संस्करण: 06 दिसम्बर-2010  

तेजाब हमले पर नयी रणनीति

? अंजलि सिन्हा

       

         हिंसा के इस बेहद गम्भीर और क्रूर स्वरूप पर केन्द्र सरकार ने अपनी संवेदनशीलता और प्रतिबध्दता फिर से दरर्शायी है। पिछले कई वर्षों से यह मुद्दा चर्चा के केन्द्र में रहा है कि इस अपराधा के लिये सख्त कानून बने। कभी सरकार ने सहमति जतायी तो कभी कहा कि जिस कानूनी प्रावधान के तहत इस अपराधा के खिलाफ कार्रवाई होती है वही काफी है। ज्ञात हो कि अभी तक भारतीय दण्ड संहिता धाारा 326 ए तथा 326 बी के जोड़े जाने की बात हो रही है। केन्द्रीय गृहसचिव  श्री गोपाल पिल्लई की अधयक्षता में एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया गया था। उसने यह सिफारिश की कि इस गम्भीर अपराधा के लिये 10 साल की जेल तथा 10 लाख का जुर्माना हो सकता है। सम्भावना है कि सरकार इसे अगले सत्रा में पेश करेगी। कमेटी की इस सिफारिश से पहले केन्द्र सरकार के स्वास्थ्य मन्त्रालय ने भी एक योजना की बात कही थी जिसके तहत तेजाब के कारण झुलस चुके तथा बदसूरत हो चुके चेहरे और शरीर के मुफ्त प्लास्टिक सर्जरी की बात कही गयी थी। एक बीमा योजना की बात भी कही गयी है। स्वास्थ राज्यमन्त्री दिनेश त्रिवेदी की तरफ से पहल की गयी है। उन्होंने यह भी कहा कि यह सुविधा सिर्फ शहरों में नही बल्कि जिला स्तर पर होनी चाहिये । जिला स्तर के अस्पतालों में ऑपरेशन थियेटर होना चाहिये जहां डॉक्टर ऑपरेशन कर सके।

      तेजाब से पीड़ित लोगों के ईलाज के लिये प्रशिक्षित डॉक्टरों की भी कमी है हमारे देश में। पीड़ितों का इलाज काफी महंगा होता है। तथा विकृत हो चुके चेहरे की सर्जरी कई बार करनी पड़ती है। ऐसे में अधिकतर पीड़ित जो गरीब तबके से आते हैं उन्हें तो इलाज करना भी सम्भव नहीं होता है तो वे अपनी सूरत ठीक करने पर कहां खर्च कर पायेंगे। पीड़ित महीनों तक असहनीय दर्द झेलते हैं। उनसे शादी जैसा रिश्ता तो दूर लोग दोस्त की श्रेणी में भी नहीं रखते और अक्सर बच्चे भी इन पीड़ितो से दूर भागते हैं। इस प्रकार मानवीय जीवन जीना एक तरह से खतम हो जाता है। ऐसे में यदि यह दोनों घोषणाये अमल में आ जाय तो राहत जरूर मिलेगी यानि एक वो सख्त कानून बने जिसमें दोषी को अपराधा की सजा मिले तथा दूसरे मुफ्त मेंड़िकल सुविधा उपलब्धा हो।

      ऐसे हमले की शिकार महिलाओं के लिए कार्यरत समूहों द्वारा दिल्ली में कुछ समय पहले एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया था। इस कार्यक्रम में पीड़िताओं ने अपनी आपबीती जनता के सामने रखी थी। कहा जा सकता है कि दहेज हत्या, सतीप्रथा, गर्भजल परीक्षण के जरिए मादाभ्रूण के खातमे या कन्या शिशुओं की हत्या के रूप में स्त्री को जिस बर्बर किस्म की हिंसा का शिकार होना पड़ता है, उसी में नाम जुड़ गया है एसिड हमलों का।

      पिछले साल एक एसिड हमले की ख़बर मैसूर के हवाले से छपी थी, जिसमें पति ने खुद पत्नी को पहले शराब में डाल कर एसिड पीने के लिए मजबूर किया और उसके चिल्लाने पर वही बोतल उस पर उंडेल दी। अस्सी फीसदी जली अवस्था में अस्पताल पहुंचा दी गयी हीना फातिमा अभी जिन्दगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही है और उसका पति फिरोज फरार है।

      एसिड हमले के जितने मामले सामने आए हैं उनके अधययनों के आधार पर कहा जा सकता है एसिड का असर चमड़ी से लेकर अन्दर तक गहरा असर पड़ता है। कभी-कभी एसिड हड्डियों को भी गला देता है, आंखों की रौशनी खतम कर देता है तथा वह व्यक्ति की कार्यक्षमता को भी प्रभावित करता है। ऐसे हमले के शिकार व्यक्ति के लिए ताउम्र समाज में साधारण व्यक्ति की तरह जीना सम्भव नहीं हो पाता है। चेहरा और शरीर का विकृत रूप के चलते वे खुद भी हीनभावना का शिकार हो जाते हैं और इन मामलों के प्रति असंवेदनशील रहनेवाला समाज भी स्थिति को और गम्भीर बना देता है।

