उपायों में कुछ व्यवस्थागत सुधार भी जरूरी है जैसे देश में उत्पादन का लगभग दस फीसदी खाद्यान्न उचित भण्डारण के अभाव में नष्ट हो जाता है अत: देश भर में गोदामों की व्यवस्था जरूरी है इसके लिए सरकार एक गॉव एक गोदाम का लक्ष्य निर्धारित करे। हर साल सब्जी और फल उत्पादन का चालीस फीसदी उत्पादन उचित संधारण के अभाव में नष्ट हो जाता है इसके लिए कोल्ड स्टोर की स्थापना हर ब्लाक स्तर पर आवश्यक है। रिटेल स्टोर खोलने को तैयार कम्पनी को गोदाम और कोल्ड स्टोर की व्यवस्था के लिए तैयार करना चाहिए। किसानों को मंडियों में उनके उत्पाद का सही दाम ,सही तौल हो त्वरित भुगतान हो इसकी व्यवस्था निश्चित करनी चाहिए। निजी कम्पनियों द्वारा किसानों से अनाज और अन्य उत्पाद खरीदने की व्यवस्था से उन्हें सही कीमतें मिल पाना आसान होगा,लेकिन सरकार इनके भण्डारण पर नजर रखे। ऐसी खाद्य वस्तुए जिनकी खरीद सरकारी नियंत्रण में होती है जैसे कि गेहू, धान तथा इनसे तैयार मैंदा,चावल और रवा तथा तेल, शक्कर और नमक के दाम सरकारी नियंत्रण के अनुसार तय होना चाहिए। कीमतों पर नियंत्रण के लिए जरूरी है कि उत्पादन लागत के आधार पर ही कीमतें निर्धारित हो लुभावनी पैंकिंग के आधार पर कीमतें निर्धारित नहीं होनी चाहिए। अगर सरकार किसी चीज के दाम में कमी करती है तो उसका फायदा तुरंत उपभोक्ता को मिले इसके लिए केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकार की भी जिम्मेदारी होनी चाहिए। देश के गरीब नागरिक जो भूख एवं कुपोषण से जूझ रहे है इनकी सुरक्षा बाजार पर सरकारी नियंत्रण से ही संभव है क्योंकि खुला बाजार इन सबकों लील जायेगा और देश में भूख से होने वाली मौतों को कोई नहीं रोक पायेगा।


? डॉ. सुनील शर्मा