संस्करण: 07 मार्च -2011

ग़रीब मुख्यमंत्री की अयाशी

? महेश बाग़ी

 

ध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हाल ही में दो विरोधाभासी तथ्य नज़र आए। विधानसभा के बजट सत्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा प्रस्तुत किया, जिसमें बताया गया कि वे पहले से और ग़रीब हो गए हैं। इन्हीं मुख्यमंत्री ने दो दिन बाद भोपाल के संस्थापक राजा भोज का सहस्राब्दी समारोह धूमधाम से मनाया, जिस पर करोड़ों रुपए फूंके गए। जहां तक शिवराज सिंह के ग़रीब होने की बात है, तो इस पर आसानी से विश्वास नहीं किया जा सकता, क्योंकि उन्होंने अपनी पत्नी साधना सिंह की आय और संपत्ति में इज़ाफा बताया है यानी सजनी अमीर-साजन ग़रीब।

शिवराज के पहले की अपेक्षा और ग़रीब होने पर इसलिए यक़ीन नहीं होता, क्योंकि उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके भाई, भतीजे, साले और रिश्तेदार रातों-रात करोड़ों के मालिक हो गए हैं। कोई अवैध उत्खनन कर अपनी तिज़ोरी भर रहा है, तो कोई बिल्डर या कॉलोनाइज़र बन गया है। मुख्यमंत्री के साले के नाम पर करोड़ों के ठेके चल रहे हैं और एक भाई अवैध खनन करते पकड़ा भी गया है। शिवराज की धर्मपत्नी साधना सिंह के अमीर होते जाने का राज़ भी रहस्यमय है। शिव दंपत्ति जब डंपर कांड की गिरफ्त में आए थे, तब उनकी ओर से बताया गया था कि साधना सिंह ट्रेवल व्यवसाय भी करती हैं, किंतु हाल ही में दिए गए संपत्ति-विवरण में इसका कोई जिक्र नहीं है। इसमें यह भी नहीं बताया गया कि कथित उपहार में मिले पांच डंपर किसे, कब और कितने में बेचे गए। अलबत्ता यह तथ्रू और सामने आया कि विदिशा में अब उनके एक नहीं, दो वेयर हाउस हैं। इनकी ज़मीर ख़रीदने और निर्माण के लिए धन कहां से आया, इसका भी ख़ुलासा नहीं किया गया है। शिवराज सिंह के और ग़रीब होने पर इसलिए भी सवालिया निशान लगा है, क्योंकि उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में मिलने वाला वेतन कहां जाता है ? पाठकों की जानकारी के लिए यहां ख़ुलासा करना ज़रूरी है कि मध्यप्रदेश के संसदीय इतिहास में शिवराज सिंह चौहान पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिनके परिवार का घर ख़र्च भी सरकारी मद से होता है। आरटीआई से प्राप्त जानकारी में यह भी पता चला है कि शिवराज ने रक्षाबंधन और जन्माष्टमी जैसे पर्वों पर भी सरकारी धन ख़र्च किया था। ऐसे में वे ख़ुद को पहले से और ग़रीब बताएं, तो हंसी आना स्वाभाविक है। ज़ाहिर है कि शिवराज सिंह ने अपनी आय और संपत्ति का वास्तविक ब्यौरा न देकर विधानसभा तथा प्रदेश की जनता को गुमराह किया है।

एक ओर शिवराज सिंह ख़ुद को पहले से और ग़रीब बता रहे हैं, वहीं इस ग़रीब प्रदेश के लोगों से कर के रूप में वसूले गए धन का खुलेआम दुरुपयोग भी कर रहे हैं। राज्य सरकार की आर्थिक बदहाली किसी से छुपी नहीं है। सरकार का ख़जाना तो ख़ाली है ही, ऊपर से वह कर्ज़ में गले-गले तक डूबी हुई है। हालत इतनी ख़राब है कि कर्ज़ का ब्याज़ चुकाने में भी सरकार को पसीने छूट रहे हैं। आर्थिक बदहाली के कारण सरकार ने विकास एजेंसियों का बजट घटा दिया है। ऐसे में जहां विकास कार्य ठप्प हैं, वहीं अधिकारी-कर्मचारी बगैर काम किए तनख्वाह ले रहे हैं। इन परिस्थितियों के बावजूद शिवराज सराकर व्यर्थ की नौटंकियों पर सरकारी धन फूंक रही है। पंचायत, महापंचायत, इन्वेस्टर्स मीट, अन्त्योदय मेले और उपवास की नौटंकी पर सरकारी धन पानी की तरह बहाया गया।

इतनी नौटंकियों से भी शिव सराकर का पेट नहीं भरा, तो राजा भोज सहस्राब्दी समारोह का आयोजन कर फिर जन-धन फूंका गया। भोपाल के बड़े तालाब में राजा भोज को प्रतिमा स्थापित करना तो ठीक था, पर इसके लिए भव्य समारोह करना समझ से परे है। लाल परेड़ ग्राउंड में लेज़र शो, नृत्य और सुखविंदर नाइट के साथ ही भारी आतिशबाजी भी की गई। इस आयोजन के बड़े-बड़े होर्डिंग्स शहर भर में लगाए गए और प्रमुख स्थलों पर लाइटिंग भी की गई। इतना ही नहीं, इस आयोजन के तीन-तीन सरकारी महकमों ने विज्ञापन भी जारी किए। एक अनुमान के अनुसार इस पूरे ताम-झाम पर लगभग एक अरब रुपए फूंक दिए गए।

ख़ास बात यह है कि सरकार ने यह जो आयोजन किया, उसका शीर्षक तक सहीं नहीं लिखा गया। सरकारी कैलेंडर से लेकर होर्डिंग्स और विज्ञापनों में 'राजा भोज सहस्त्राब्दी वर्ष' लिखा गया है। हिंदी और संस्कृत शब्दकोष में 'सहस्त्राब्दी' कोई शब्द ही नहीं है। वास्तव में इसे सहस्राब्दी वर्ष लिखा जाना था। संस्कृत में हज़ार को सहस्र कहा जाता है और शब्द का अर्थ होता है वर्ज। इस प्रकार यह शब्द बनता है-सहस्राब्दी। आश्चर्य है कि सरकार में बैठे एक भी नेता-अफसर ने इस ग़लती को सुधारने की कोशिश नहीं की। इससे भी अधिक दु:खद तथ्य यह है कि सभी समाचार पत्रों ने भी 'सहस्त्राब्दी वर्ष' लिख कर एक पूर्णत: ग़लत शब्द को वैधता प्रदान कर दी।

जिस प्रदेश में विकास कार्य ठप्प पड़े हों, कर्ज़ में डूबे किसान आत्महत्या करने को मज़बूर हैं, वहां सरकार के ऐसे आयोजन अयाशी नहीं तो और क्या है? आश्चर्य इस बात पर भी है कि भाजपा और संघ आलाकमान सब कुछ देखते हुए भी ख़ामोश क्यों है? क्या यह मान लिया जाए कि भाजपा-संघ ने मध्यप्रदेश में पार्टी को डुबोने का ठेका शिवराज को दे दिया है। यदि नहीं, तो भाजपा ऐसे नाकारा और नौटंकी-बाज, मुख्यमंत्री को क्यों ढोए जा रही है?


? महेश बाग़ी