संस्करण: 07 मार्च -2011

आर एस एस ने 1948 में तिरंगे को पैरों तले रौंदा था

? शेष नारायण सिंह

 

श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने की बीजेपी की राजनीति पूरी तरह से उल्टी पड़ चुकी है। बीजेपी की अगुवाई वाले एन डी ए के संयोजक शरद यादव तो पहले ही इस झंडा यात्रा को गलत बता चुके हैं,अब बिहार के मुख्य मंत्री और बीजेपी के महत्वपूर्ण सहयोगी नीतीश कुमार ने श्रीनगर में जाकर झंडा फहराने की जिद का विरोध किया है। शरद यादव ने तो साफ कहा है कि जम्मू कश्मीर में जो शान्ति स्थापित हो रही है उसको कमजोर करने के लिए की जा रही बीजेपी की झंडा यात्रा का फायदा उन लोगों को होगा जो भारत की एकता का विरोध करते हैं। नीतीश कुमार ने बीजेपी से अपील की है कि इस फालतू यात्रा को फौरन रोक दे। सूचना क्रान्ति के चलते अब देश के बहुत बड़े मध्यवर्ग को मालूम चल चुका है कि झंडा फहराना बीजेपी की राजनीति का स्थायी भाव नहीं है, वह तो सुविधा के हिसाब से झंडा फहराती रहती है। बीजेपी की मालिक आर एस एस के मुख्यालय पर 2003 तक कभी भी तिरंगा झंडा नहीं फहराया गया था। वो तो जब 2004 में तत्कालीन बीजेपी की नेता उमा भारती तिरंगा फहराने कर्नाटक के हुबली की ओर कूच कर चुकी थीं तो लोगों ने अखबारों में लिखा कि हुबली में झंडा फहराने के साथ साथ उमा भारती को नागपुर के आरएसएस के मुख्यालय में भी झंडा फहरा लेना चाहिए। तब जाकर आर एस एस ने अपने दफ्तर पर झंडा फहराया। 2004 के विवाद के दौरान भी उतनी ही हडकंप मची थी जितनी आज मची हुई है लेकिन तब टेलीविजन की खबरें इतनी विकसित नहीं थी इसलिए बीजेपी की धुलाई उतनी नहीं हुई थी जितनी कि आजकल हो रही है। तिरंगा फहराने के बहाने बहुत सारे सवाल भी बीजेपी वालों से पूछे जा रहे हैं। अभी कुछ साल पहले कुछ कांग्रेसी तिरंगा लेकर चल पड़े थे और उन्होंने ऐलान किया था कि वे आर एस एस के नागपुर मुख्यालय पर भी तिरंगा झंडा फहरा देगें। रास्ते में उन पर लाठियां बरसाई गयी थी। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि उस वक्त के तिरंगे से क्यों चिढी हुई थी बीजेपी जो महाराष्ट्र में अपनी सरकार का इस्तेमाल करके तिरंगा फहराने जा रहे कांग्रेसियों को पिटवाया था। जब उमा भारती ने 2004 हुबली में झंडा फहराने के लिए यात्रा की थी तो विद्वान् इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने प्रतिष्ठित अखबार, हिन्दू में एक बहुत ही दिलचस्प लेख लिखा था। उन्होंने सवाल किया था कि बीजेपी आज क्यों इतनी ज्यादा राष्ट्रप्रेम की बात करती है। खुद ही उन्होंने जवाब का भी अंदाज लगाया था कि शायद इसलिए कि बीजेपी की मातृ पार्टी, आर एस एस ने आजादी की लड़ाई में कभी हिस्सा नहीं लिया था। 1930 और 1940 के दशक में जब आजादी की लड़ाई पूरे उफान पर थी तो आर एस एस का कोई भी आदमी या सदस्य उसमें शामिल नहीं हुआ था। यहाँ तक कि जहां भी तिरंगा फहराया गया,  आर एस एस वालों ने कभी उसे सल्यूट तक नहीं किया। आर एस एस ने हमेशा ही भगवा झंडे को तिरंगे से ज्यादा महत्व दिया। 