संस्करण: 06 सितम्बर-2010

 

अयोध्या विवाद और

विहिप की विश्वसनीयतk

 


 

 सुनील अमर

                       

     अब जबकि इसी माह अयोध्या विवाद पर अदालत का फैसला आना है, विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंहल ने बयान देना शुरु कर दिया है कि इस बावत संसद से कानून बनाये बिना कोई निस्तारण संभव नहीं है! श्री सिंहल इससे पहले भी कई बार इस तरह का बयान दे चुके हैं। हालांकि लगभग सात साल तक जब स्वयं भाजपा की ही सरकार केन्द्र में थी, तो उन्होंने न तो कभी इस तरह की माँग की और न ही इस तरह का बयान दिया। तो श्री सिंहल के बयान का क्या अर्थ निकाला जाय ? क्या वे अदालत का फैसला नहीं मानेंगें या फिर उन्हें विश्वास है कि अदालत उनके मनमाफिक फैसला नहीं करेगी ?

      अयोध्या विवाद आज जिस स्थिति में पहुँच चुका है, वहाँ अब किसी भी पक्ष द्वारा अदालती फैसले से इनकार करने पर उसे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। रही बात मुकदमें की, तो वह कोई भी, कहीं भी और कभी भी दायर कर व लड़ सकता है। दिल्ली की एक अदालत में जमीन सम्बन्धा एक मुकदमा तो 200 वर्षों से चल रहा है! अयोध्या मामले में भी दोनों प्रमुख पक्ष कह रहे हैं कि फैसला आने के बाद वे सोचेंगें कि आगे किसी सक्षम अदालत ( सर्वोच्च न्यायालय ) में उन्हें जाना है कि नहीं। इसका सीधा अर्थ यही है कि अगर उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में मामले को संसद के हवाले न कर दिया तो इसका सर्वोच्च न्यायालय पहुँचना तय है, क्योंकि उच्च न्यायालय ने फैसले की तिथि निश्चित करने से पूर्व इस मुकदमें से सम्बन्धित तमाम पक्षों को इकट्ठे बुलाकर आपस में सुलह कर लेने का सुझाव दिया था जिसे किसी भी पक्ष ने नहीं माना।

      इस मामले में सबसे ज्यादा विसंगति विश्व हिन्दू परिषद की है। यह सभी जानते हैं कि भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद, दोनों राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ही आनुषांगिक संगठन हैं, और यह सब एक दूसरे का हित-चिंतन करते रहते हैं। आज भले ही विहिप नेता अशोक सिंहल यह कह रहे हैं कि आडवाणी ने धार्म को राजनीति से जोड़ दिया या उनकी रथयात्रा ही गलत थी, लेकिन यह इलहाम उनको अब जाकर हुआ है, जब भाजपा न सिर्फ सत्ताच्युत है, बल्कि निकट भविष्य में उसकी सत्ता वापसी की कोई संभावना भी नहीं दिख रही है। आडवाणी ने जब रथयात्रा निकाली तो अशोक सिंहल ने उसका स्वागत किया और जब उन्होंने धार्म का राजनीतिकरण किया तो उसी के सहारे अशोक सिंहल ने विश्व हिन्दू परिषद की दुकान चमकाई। यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि उधार भाजपा केन्द्र की सत्ता से उतरी और उधार अयोध्या, काशी और मथुरा में मंदिर निर्माण हेतु चल रही विहिप की पत्थर तराशने की कार्यशालाऐं बंद हो गईं। अयोध्या में श्री सिंहल ने  एक पत्रकार वार्ता में स्पष्ट तौर पर कहा कि विहिप के पास का सब धान खत्म हो गया है, इसलिए कार्यशालाऐं बंद कर दी गई हैं।

      यह सच है कि बाबरी मस्जिद विधवंस में भागीदार होकर एक राजनीतिक दल के तौर पर भाजपा ने अपने पैरों पर जो कुल्हाड़ी मारी है, उसका दूरगामी असर होना ही था। अयोध्या-फैजाबाद के स्थानीय जागरुक लोगों, प्रबुध्द व्यक्तियों व इस मामले की जानकारी रखने वालों से बात करिये तो वे बताते हैं कि यह मामला स्थानीय स्तर पर ही आपस में हल होने के करीब था लेकिन इन्हीं अशोक सिंहल की राजनीति के कारण यह उस मुकाम पर पहुँचा जहाँ दुनिया इसे बाबरी धवंस के रुप में जानती है। वैसे तो यह मुकदमा 16 जनवरी 1950 से ही अदालत में विचाराधीन् है, लेकिन 26 दिसम्बर 1986 से पूर्व एक ऐसी स्थिति आ गई थी जब उभय पक्षों में समझौता होना तय लग रहा था। यह नतीजा निकला था कि जिसे रामचबूतरा कहते हैं, उस पर मंदिर बना लिया जाय, और जो तीन गुम्बद वाली बिल्डिंग है, उसे यथा स्थिति में छोड़ दिया जाय, और उस पर कोई नया निर्माण भी नहीं किया जाएगा, लेकिन बाद में विहिप इससे मुकर गई। उसने तमाम तरह के 'किन्तु' 'परन्तु' लगाने शुरु कर दिये। और तो और, राम मंदिर आन्दोलन के शलाका पुरुष तथा समाज और धार्म का मर्म समझने वाले महंथ रामचन्द्र दास परमहंस ने भी उस वक्त श्री सिंहल के ही सुर में सुर मिलाया और एक बनता हुआ ऐतिहासिक मामला बिगड़ कर ऐतिहासिक विडम्बना में बदल गया।

