संस्करण: 07 मार्च -2011

दान में
धनवर्षा !

? अंजलि सिन्हा

 

क्या आप अन्दाजा लगा सकते है भारतवासी किस काम के लिये इतना बढ़ चढ़ कर चन्दा देंगे की दो घण्टों में ही दो सौ करोड़ की नगद और सोने के रूप में सम्पत्ति जमा हो जाये ? इतना ही नहीं इसके बाद भी हर रोज चेक और ड्राफ्ट के रूप में एक लाख रूपए से अधिक की रकम पहुंचने लगे ? अधिकतर लोग समझ जायेंगे क्योंकि वे अपने लोगों की प्रवृत्ति से वाकिफ होंगे या स्वयम् ही वैसे होंगे।

समाचार मिला है कि मथुरा में 108 एकड़ भूमि में प्रस्तावित 'श्री श्री वृन्दावन धाम' मन्दिर के लिये मानों धन की वर्षां हो रही है। वृन्दावन के चौमुहा में 23 से 25 जनवरी के बीच एक यज्ञ का आयोजन हुआ था जिसमें आयोजकों ने एक भव्य मन्दिर का प्रस्ताव रखा था जिसकी अनुमानित लागत करीब पांच सौ करोड़ बतायी गयी। समारोह में उपस्थित भक्तों ने अपनी तिजोरी और जेबें खाली करनी शुरू कर दीं तथा महिलाओं ने अपने शरीर पर पहने आभूषणों का दानपात्रा में ड़ालना शुरू कर दिया। बताया गया की दो घण्टों में दो सौ करोड़ रुपये का चन्दा एकत्र हो गया। तथा बाद में भी अभी तक इण्टरनेट, ड्राफ्ट, चेक से लगभग हर रोज ही एक लाख से उपर धन एकत्र हो रहा है। मध्य फरवरी तक लगभग 20 लाख इस तरह आ चुका है।

सवाल उठता है कि अपनी जेबें तक खाली कर देनेवाले इन्हीं दानदाताओं से यदि स्कूल, अस्पताल या अन्य कोई आपदा के लिये दान मांगा जाता तो क्या वे इतनी आसानी से और इतनी कीमत वाले दान देते? मानवीय आधारपर तो लोग कभी इतनी बड़ी रकम दान में नहीं देते लेकिन आस्था के नाम पर दान देने में कोई गुरेज नहीं न कोई शक या सवाल !

यह स्थिति तब है जब पहले से ही देशभर में मन्दिरों की कमी नहीं है। शायद जमीन कब्जा करने का यह सबसे बड़ा और प्रचलित माध्यम बन गया है कि वहां किसी सम्प्रदाय का प्रार्थनास्थल बना दिया जाय। नेशनल इन्स्टिटयूट ऑफ एजुकेशनल प्लॉनिंग एण्ड  एड़मिनिस्टेशन (न्यूपा) की 2009-10 कि रिपोर्ट हाल में आयी है। इसके अनुसार देश में प्रति दस किलोमीटर पर 1 से 8 वीं तक के स्कूलों की संख्या दो है तथा प्रतिदस किलोमीटर पर धर्मस्थलों की संख्या करीब चौदह है जिसमें मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरिजाघर आदि हैं। शिक्षा के अधिकार के तहत प्राइमरी स्कूल एक किलोमीटर के दायरे में होना चाहिये यानि दस किलोमीटर में दस स्कूल होने चाहिये। सर्वे के मुताबिक 2009 में प्राइमरी एवम् मिड़िल स्कूलों की संख्या 13 लाख थी जबकि 2001 की आंकड़ों के मुताबिक धार्मिक केन्द्रों की संख्या 25 लाख थी जो 2009 तक काफी बढ़ गयी होगी। इसके साथ ही गलीमुहल्लों के कई केन्द्रों की गणना नहीं हो पायी होगी क्योंकि स्कूलों की कुछ औपचारिकताएं होती हैं इसलिये उनकी गणना फिर भी ठीक से हो सकती है लेकिन छोटे-मोटे धार्मिक स्थल हर गलीकूचे में मिल जायेंगे जो कहीं पंजीकृत नहीं होते।