30 जनवरी 1948 को जब महात्मा गाँधी की ह्त्या कर दी गयी तो इस तरह की खबरें आई थीं कि आर एस एस के लोग तिरंगे झंडे को पैरों से रौंद रहे थे। यह खबर उन दिनों के अखबारों में खूब छपी थीं। आजादी के संग्राम में शामिल लोगों को आर एस एस की इस हरकत से बहुत तकलीफ हुई थी। उनमें जवाहरलाल नेहरू भी एक थे। 24 फरवरी को उन्होंने अपने एक भाषण में अपनी पीडा को व्यक्त किया था। उन्होंने कहा कि खबरें आ रही हैं कि आर एस एस के सदस्य तिरंगे का अपमान कर रहे हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि राष्ट्रीय झंडे का अपमान करके वे अपने आपको देशद्रोही साबित कर रहे हैं यह तिरंगा हमारी आजादी के लड़ाई का स्थायी साथी रहा है जबकि आर एस एस वालों ने आजादी की लड़ाई में देश की जनता की भावनाओं का साथ नहीं दिया था। तिरंगे की अवधारना  पूरी तरह से कांग्रेस की देन है। तिरंगे झंडे की बात सबसे पहले आन्ध्र प्रदेश के मसुलीपट्टम के कांग्रेसी कार्यकर्ता पी वेंकय्या के दिमाग में उपजी थी 1918 और 1921 के बीच हर कांग्रेस अधिवेशन में वे राष्ट्रीय झंडे को फहराने की बात करते थे। महात्मा गाँधी को यह विचार तो ठीक लगता था लेकिन उन्होंने वेंकय्या जी की डिजाइन में कुछ परिवर्तन सुझाए। गाँधी जी की बात को ध्यान में रहकर दिल्ली के देशभक्त लाला हंसराज ने सुझाव दिया कि बीच में चरखा लगा दिया जाए तो ज्यादा सही रहेगा। महात्मा गाँधी को लालाजी की बात अच्छी लगी और थोड़े बहुत परिवर्तन के बाद तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार कर लिया गया। उसके बाद कांग्रेस के सभी कार्यक्रमों में तिरंगा फहराया जाने लगा। अगस्त 1931 में कांग्रेस की एक कमेटी बनायी गयी जिसने झंडे में कुछ परिवर्तन का सुझाव दिया। वेंकय्या के झंडे में लाल रंग था। उसकी जगह पर भगवा पट्टी कर दी गयी। उसके बाद सफेद पट्टी और सबसे नीचे हरा रंग किया गया। चरखा बीच में सफेद पट्टी पर सुपर इम्पोज कर दिया गया। महात्मा गाँधी ने इस परिवर्तन को सही बताया और कहा कि राष्ट्रीय ध्वज अहिंसा और राष्ट्रीय एकता की निशानी है आजादी मिलने के बाद तिरंगे में कुछ परिवर्तन किया गया। संविधान सभा की एक कमेटी ने तय किया कि उस वक्त तक तिरंगा कांग्रेस के हर कार्यक्रम में फहराया जाता रहा है लेकिन अब देश सब का है। उन लोगों का भी जो आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के मित्र के रूप में जाने जाते थे। इसलिए चरखे की जगह पर अशोक चक्र को लगाने का फैसला किया गया। जब महात्मा गाँधी को इसकी जानकारी दी गयी तो उन्हें ताज्जुब हुआ। बोले कि कांग्रेस तो हमेशा से ही राष्ट्रीय रही है। इसलिए इस तरह के बदलाव की कोई जरुरत नहीं है। लेकिन उन्हें नयी डिजाइन के बारे में राजी कर लिया गया। इस तिरंगे की यात्रा में बीजेपी या उसकी मालिक आर एस एस का कोई योगदान नहीं है लेकिन वह उसी के बल पर कांग्रेस को राजनीतिक रूप से घेरने में सफल होती नजर आ रही है। अजीब बात यह है कि कांग्रेसी अपने इतिहास की बातें तक नहीं कर रहे हैं  अगर वे अपने इतिहास का हवाला देकर काम करें तो बीजेपी और आर एस एस को बहुत आसानी से घेरा जा सकता है और तिरंगे के नाम पर राजनीति करने से रोका जा सकता है।


? शेष नारायण सिंह