      ऐसे तो भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद बात-बात पर हिन्दू धार्म ग्रन्थों की दुहाई देते रहते हैं, लेकिन राम जन्म स्थान के स्थल-निधर्रण के बारे में 'स्कंद पुराण ' सरीखे पूज्य ग्रंथों में जो उध्दरण दिये गये हैं, उन्हें ये दोनों संगठन नकार देते हैं। ये इनका दोहरा चरित्र है, और इसी से पता चलता है कि इनका उद्देश्य मामले को हल करने का नहीं, बल्कि इसे उलझा कर खींचने का है। वैसे भी इन कट्टर हिन्दू संगठनों के तमाम वरिष्ठ नेता 'ऑफ द रिकार्ड' कहते ही हैं कि बाबरी मस्जिद को गिराने से उनका नुकसान ही हुआ। उनका मानना है कि जब तक वह विवादित बतायी जा रही बिल्डिंग खड़ी थी, आम हिन्दू जनमानस उसे देखकर कसमसाता रहता था। लेकिन अब चाहे जिस भी हालत में है, वहाँ एक राम मंदिर है, और जो भी हिन्दू चाहे अपनी आस्था के अनुसार जाकर दर्शन कर सकता है। इस वजह से हिन्दुओं में आक्रोश अब नहीं है, और इसी आक्रोश को पैदा करने व बनाये रखने के लिए विहिप व भाजपा शिला पूजन, अखंड रामायण, रामसेतु और हनुमान चालीसा जैसे कार्यक्रम चलाते रहते हैं। श्री सिंहल ने अभी गत दिनों ही दावा किया कि देश के सभी डेढ़ लाख गाँवों तथा अयोधया के 121 मंदिरों में हनुमान चालीसा का निर्बाधा पाठ चल रहा है। इस तरह विहिप लोकचेतना को झकझोर कर उसे अपने आन्दोलन के पक्ष में जगाना चाह रही है।

      और भाजपा 6 दिसम्बर 1992 को जब अयोध्या में वह शर्मनाक घटना हुई, उसके तत्काल बाद ही अयोध्या भूमि अधिग्रहण कानून सृजित हुआ। इसके अनुसार अधिगृहीत स्थल पर केन्द्र सरकार द्वारा मंदिर, मस्जिद, संग्रहालय, पुस्तकालय तथा सार्वजनिक उपयोगिता सेवा जैसे निर्माण कराये जायेंगें। भाजपा जब केन्द्र की सत्ता में आई तो यह कानून मौजूद था, लेकिन न तो उसने इसमें संशोधान की कोई कोशिश की और न ही किसी प्रकार के निर्माण की। उल्टे उसने बार-बार निर्लज्जता पूर्वक यह कहा कि चूँकि उसके सहयोगी दलों की राय है कि इसे ठंड़े बस्ते में डाल दिया जाय, इसलिए हम अभी इस मामले को नहीं उठाएगें। आज वही भाजपा एक बार फिर मतदाताओं को मूर्ख बनाने के प्रयास में है कि कृप्या एक बार फिर हमें दिल्ली के तख्त तक पहुचाइए, हम मंदिर जरुर बनायेंगें लेकिन लोग जानते कि काठ की हांड़ी दुबारा नहीं चढ़ती।

      आज प्रत्येक जागरुक और विवेकवान भारतीय यह जानता है कि इस मसले का सर्वमान्य हल क्या हो सकता है। यह उम्मीद तो किसी को भी नहीं करनी चाहिए कि अदालत किसी एक के पक्ष में साफ-साफ और सीधा-सीधा फैसला सुना देगी। इसका एकमात्र हल यही है जिस पर बिल्कुल शुरु से ही विचार करने का आग्रह दोनों पक्षों से किया जा रहा है कि रामचबूतरा पर मंदिर बन जाय और जहॉ मस्जिद थी, वहॉ मस्जिद बने। इस प्रसंग में यह तो साफ है कि मुस्लिम पक्ष 'डिफेंसिव' है, तो हिन्दू पक्ष 'अफेंसिव'। श्री सिंहल बार-बार कहते हैं कि महाकुंभ की इस बैठक में, तो अर्धाकुंभ की उस बैठक में संतों ने फलां-फलां प्रस्ताव पारित कर मंदिर निर्माण को कहा है। सवाल यह कि ये तथाकथित संत है क्या चीज? क्या ये निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं या कोई तालिबानी ? देश में सर्वमान्य लोकतांत्रिक शासन है और लोकप्रिय सरकार स्थापित है, इसलिये ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी हिन्दुओं की ही बनती है कि वे उदारमना होकर आगें आयें और इन धांधोबाज नेताओं को इनके घर की राह दिखायें।

 सुनील अमर