संस्करण: 06 सितम्बर-2010

 

शैतान गिन रहा अपने पाप

सीआईए का डर वाजिब है : अमेरिका वाकई है

दुनिया का नम्बर एक 'आतंकवाद निर्यातक देश' !
 

सुभाष गाताड़े

                          

   फिलवक्त पाकिस्तान की जेल में बन्द पांच अमेरिकी मुस्लिम युवा, बरूच गोल्डस्टाईन नामक अमेरिकी यहुदी डॉक्टर, आयरिश रिपब्लिकन आर्मी को ब्रिटेन के अन्दर आतंकी हमलों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करनेवाले पांच आयरिश अमेरिकी और हिन्दोस्तां की सरजमीं पर हुए 26/11 के आतंकी हमले के सूत्राधार रहे आतंकी डेविड हेडली, इन चारों उदाहरणों में क्या समानता ढूंढी जा सकती है ?

    दरअसल ये ऐसे अमेरिकी नागरिक हैं जो अमेरिका के बाहर के मुल्कों में विभिन्न आतंकी घटनाओं में मुब्तिला रहे हैं। और अमेरिका को यही चिन्ता सताए जा रही है कि ऐसे लोगों से अमेरिका की छवि पर असर पड़ सकता है। सीआईए के रेड सेल का यह आकलन बनता है कि ऐसी अधिक घटनाएं अमेरिका को 'आतंकवाद से पीड़ित' नहीं बल्कि 'आतंकवाद का निर्यातक देश' घोषित कर सकती है।

विकीलिक्स - जिस वेबसाइट ने पिछले दिनों अमेरिका के अफ़गान युध्द से जुड़े 70 हजार से अधिक आन्तरिक दस्तावेज जारी कर दुनिया भर में तहलका मचा दिया था, और जिसने अपना यह मिशन बना लिया है कि वह दुनिया भर की जालिम हुकूमतों या कॉर्पोरेट सम्राटों की अपारदर्शिता को दुनिया के सामने लाएगा, उसने अपने एक ताजे भण्डाफोड़ में रेड सेल का यह आन्तरिक दस्तावेज पेश किया है, जो सीआईए के अन्दर आन्तरिक बहस के लिए 2 फरवरी 2010 को रखा गया था।

    इनमें से अमेरिका एवम पाकिस्तान के 'डबल एजेंट'  रहे डेविड हेडली का किस्सा तो सभी जानते ही हैं। अमेरिकी अदालत ने उसने मुंबई आतंकी हमले में अपनी संलिप्तता भी कबूल की है कि किस तरह इस पाकिस्तानी अमेरिकी ने हिन्दोस्तां की कई यात्राएं की थी और कई स्थानों को चिन्हांकित किया था। पांच अमेरिकी मुस्लिम युवाओं का किस्सा भी पिछले दिनों सूर्खियों में रहा, जब पाकिस्तानी मूल के यह युवा उत्तरी वर्जिनिया स्थित अपने घर से बिना परिवारजनों को ख़बर किए पाकिस्तान पहुंचे जहां उन्होंने पाकिस्तान के तालिबान से सम्पर्क साधाने की कोशिश की। इनके अचानक लापता होने पर इनके परिवारों ने एफबीआई से सम्पर्क किया था और फिर उसने उन्हें पाकिस्तान में ढूंढ निकाला था। और जहां तक बरूच गोल्डस्टीन का सम्बन्धा है तो न्यूयॉर्क में जन्मे इस यहुदी ने इस्त्राएल की नागरिकता कबूल की, वहां जाकर एक अतिवादी समूह 'कच' का सदस्य बना और अपनी प्रार्थना में जुटे 29 फिलिस्तीनियों को मार डाला था।

    रेड सेल इस बात के प्रति स्पष्ट है कि आतंकवाद का अमेरिकी निर्यात कोई हाल की परिघटना नहीं है, न ही उसका ताल्लुक सिर्फ इस्लामिक अतिवादियों से या मध्यपूर्व में जनमे लोगों से या अफ्रीकी या दक्षिण एशियाई नस्लीय मूल के लोगों से है। यह गतिविज्ञान इस अमेरिकी विश्वास को खारिज करता है कि वहां का आज़ाद, खुला और एकीकृत बहुसांस्कृतिक समाज अतिवाद के प्रति या आतंकवाद के प्रति लोगों के सम्मोहन को कमजोर करता है।' रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि अमेरिका द्वारा ''आतंकवाद के निर्यात'' को लेकर पनपती धारणा तथा अन्तरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से अमेरिका के दोहरे पैमाने, यह सिलसिला आगे बढ़ा यह स्थिति भी बनी सकती है कि भविष्य में बाकी मुल्क आतंकी घटनाओं को लेकर अमेरिका को सहयोग देना बन्द करे।

    ध्यान रहे कि सीआईए की प्रस्तुत रिपोर्ट न क्यूबाई अमेरिकी आतंकी पोसाडा कारिल्लेस का उल्लेख करती है, न इस बात की चर्चा करती है कि अमेरिका की सरजमीं पर उसने 'स्कूल आफ अमेरिकाज्' कायम किया है, न इस मसले पर रौशनी डालती है कि किस तरह सोविएत संघ के जमाने में कम्युनिज्म के विरोधा के नाम पर अमेरिका ने ग्लाडिओ ऑपरेशन चलाया था। अपने अतीत के अपराधों पर बहुत सीमित नज़र डाल रही सीआईए रेड सेल की प्रस्तुत रिपोर्ट रोनाल्ड रेगन के जमाने में अफ़गानिस्तान पर कब्जा जमाए सोविएत रूस को हटाने के लिए अफ़गान मुजाहिदिनों को दिए गए अमेरिकी समर्थन की चर्चा भी नहीं करती है, जिन्हें मीडिया के सामने पेश करते हुए रेगन ने कहा था अमेरिका की जिन लोगों ने नींव डाली उन्हीं के समकक्ष यह अपने मुल्क के लोग हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन्हीं मुजाहिदिनों में ओसामा बिन लादेन भी शामिल था। ये ऐसे अहम उदाहरण हैं जो उजागर करते हैं कि अमेरिका ने किस तरह अपनी चौधाराहट बनाए रखने के लिए आतंकियों का या ऐसे समूहों का सहारा लिया है, उन्हें बढ़ावा दिया है।

