संस्करण: 06 सितम्बर-2010

 

चारों तरफ पसर रहा है भ्रष्टाचार, खारिज हो रहा है सदाचार

राजेंद्र जोशी

              

   यहां भी भ्रष्टाचार, वहां भी भ्रष्टाचार, जहां-जहां तक नज़र दौड़ती जाती है वहां-वहां तक भ्रष्टाचार। समाजसेवा, राजनीति, व्यवसाय और यहां तक कि धर्म-करम के पावन स्थल भी अछूते नहीं बचे भ्रष्टाचार की चपेट से। भ्रष्टाचार के इस पसरते पैर में समाज से खारिज होता जा रहा है सदाचार। भ्रष्टाचार का बढ़ता माहौल तीव्र गति से संपूर्ण व्यवस्था को निकालता जा रहा है।

     भ्रष्टाचार की डायन यूं तो प्राय: सभी क्षेत्रों पर झपट्टा मार रही है किंतु जनकल्याण और विकास के कार्यों के नाम से सरकारी महकमों और विभिन्न एजेंसियों को आवंटित बजट इस डायन की एक तरह से खुराक जैसे हो गये हैं। भ्रष्टाचार की डायन और उसके कुल गौत्र के लोगों के लिए भ्रष्टाचार एक शक्तिवर्धाक टॉनिक बन गया है। इन हालातों के चलते सदाचार की परिधा के भीतर गुजरबार कर रहा आम आदमी कुपोषण का शिकार होता जा रहा है। नैतिकता, आदर्श, शुचिता अनुशासन और मर्यादा जैसे शब्दों का राजनीति, सेवा, व्यवसाय जैसे क्षेत्रों में प्रवेश निषेध होता जा रहा है।

     आचरण भ्रष्ट होता है चारित्रिक बुराइयों से। अपने पथ से भटककर अपने स्वार्थ की सिध्दी करने के लिए किया जा रहा प्राय: हर काम, भ्रष्टाचार की परिधा में आता है किंतु इन दिनों भ्रष्टाचार की परिभाषा केवल आर्थिक हेरा-फेरी और अनैतिक कर्मों से कमाये जा रहे धन तक सीमित रह गई है। शिक्षा, स्वास्थ्य और जनकल्याण के लिए आवंटित राशियों का इतना अधिक दुरुपयोग बढ़ता जा रहा है कि समाचार माधयमों में इसी से जुड़ी खबरें छाई रहती हैं। जिसे हम सरकारी पैसा कहते हैं, वह सरकार के नियंत्रण में होता जरूर है किंतु वह देश की जनता के खरे पसीने की कमाई का पैसा है। जिस बेरहमी से इस धन का दुरुपयोग हो रहा है उसे देख देखकर और सुन सुनकर देश का सामान्यजन दांतों तले अंगुली दबा रहा है।

    ऐसा नहीं है कि सरकारी धन का दुरुपयोग रोकने के लिए कोई नियंत्रण एजेंसिया नहीं हैं। इस पर नियंत्रण के लिए बड़ी समितियां एजेंसिया और आयोग बन गये हैं। किंतु नियंत्रण की इन इकाइयों में भी काफी गहरे तक भ्रष्टवाड़ा बढ़ गया है। इन्कम टैक्स, सेल्स टेक्स एवं कस्टम जैसे महकमे के पास इस बात का जिम्मा है और पर्याप्त अधिकार भी हैं कि वे जहां भी आर्थिक अनियमितताऐं हो रही हैं उनको पकड़े। परंतु इनमें पदस्थ अधिकांश सेवकों के बारे में यह पढ़ने-सुनने को मिलता रहता है कि कतिपय लोगों की मिली भगत और उनकी राय से आर्थिक अपराधों का धांधा बंद होने के बजाय और ज्यादा पनपता जा रहा है। धन के दुरुपयोग को रोकने के जिनपर जिम्मेदारी है वे दुरुपयोग की गई राशियों के हिस्सों बंटवारों से खूब नवाजे जा रहे हैं।

