संस्करण: 06 सितम्बर-2010  

 

कश्मीर में शांति के लिए....

  महेश बाग़ी
 

     

   लगभग दो माह से कश्मीर घाटी सुलग रही है। कश्मीरी अवाम और सुरक्षा बलों के बीच आए दिन मुठभेड़ हो रही हैं, जिनमें निर्दोष मारे जा रहे हैं। इसी बीच 'न्यूयार्क टाइम्स' ने यह रहस्योद्धाटन कर चौंका दिया है कि पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में चीनी सेना का जमावड़ा हो रहा है। हालांकि चीन सरकार ने स्पष्ट किया है उसका इरादा भारत पर हमला करने का नहीं है किंतु इतिहास बताता है कि चीन भरोसे लायक नहीं है। ऐसी स्थिति में भारत को अतिरिक्त सतर्कता बरतते हुए घाटी में शांति बहाली के ठोस प्रयास करने होंगे। राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला जहां राजनीतिक पहल की मांग कर रहे हैं वहीं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दो टूक शब्दों में कहा है कि अलगाववादियों से संवाद इस सीमा के भीतर होना चाहिए कि कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है।

    इसमें कोई दो राय नहीं कि केंद्र कश्मीर में शांति बहाल करने के प्रति संवेदनशील है, किंतु बार-बार एक ही जुमला उछाले जाने से अलगाववादी ताकतों को सिर उठाने का मौका मिलता है, इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जाना चाहिए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से राजनेता एक ही राग अलापते आ रहे हैं कि कश्मीर भारत का अटूट अंग है। इससे हासिल क्या हुआ, यह कोई बताने को तैयार नहीं है। घाटी में अलगाववादी ताकतें लगातार अपनी स्थिति मज़बूत करती आ रही हैं और राजनीतिक पहल हाशिये पर उतर आई है। आज उमर अब्दुल्ला राजनीतिक पहल करने संबंधी बयान दे रहे हैं तो उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि उनके मुख्यमंत्री रहते ऐसी पहल क्यों नहीं की गई ? केंद्र ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के साथ-साथ इतनी सुविधाएं और रियायतें दी हैं, जिसका कोई हिसाब नहीं है। जम्मू-कश्मीर की अवाम को दी गई राहतों पर करोड़ो-अरबों रुपए फूंके जाने के बाद भी स्थिति खराब क्यों है ?

    इस सवाल का यही जवाब है कि सरकार कश्मीरी अवाम में भारतीयता का जज्बा आज तक पैदा नहीं कर पाई है। फिर चाहे शेख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री रहे हों या गुलाम नबी आज़ाद। हर सरकार ने अपने राजनीतिक हितों की ख़ातिर कश्मीरी अवाम का इस्तेमाल किया। जहां तक मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का सवाल है, तो उन्हें यह महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा जाना ही ग़लत क़दम था। याद रहे कि 2002 के विधानसभा चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस ने उमर को बतौर मुख्यमंत्री पेश किया था। उस चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस को, भारी पराजय का सामना करना पड़ा था और खुद उमर अब्दुल्ला गदरबल की अपनी पुश्तैनी सीट से चुनाव हार गए थे। 2008 में नेशनल कांफ्रेंस ने फारुख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया और जब सत्ता संभालने की बारी आई तो उमर अब्दुल्ला को आगे कर दिया गया। इससे साफ़ हो गया कि नेशनल कांफ्रेंस, जम्मू-कश्मीर को अपनी बपौती मान रही है और इसी को ख़ामियाजा राज्य की जनता को भुगतना पड़ रहा है।

    आज कश्मीर में अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी की तूती बोल रही है, तो उसके लिए उमर अब्दुल्ला का राजनीतिक नौसिखियापन ज़िम्मेदार है। गिलानी ने कश्मीरी अवाम के मन में इतना ज़हर घोल दिया है कि उसे साफ़ करना आसान नहीं है। मीर वाइज़ जैसे उदारवादी नेता ने जब वार्ता की पहल की थी, तब उमर अब्दुल्ला ख़ामोश क्यों रहे ? उनकी पहल स्वीकार क्यों नहीं की गई ? ऐसे में यदि आज वे अलग-थलग पड़ गए हैं और अलगाववादियों ने सिर उठा लिया है तो क्या इसके लिए उमर अब्दुल्ला जिम्मेदार नहीं है ? इसमें कोई दो राय नहीं कि जम्मू-कश्मीर में तैनात सुरक्षा बलों ने समय-समय पर ज्यादती की है। ऐसी स्थिति में उनके विशेषाधिकार नियम को हल्ला करने तथा सिविल क्षेत्रों में उनकी संख्या कम करने के आश्वासन पर अमल क्यों नहीं किया गया ? इसी कारण कश्मीरी अवाम में यह भावना घर कर गई है कि केंद्र सरकार उनके साथ सौतेला व्यवहार कर रही है।

       कश्मीरी घाटी में अमन-चैन बहाल हो, यह राज्य के साथ केंद्र का भी जिम्मा है। अब जबकि वहां हालात बेकाबू हो गए हैं, तो तुरंत किसी सार्थक पहल की दरकार है। केंद्र सरकार को अलगाववादी नेताओं से शीघ्रताशीघ्र वार्ता शुरू करना चाहिए और स्वायत्तता की मांग सिरे से ख़ारिज कर देना चाहिए। अलगावादियों से वार्ता की पहल पहले जैसी दफनाने की बजाय इस बार उस पर सार्थक पहल की जाना चाहिए। कश्मीरी अवाम, ख़ासकर युवा वर्ग को भी यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि वे राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ कर ही प्रगति कर सकते हैं। अलगाववादी उनकी भावनाओं का दोहन ही करते हैं, इस तथ्य से भी उन्हें इत्तेफांक रखना चाहिए इसी में उनकी और जम्मू-कश्मीर की बेहतरी है।

महेश बाग़ी