     आतंकवाद को लेकर अमेरिकी दोहरापन उजागर करता एक किस्सा बहुत मशहूर है। अस्सी के दशक की शुरूआत में निकारागुआ की वामपंथी सरकार को अपदस्थ करने के लिए अमेरिका ने कान्ट्रा आपरेशन चलाया था, निकारागुआ के अन्दर वामपंथी शासन को कमजोर करने के लिए अमेरिका की शह पर कई सारी आतंकी कार्रवाइयों को अंजाम दिया गया था। उन दिनों जनाब एंथनी क्वेन्टन नामक व्यक्ति निकारागुआ में अमेरिका के राजदूत थे। (1984) जब किसी पत्रकार सम्मेलन में एक उत्साही पत्रकार ने दुनिया भर के आतंकी हमलों की अमेरिकी भर्त्सना और निकारागुआ के अन्दर बन्दरगाहों और एअरपोर्ट को बम से उड़ाने की घटना में फरक करने को कहा था। राजदूत क्वेन्टन इतना कहा था 'अगर वे करते हैं तो वह आतंकवाद कहलाता है और अगर हम करें तो उसे अपनी आजादी के लिए लड़ना कहा जाता है।'

     अब जहां तक स्कूल आफ अमेरिकाज - जिसे अब 'वेस्टर्न हेमिस्फियर इन्स्टिटयूट फार सिक्युरिटी कोआपरेशन' नाम से भी जाना जाता है का सवाल है तो यह जानने योग्य है कि अमेरिकी करदाताओं के सहारे चल रहे प्रस्तुत स्कूल ने अपने निर्माण के बाद से अब तक पन्द्रह देशों के साठ हजार से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया है, जिन्होंने अपने मुल्क लौटने के बाद मानवाधिकारों के जबरदस्त उल्लंघन किए हैं या जो यातना देने, लोगों को फर्जी मुठभेड़ों में मार डालने तथा कत्लेआमों के लिए बदनाम हुए हैं। दरअसल जार्जिया के फोर्ट बेनिंग में इन दिनों स्थित इस संस्थान की शुरूआत वर्ष 1946 में पनामा में हुई थी जो 1984 में यहां स्थानान्तरित किया गया।

      वैसे इन उदाहरणों में नाटो के अग्रणी देश होने के नाते अमेरिका द्वारा चलाए गए आपरेशन ग्लाडिओ के बारे में भी बहुत कम लोग वाकीफ होंगे।  दूसरे विश्वयुध्द के बाद सोविएत संघ के प्रभाव को रोकने के लिए या कम्युनिज़म के दुष्प्रभाव से दूर रहने के लिए आपरेशन ग्लाडिओ के अन्तर्गत नाटो के सदस्य देशों के बीच से अर्ध्दसैनिक बलों का निर्माण किया गया था, जिन्होंने यूरोप के तमाम शहरों में आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जिसमें हजारों लोग मारे गए थे। इन सभी घटनाओं का दोषारोपण कम्युनिस्टों पर किया जाता था।

स्पष्ट है कि आतंकवाद को अंजाम देने में  अमेरिकी सरकार को कोई परेशानी नहीं है, उसकी परेशानी यही है कि इसका पर्दाफाश न हो ! अगर वह आतंकवाद से वाकई इतना परेशान होता तो उसकी भाषा ही बदल जाती। उल्टे आतंकवाद को लेकर वह सभी अन्तरराष्ट्रीय कानूनों को भी किनारे रखना चाहता है। 

        डेढ़ सौ से अधिक मासूमों की हत्या के लिए जिम्मेदार कहे जा सकनेवाले आतंकी डेविड हेडली को भारत को सौंपने या उसकी पूछताछ मौका भारत की जांच एजेंसियों को देने से रोकने में अमेरिका की तरफ से यही हास्यास्पद तर्क दिया जाता रहा है कि 'खुद हेडली उनसे मिलना नहीं चाहता था'। (बाद में कई माह बाद ऐसी अनुमति मिली)  पिछले साल अमेरिकी सरकार के विदेश विभाग के प्रतिनिधि ने इसी दलील को दोहराया था,  जब अक्तूबर माह में हेडली की गिरफ्तारी के बाद भारत के गुप्तचर विभाग की एक टीम अमेरिका पहुंची थी ? पीटीआई द्वारा जारी एक रिपोर्ट, जिसे रिडिफ डाट काम ने (15 दिसम्बर 2009) जारी किया था, के मुताबिक 'अपनी चर्चाओं में एफबीआई के अधिकारियों ने भारतीय जांचकर्ताओं को बताया था कि हेडली नहीं चाहता कि भारत के अधिकारी उससे सवाल जवाब करे, जिसने इन सन्देहों को जन्म दिया था कि अमेरिकी एजेन्सी खुद नहीं चाहती कि उसे भारत में पूछताछ का सामना करना पडे''।

सुभाष गाताड़े