    गरीबों के लिए लागू की गई खाद्यान्न सुरक्षा योजना, रोजगार गारंटी योजना, आवास योजना और गरीबों के नाम से शुरू की गई जनकल्याण और विकास की योजनाओं में सरकार की तरफ से तो खूब धनराशि आवंटित कर दी जाती है किंतु आवंटित धनराशिया कागजों में ही खर्च होती रहती है। क्रियान्वयन एजेंसियों का यह चरित्र अब कहीं भी मीडिया की नजरों से छुपायें नहीं छुप पा रहा है। ऐसे ऐसे हैरतअंगेज आर्थिक कारनामें उजागर होते जा रहे हैं। जिससे लगने लगा है कि गरीब के नाम के पैसों से वह हर शख्स अमीर और मालामाल होता जा रहा है जिसके पास से सरकारी धन के उपयोग की फाइलें गुजारा करती हैं। जिनको जिम्मेदारियां और अधिकार सौंपे जा रहे हैं, वे मान बैठते हैं कि जिस बजट को वे डील कर रहे हैं वह उनके अपने निजी उपयोग के लिए ही है। ऐसे लोग चल-अचल संपत्तियों का इतना भंडार कर लेते हैं कि आने वाली उनकी सात पीढ़ियां बिना कुछ किए मौज मस्ती से जिंदगी गुजार सकती है।

    कुपोषण की बीमारियों से वहीं वर्ग ज्यादा प्रभावित होता जा रहा है जिसके पोषण के लिए भारी भरकम बजट आवंटित किया जाता है। उस बजट से बीच के लोग अपना स्वास्थ्य बनाया करते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र के बजट में अप्रत्यक्ष रूप से तो भ्रष्टाचार होता ही रहता हैं किंतु सरकारी स्कूलों में छात्रों की सर्वशिक्षा अभियान के तहत उपस्थिति बढ़ाने और शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए लागू पोषण आहार जैसी योजना पर भी भ्रष्टाचार डायन ने प्रत्यक्ष रूप से शिकंजा कस लिया है। देख सुनकर बड़ा अचंभा होता है कि गरीब बच्चों के दलिया, रोटी, सब्जी को भी किस तरह से बिना किसी शर्मों हया के कुछ समर्थों द्वारा डकारा जा रहा है।

    भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा तो तब हो जाती है जो भ्रष्टाचार निवारण एजेंसियों में बैठे बड़े-बड़े ऊंचे पदों पर आसीन लोगों के बारे में मीडिया में खबर आ जाती है कि फलां-फलां भ्रष्टाचार निवारण अधिकारी ने रिश्वत लेकर किसी भ्रष्टाचारी को क्लीन चिट दे दी। क्लीन चिट मिलना एक ऐसा जुमला बन गया जो बड़े-बड़े मगरमच्छों को सद्चरित्रता का सर्टिफिकेट देने के काम आ रहा है।

      जमाखोरों, मुनाफाखोरी का व्यावसायिक और औद्योगिक क्षेत्रों द्वारा किये जाने वाला आर्थिक अपराधा तो लूट कहा जाता है लेकिन शासकीय एजेंसियों द्वारा कल्याण और विकास के कार्यक्रमों के आवंटित बजट की हेराफेरी और कमाई को भ्रष्टाचार कहा जाता है। यह भ्रष्टाचार सरकारी निर्माण कार्यों, वस्तुओं की सरकारी खरीद-फरोख्त और रिश्वत जैसे मामलों में रूकने का नाम नहीं ले रहा है। भ्रष्टाचार एक ऐसी टॉफी है जिसे जितना मुंह में चूसा जाता है उसका स्वाद उतना ही बढ़ता जाता है। भ्रष्टाचार केवल स्थानीय स्तर पर ही व्याप्त नहीं है बल्कि प्रादेशिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ऐसे मामलों में जहां सरकारी धन लगाया जाता है, वहां ज्यादा पल्लवित और पुष्पित हो रहा है। वर्तमान में भारत में कॉमनवेल्थ खेलों के प्रतिष्ठापूर्ण और अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के लिए आरक्षित धन के उपयोग और दुरुपयोग की जिस तरह परतें खुलती जा रही है, उसका प्रचार थम नहीं पा रहा है। तात्पर्य यह है कि जहां-जहां भी सरकार और उसकी एजेंसियों के माध्यम से बजट खर्च किया जा रहा है उससे मानवीय चरित्र में आ रही गिरावटों का पर्दाफाश होता जा रहा है। ऐसे में समाज से आज सदाचार शब्द खारिज होता जा रहा है।

राजेंद्र जोशी