संस्करण: 06 सितम्बर-2010  

 

भाजपा की प्रवचन पाठशाला

पहाड़ खोदने के बाद निकली चुहिया



 

वीरेंद्र जैन

     

     दे के राज्यों की राजधानियों, और सारे बड़े बड़े नगरों में बाबा लोगों के प्रवचन सतत् चलते रहते हैं। एक का पंडाल उठ नहीं पाता कि दूसरे की जाजम बिछने लगती है। इन बाबाओं के टेंट और शामियाने ही दसियों लाख किराये के होते हैं जो उनके साथ चलते हैं और आयोजनकर्ता को बाबा के आदेशानुसार उसी का टेंट लगवाना जरूरी होता है। इन बाबाओं की पब्लिसिटी ही कई लाख की होती है जिसमें पेशाबघर से लेकर सड़क के इंडीकेशन बोर्डों तक बाबा ही बाबा और उनके आयोजक चिपके मिलते हैं। जहाँ जरूरी होता है वहाँ बैनर और होर्डिंगों का जम कर प्रयोग होता है। समाचार पत्रों के सम्पादकों और संवाददाताओं के लिए एक किलो की परसादी के डिब्बे पहुँचाये जाते हैं। वैसे तो ये प्रवचन पंडाल सबके लिए खुले होते हैं किंतु समाज के सबसे भ्रष्ट और लुटेरे लोगों को बाबाओं का विशेष आशीर्वाद रहता है इसलिए उन्हें सबसे आगे जगह मिलती है। ऐसे लोगों को आशीर्वाद देते समय बाबा की खुशी देखते ही बनती है। रिटायर्ड फालतू बूढे, और बहुओं द्वारा घर से हकाली गयी सासें इन आयोजनों में भीड़ बढाने का प्रमुख आधार बनती हैं जो कभी कभी अपनी साड़ियाँ और सौन्दर्य प्रदर्शन की इच्छुक अपनी बहुओं और नाती पोतों को भी साथ घसीट लाती हैं। इन प्रवचन कर्ताओं के साथ दवा, धार्मिक पुस्तकों, पूजन सामग्री, कार्य सिध्दि यंत्रों, रत्नों, आदि की दुकानें भी साथ चलती हैं। हवाई जहाज से सफर करने वाले बाबाओं के पास अति आधुनिक लक्जरी के सारे सामान और उपकरण उपलब्ध होते हैं। भ्रष्ट नौकरशाह और राजनेता इन पर खुले हाथ से पैसा लुटाते हैं और मध्यम वर्ग अपनी मूर्खता में ही पिस जाता है। आज तक इस बात का कोई मूल्यांकन कहीं नहीं हुआ कि प्रति वर्ष एक ही नगर से करोड़ों रुपयों के बजट वाले इन आयोजनों से समाज के किस वर्ग का कितना भला हुआ या समाज में कितना सुधार आया। ये भी कोई नहीं पूछता कि बाबा द्वारा बोले गये दस पाँच चुटीले चुटकलों और पुराने पिष्ट पेषण के आधार पर बघारे गये उपदेशों से कितने लोगों के जीवन में परिवर्तन दृष्टिगोचर हुआ।

       लगभग ऐसी ही कहानी भोपाल में गत 26-27 अगस्त को आयोजित भाजपा के विधायकों के लिए लगाये गये अभ्यास वर्ग की भी है। उक्त अभ्यास वर्ग में प्रवचननुमा उप्देशकों ने भाजपा के विधायकों और मंत्रियों के बारे में जो भी आलोचनाएं कीं वे उससे अलग नहीं थीं, जो पहले ही प्रैस के द्वारा जनता तक पहुँच चुकी हैं। उन्होंने उन आलोचित दोषो में से कुछ से पीछे हट जाने और सावधानी पूर्वक काम करने की सलाह दी । दरसल यह चरित्र नहीं अपितु छवि सुधारने का आयोजन था। रोचक यह है कि पहले दिन जम कर शराब पीने और ऐय्याशी करने वालों को सावधान किया गया किंतु भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, कमीशनखोरी, सरकारी जमीनों को मुफ्त या कोड़ियों के मोल हड़पने, भाई भतीजावाद करने आदि के बारे में कुछ नहीं कहा गया। इससे ऐसा लगा कि प्रवचन करने आये नेताओं को इन बुराइयों से कोई गुरेज नहीं है। इस का प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि शाम को ये प्रवचन कर्ता उस मंत्री के यहाँ चाय पान के लिए गये जिसके दलाल के पास से ही करोड़ों की दौलत नहीं अपितु उसके ड्राइवर के लाकर से ही सवा करोड़ का सोना आयकर के छापों में मिल चुका है, किंतु चुनाव निबटने के बाद वह पुन: मंत्रिपद को ही नहीं सुशोभित कर रहा अपितु मुख्यमंत्री का दाहिना हाथ बना हुआ है।