      आम तौर पर एसिड से जलाए जाने पर होने वाला इलाज बेहद महंगा होता है और अगर पीड़ित गरीब परिवार से है तो उसके लिए यह इलाज एवम रखरखाव असम्भव सा हो जाता है।

      निश्चित ही इस प्रकार के क्रूरतम हमले को हम अलग-थलग करके नहीं देख सकते। हमारे समाज में जितना अधिक स्त्रीद्रोही विचार और माहौल है, उसी की यह परिणति है। अक्सर होता यही है कि ऐसी घटना को अंजाम देने वाले व्यक्ति को मनोरोगी या गुस्सेल स्वभाव का बताते हुए लीपापोती की कोशिश चलती रहती है, और उसके सामाजिक सन्दर्भ से उसे काट दिया जाता है।

      भारत में बंगलौर तथा मुंबई में एसिड हमले के पीड़ितों ने अपने समूहों का गठन किया है और वे अपने अधिकारों के लिए तथा एक-दूसरे को सहायता करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनकी एकता का आधार और कुछ नहीं सिर्फ हमले का एक प्रकार का होना है। 'बर्न सर्वाइवर ग्रुप आफ इण्डिया' ऐसा ही एक समूह बम्बई में है। 22 वर्षीय अपर्णा प्रभु जो खुद ऐसे हैवानी हमले की शिकार है, उसकी एक आंख भी चली गयी है। एक अन्य पीड़ित शीरीं ने कहा कि हम बहुत दुखी होते हैं जब बच्चे हमें देख कर डर जाते हैं और चिल्ला कर भागते हैं।

      गौर करें कि इस प्रकार से बदला लेने की प्रवृत्ति क्यों पनपती ही है। कैसे कोई दूसरों पर किसी भी प्रकार की हिंसा करने का अधिकार समझ सकता है। कई सारे मामलों में शादी या प्रेम से इंकार करने पर पुरूष इस मानसिकता में एसिड फेंकते हैं कि 'तू मेरी नहीं हो तो किसी की नहीं', मानो स्त्री उसकी निजी सम्पत्ति हो। यह स्त्री को स्वतंत्रा इन्सान समझ कर भोग की वस्तु समझने का परिणाम है।

      जरूरत है इस मानसिकता के कारणों को समझ कर उनका उन्मूलन करने की तथा दोषी व्यक्ति पर त्वरित कार्रवाई कर उसे सज़ा दिलाने की।

      एसिड हमलों का शिकार महिलाओं की समस्याओं को लेकर बनी कर्नाटक के लोगों ने एक फिल्म भी बनायी है, जो लोगों को इस मसले पर सम्वेदनशील बनाने का काम कर रही है। फिल्म का शीर्षक है 'बर्न्ट नॉट डिस्ट्राइड' ( जले हैं मगर नष्ट नहीं हुए है)।

      यह बात रेखांकित करनेवाली है कि एसिड हमले की परिघटना सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। भारतीय उपमहाद्वीप के पाकिस्तान, बांगलादेश जैसे मुल्कों के अलावा आसपास के कई देशों से इस किस्म के समाचार मिलते रहते हैं। एक अधययन के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में बांगलादेश में एसिड फेंकने की घटनायें बढ़ी हैं। 90 के दशक के पहले के सालों में जहां ऐसे हमलों की संख्या वहां दर्जन से पचास के बीच थी वहीं बाद के वर्षों में यह आंकड़ां तीन सौ के करीब पहुंचा। और जहां तक सज़ा दिए जाने का सवाल था तो ऐसी स्थितियां न के बराबर थीं। वहां सक्रिय सामाजिक संगठनों के मुताबिक एसिड फेंकने के निम्न कारण दिखते हैं : शादी से इन्कार, दहेज, पारिवारिक झगड़ा, वैवाहिक तनाव, जमीन विवाद या कुछ राजनीतिक कारण।

      तेजाब की विक्री पर लाइसेन्स की जरूरत पर भी अनेकों बार चर्चा चली है लेकिन कुछ तय नहीं किया जा सका है। अन्त में स्थायी समाधान के लिये पूरे समाज में संवेदनशीलता बढ़ना जरूरी है। स्त्रीपुरुष के बीच भेद और गैरबराबरी कायम रहेगी तो तरहतरह के हिंसा के लिये जगह बनी रहेगी। इसलिये बराबरी के दूसरे उपाय और प्रयास भी इस अपराधा पर काबू पाने में मददगार साबित होगा।

 

? अंजलि सिन्हा