संस्करण: 07 मार्च -2011

चतुराई से भरा आम बजट
 

? प्रमोद भार्गव

 

स्ती लोकप्रियता से दूर यह इतना चतुराई से भरा आम बजट है कि इसमें उन सभी मुद्दों के मुंह मिलने की कोशिश की गई है, जिनके बूते कांग्रेस की प्रतिष्ठा तो दाव पर लगी ही थी, संसद से सड़क तक उसकी छीछालेदर भी हो रही थी। इसलिए इसमें जहां आयकर की सीमा बढ़ाकर बंधी आय से जुड़े लोगों को लाभ दिया गया, वहीं गरीबी रेखा के दायरे में जीवन यापन करने वालों को कैरोसिन, घरेलु गैस व किसानों को खाद पर सीधी छूट देकर उन्हें तो लुभाया ही गया, इस सप्लाई लाइन के जरिये भ्रष्टाचार से अर्जित कालेधन के फैलते सुरसामुख पर भी लगाम कसी गई है। कृषि को लाभ का धंधा बनाने के दृष्टिगत एक साथ एक तीर से दो निशाने साधो गए हैं। खाद्य प्रसंस्करण और शीत भण्डारों से संबंधित उपकरणों पर एक्साइज डयूटी घटाकर व कुछ सब्सिडी देकर जहां उद्योग जगत को सीधा मुनाफा पहुंचाया है, वहीं फल व सब्जियों के भण्डारण से किसानों के लाभान्वित होने की उम्मीद की जा सकती है। आंगनवाडी कार्यकर्ताओं की तनख्वाह दोगुनी कर, करीब 20 लाख महिलाओं को लाभ दिया गया, वहीं वातानुकूलित अस्पतालों को मंहगा करने के प्रस्ताव ने रोगियों को खतरे में डाल दिया। इन लुभावने प्रस्तावों के बावजूद इस बजट में न तो बेरोजगारी दूर करने के उपाय दिखे और न ही उन महिला और बच्चों का खयाल रखा, जिनकी दिहाड़ी मजदूर के रूप में असंगठित क्षेत्रों में 96 फीसद भागीदारी है। मंहगाई से मुक्ति के उपायों की भी सर्वथा अनदेखी की गई है। देश की आर्थिक प्रगति को रोजगारोन्मुखी बनाए जाने की जरूरत थी। ऐसा होता तो यह बजट समावेशी विकास की दिशा तय करता।

फौरी तौर से इस बजट में आम नागरिक से जुड़ी प्रशासनिक जटिलताओं को सरल बनाने की कोशिशें दिखाई दे रही हैं। यह स्थिति बहाल होती है तो यह बजट असमानता में कमी लाने की दृष्टि से एक टर्निंग पोर्इंट भी साबित हो सकता है। गरीबों के कैरोसिन, एलपीजी और खाद पर मिलने वाली छूट की राशि अब उत्पादक कंपनियों की बजाय सीधो उपभोक्ता को मिलेगी, वह भी सीधो नकद राशि के रूप में। महाराष्ट्र में ईमानदार अधिकारी यशवंत सोनवणे की हत्या के बाद ऐसी खबरों को बल मिला था कि गरीबों को जो छूट आधारित कैरोसिन उपलब्ध कराया जाता है, उसका 40 फीसदी हिस्सा तेल माफिया मिलावटखोरों को बेच देता है। पिछले साल के आम बजट में तेल और खाद पर मिलने वाली इस सब्सिडी की राशि 53000 करोड़ रूपये थी। जो मौजूदा वित्तीय साल में बढ़ाकर 245 प्रतिशत कर दी गई थी। हालांकि कुछ गुलाबी हितों के पैरोकार अर्थशास्त्री चाहते थे कि इस छूट को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। लेकिन कांग्रेस को ऐसा करना इसलिए भी संभव नहीं था क्योंकि पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडू, पांडिचेरी और केरल में जल्द चुनाव संभावित हैं।

छूट की नकद राशि सीधो उपभोक्ता के खाते में जाए इस दृष्टि से भी बजट में कारगर उपायों का प्रावधान है। ई-प्रशासन को विस्तारित कर जहां पारदर्शी बनाए जाने पर जोर दिया गया है वहीं बहुउपयोगी पहचान पत्र के निर्माण में तीव्रता लाने का भी भरोसा जताया गया है। नंदन नीलकेणी अब दस लाख लोगों को प्रतिदिन क्रमांकित (नंबरिंग) कर उन्हें एक नई पहचान देकर ई-प्रशासन और ई-बैंकिग के लिए सुविधाजनक बनाकर पारदर्शिता लाएंगे। सामाजिक क्षेत्र के वंचित लोगों की मजदूरी से अर्जित ये निधियां सुरक्षित होती हैं तो महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना में काम करने वाले गरीबों के रोटी के हक को भी मजबूती मिलेगी। क्योंकि जिस तरह से पहचान-पत्र बनाने का दावा किया गया है, उसके चलते एक साल में 36 करोड़ पहचान पत्र लोगों को वितरित कर दिए जाएंगे और आगामी तीन सालों में यह कार्य पूरा हो जाएगा।