       दो दिन के इस अभ्यास पर्व में सारा जोर इस बात पर रहा कि किस प्रकार अपनी सरकार को बचाने के लिए साम दाम दण्ड भेद के द्वारा अपनी सीट सुरक्षित की जाए और पार्टी के प्रति बढती नफरत को बदलने के लिए कैसे चेहरे को आकर्षक बनाया जाए। जिस तरह बाबा लोग नर्क की भयावह तस्वीर दिखा कर भक्तों को अपने द्वारा सुझायी गयी राह पर चलने का सन्देश देते हैं उसी तरह राष्ट्रीय अधयक्ष ने यह कह कर कि ''पद से उतरने के दस मिनिट के अन्दर मिला हुआ गार्ड भी गायब हो जाता है,'' सन्देश दिया कि सुविधाएं भोगना है तो अपनी अपनी सीट बचा कर सरकार बचाने की जुगत में जुट जाओ। उनके पूरे उप्देश में जनता की भलाई और उसकी सेवा की जगह क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं को किसी भी तरह संतुष्ट रखने की प्रेरणा दी गयी। जिन बुराइयों से दूर रहने की सलाह दी गयी उसके पीछे भी उनके अनैतिक होने की ध्वनि नहीं थी अपितु छवि बिगड़ने से कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के नाराज होने से सीट और सरकार के जाने का भय ही बताया गया। यह नहीं कहा गया कि हमारी राजनीति किन मूल्यों पर आधारित है और इन मूल्यों की रक्षा में सरकारें आती जाती हैं तो सौ बार चली जायें। दरअसल ऐसी भावुकता भरी बातों से तो वे जनता को बरगलाने का काम करते हैं। स्मरणीय है कि छह दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहा देने के बाद हुये साम्प्रदायिक दंगों के बाद जब भाजपा की चार राज्य सरकारें भंग कर दी गयी थीं तब ये कहते थे कि राम मन्दिर के लिए हमने चार राज्य सरकारें कुर्बान कर दीं। वे विधायकों से, वकीलों की तरह किसी भी झूठे तर्कों-कुतर्कों से मुकदमा जिताने के अनुरोधा की तरह का आवाहन करते हैं। इसका प्रमाण इससे भी मिलता है कि इनके नेतृत्व में दिनों दिन जनता के बीच काम करने वाले नेताओं की जगह वकील या वकीलनुमा पक्षपाती पत्रकारों को अधिक से अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिये जा रहे हैं।

       भाजपा में प्रशिक्षण का प्रस्ताव भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी के मित्र किरीट सोमैय्या ने माक्र्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के सदस्यों के लिए निरंतर चलने वाली कक्षाओं से प्रेरित होकर रखा था। इस नकल में वे यह भूल गये कि सीपीएम व्यवस्था बदलने के लिए काम करने वाली एक कैडर वाली पार्टी है और उनकी कक्षाएं उम्मीदवार सदस्य बनने के कार्यकाल से ही चलने लगती हैं जब कि भाजपा इसी व्यवस्था में एक सत्ता लोलुप पार्टी है और उसमें सभी तरह की पार्टियों के प्रभावशाली असंतुष्टों को खुलकर प्रवेश ही नहीं दिया जाता अपितु बिना प्रशिक्षण टिकिट भी अर्पित किया जाता है। वे सर्वाधिक फिल्मी टीवी कलाकार, साधु-साधिवयों का स्वांग भरने वाले, क्रिकेट खिलाड़ी, मंच के फूहड़ कवि, पूर्व राज परिवारों के सदस्य, आदि की लोकप्रियता को साम्प्रदायिकता से मिला कर सत्ता हस्तगत करने वाले गिरोह हैं। सत्ता पाने के बाद उनके विधायक सांसद क्या क्या करते हैं यह प्रशिक्षण देने वालों के प्रवचनों और प्रैस में नित्य आ रही खबरों से स्वयं ही स्पष्ट है।

       रोचक यह है कि जब एक मित्र पत्रकार ने प्रशिक्षण प्राप्त पन्द्रह विधायकों से प्रशिक्षण के बाद उनमें आये परिवर्तन के बारे में पूछा तो उनमें से बारह तो हँस दिये और तीन ने तोता रटंत की तरह ''यशस्वी मुख्यमंत्री'' द्वारा घोषित सरकारी योजनाओं की सूची गिनाते हुए कहा कि वे इनको जनता के बीच प्रचारित करने के लिए और अधिक ताकत से जुट जायेंगे।


वीरेंद्र जैन