अधिकतर धार्मिक केन्द्रों पर आने वाले चढ़ावे या दान में मिली सम्पत्ति का कोई ब्योरा नहीं होता है लेकिन जितना होता है उससे उस क्षेत्रा के अथाह धनसम्पत्ति का अनुमान लगाया जा सकता है  मसलन शिरड़ी के साईबाबा की सम्पत्ति अरबों में आंकी गयी है। मन्दिर की तरफ सें सम्पत्ति का आंकड़ा पेश किया गया है वह है 32 करोड़ मूल्य के आभूषण तथा चार अरब से अधिक का निवेश है। यह वह है जो आधिकारिक दस्तावेज में सामने आया है। आन्ध्र प्रदेश के तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् के पास आठ हजार किलो तक के कीमती जवाहरात है जिसकी कीमत 52 हजार करोड़ रुपये आकी गयी है। केरल के गुरुवायुर मन्दिर में 400 किलोग्राम के जेवरात तथा 400 करोड़ का बैंक ड़िपॉजिट, 50 लाख तक के इन्श्योरन्स प्रीमियम सालाना है। अय्यप्पा सबरीमाला मन्दिर में तो सिर्फ दो महीने की अवधि में 150 करोड़ रुपये आय हो जाती है। गुजरात स्थित अंबाजी शक्तिपीठ यात्रा धाम के लिये1.23 अरब का बीमा कवच है जिसका प्रीमियम रु. 2,72,908 सालाना चुकाया जाता है। यह आतंकी हमलों के सन्देह के हिसाब से लिया गया है। दानस्वरूप आयी इस अकूत धनसम्पदा पर एक तो सरकार को टैक्स नहीं दिया जाता, दूसरे सरकार को ही जनता से मिले टैक्स में से इन धर्मकेन्द्रों के इर्दगिर्द कुछ सुविधाएं देनी होती है। तीर्थयात्री जब किसी हादसे के शिकार होते है तो धर्मकेन्द्र के प्रबन्धन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता न ही उसके अधिकारियों को या मालिकों को सजा मिलती है। इसकी अपेक्षा सरकार से की जाती है और सरकारें भी प्रबन्धन से न तो टॅक्स बसूलने में सख्ती करती हैं नही प्रबन्धन को जवाबदेह बनाने के लिये सख्त नियम-कानून बनाती हैं। उन्हें अपने धार्मिक जनता के वोटबैंक खिसकने का ड़र लगा रहता है। गत वर्ष सबरीमाला हादसे में जिसमें 102 श्रध्दालु भगदड़ में मारे गये थे। कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि श्रध्दालुओं की सुरक्षा के लिये उसने क्या किया है। केरल सरकार ने हाईकोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा है कि आगे ऐसे हादसे न हो इसके लिये वह एक कार्ययोजना तैयार कर रहा है जिसके तहत नीलाक्कल आधार शिविर विकसित किया जायेगा तथा कई अन्य उपाय भी सरकार करेगी। किसी ने मन्दिर प्रबन्धन के खिलाफ इस अव्यवस्था तथा हादसे के लिये कोई केस दायर नहीं किया है।

इलाहाबाद में 2012-13 में होने वाले महाकुम्भ मेले के लिये यात्रियों को सुविधा मुहैय्या कराने तथा मेला प्रबन्धन पर होने वोले खर्च के लिये इलाहाबाद के जिलाधीश. ने उत्तर प्रदेश सरकार से 20.76 अरब रूपये की बजट दिया है। राज्य सरकार ने इस राशि को विशेष अनुदान के रूप में केन्द्र सरकार से मांगा है जिसे केन्द्र सरकार ने मना नहीं किया है बल्कि प्रस्तावित कार्यों का ब्योरा मांगा है तथा वास्तविक खर्च बताने को कहा है। यह ब्योरा पहली फरवरी तक दिया जाने वाला था। राज्य के अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि 2001 के कुम्भ मेले में करीब 100 करोड़ का खर्च तथा 2007 के अर्धकुम्भ मेले का खर्च 150 करोड़ आया था जो सिर्फ बुनियादी सुविधाओं को उपलब्ध कराने पर खर्च हुआ था। इसी तरह हज यात्रा पर मुस्लिम समुदाय को या मानसरोवर यात्रा पर हिन्दू समुदाय तथा पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा जाने के लिये भी सरकार सब्सिड़ी उपलब्ध कराती है जबकि यह लोगों की अपनी आस्था के अनुरूप उनकी निजी जरूरत है जो उनके अपने कथित पापों से मुक्ति या स्वर्ग की मान्यता से जुड़ी होती है। किसी भी सरकार के खजाने में रूपये उसके अपने जेब के नहीं होते हैं। वह आम लोगों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर के रूप में वसूला जाता है। हमारे देश में अप्रत्यक्ष कर के रूप में ठीक से कर वसूल हो पाता है क्योंकि यह हर वस्तु खरीदने में अमीर-गरीब सभी को उस सामान के बदले देना होता है जबकि प्रत्यक्ष कर की चोरी एक बड़ी समस्या है। खासतौर से अमीर तथा मध्यवर्ग कर चोरी अधिक करता है।

सहज कल्पना की जा सकती है कि ढ़ेरों धर्मस्थलों पर होने वाले आय को यदि जनहित के काम लगाया जाता तथा सरकारी खजाने की राशि लोगों की धार्मिक आस्था को पूरा करने पर खर्च न होकर उसे बुनियादी सुविधाएं जिसमें स्कूल, अस्पताल आदि पर लगाया जाता तो अधिक लोगों का भला हो पाता।


? अंजलि सिन्हा