किसानों को कर्ज में छूट तो दी गई है लेकिन वे कर्ज से हमेशा के लिए मुक्त हो जाएं ऐसे ठोस उपाय नहीं सुझाये गए हैं। अब किसानों को 7 फीसदी ब्याज की दर से कर्ज मिलेगा, साथ ही जो किसान समय पर ऋण चुकाएंगे उन्हें एक प्रतिशत ब्याज की राहत अतिरिक्त मिलेगी, लेकिन यह राहत छलावा भर है क्योंकि प्रकृति की मार के साथ नकली खाद व बीजों की मार भी किसानों को झेलनी पड़ रही है। इसलिए समय पर कर्ज चुकाने में किसान आने वाले कुछ सालों में सक्षम हो जाएंगे, ऐसा लगता नहीं ? किसान या देश का वंचित तबका खाती-पीती स्थिति में आ जाएगा ऐसा भी इस बजट में लगता नहीं है। क्योंकि लोक कल्याणकारी योजनाओं अथवा विकासवादी अधोसरंचना के लिए कुल 10,000 करोड़ रूपये की वृध्दि की गई है। चूंकि बढ़ती मंहगाई पर किसी भी दशा में अंकुश लगता दिखाई नहीं दे रहा है इसलिए ऐसे हालात में यह बजट-वृध्दि मूल रूप में सिर्फ अर्थ-समायोजन का काम करेगी। मंहगाई पर काबू पाना फिलहाल इसलिए भी संभव नहीं है क्योंकि तेल उत्पादक अरब और अफ्रीकी देशों में राजनीतिक बदलाव का दौर चल रहा है। इस कारण इन देशों में अनिश्चिता की स्थिति बनी हुई है और प्रशासनिक व्यवस्था ठप है। कृषि बजट को 20 फीसदी बढ़ाने का दावा तो किया गया है, लेकिन यह विपुल धन राशि कहां से उत्सर्जित की जाएगी इसका कोई खुलासा नहीं है। हां कर्ज की ब्याज दरें घटाकर किसानों में कर्ज का प्रवाह जरूर बढ़ाने की कोशिश की गई है, जो किसानों को बदहाल बनाने का ही काम करेगी

आयकर सीमा में छूट देकर वित्ता मंत्री ने वेतनभोगियों का खयाल रखा है। ऐसा इसलिए भी जरूरी था क्योंकि केंद्र की यूपीए सरकार को चुनावी जंग में जाना है। हालांकि आय सीमा एक लाख 60 हजार से बढ़ाकर महज एक लाख 80 हजार की गई है। इस उपाय से इस आय में करीब 2020 रूपये का लाभ होगा। लेकिन वरिष्ठ नागरिकों को लाभ देने के बहाने भी सेवानिवृत्ता कर्मचारियों को लाभ दिया गया है। इस नजरिये से एक तो लाभ की उम्र 65 से 60 कर दी गई, वहीं दूसरी तरफ जो 80 साल से ऊपर की उम्र के लोग हैं वे 5 लाख की आमदनी होने पर भी कर सीमा में नहीं आएंगे। जाहिर है इस नीति-निर्धारण से जो उच्च पदों की सेवाओं से मुक्त हुए हैं, उन्हें ही ज्यादा लाभ मिलने वाला है। छोटे, मझोले व खुदरा व्यापारी और किसान तो इस उम्र तक बमुश्किल ही पहुंचते हैं।

शेयर बाजार में बजट आने के साथ ही जो उछाल आया है और उद्योग जगत की जिस तरह से प्रसन्न मुद्रा में प्रतिक्रिया मिल रही है उससे जाहिर है बजट कार्पोरेट जगत के लिए हितकारी है। वातानुकूलित उपकरणों में छूट की दृष्टि से जो 300 करोड़ का प्रावधान है, उससे उद्योग जगत की माली हालत में इजाफा होगा। एक्साइज डयूटी और कार्पोरेट टेक्स में भी कोई वृध्दि नहीं की गई। बैंकों के कर्ज प्रावधान भी 3.75 लाख हजार करोड़ से बढ़ाकर 4.75 लाख हजार करोड़ कर दिए गए हैं। आर्थिक और कृषि संबंधी सुधारों के बहाने यह राशि उद्योगपतियों को मिलने जा रही है। केंद्र सरकार कि लिए ये प्रावधान इसलिए भी जरूरी थे क्योंकि वह भारत की उभरती हुई महाशक्ति की आकांक्षा की बुनियाद को मजबूती देना चाहती है।

प्रणव मुखर्जी ने शिक्षा सुधारों को भी महत्व दिया है। सर्वशिक्षा अभियान का बजट 24 फीसदी बढ़ाया गया है और 'शिक्षा के अधिकार' को लागू करने के लिए 40 फसदी धन राशि मुहैया कराई गई है। लेकिन प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में विसंगति यह है कि अब दूरदराजों के ग्रामों तक शिक्षा का बुनियादी ढांचा तो कमोबेश खड़ा हो गया, परंतु शिक्षक की पहुंच पाठशाला में सुनिश्चित हो और शिक्षा में गुणवत्ताा आए इस लिहाज से सरकार की कोई इच्छाशक्ति देखने में नहीं आ रही है ?

इस बजट को ठीक-ठाक तो माना जा सकता है लेकिन यह न संतुलित बजट है और न ही समावेशी। यह कारगर बजट तब होता जब राजस्व को बढ़ाकर और खर्चों को कम कर राजकोषीय घाटे को सकल घरेलु उत्पाद के 4.8 फीसद स्तर पर रखने के लक्ष्य को हासिल करता।


? प्रमोद भार्गव