संस्करण: 06 दिसम्बर-2010

जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग की अल्पसंख्यकों को आरक्षण की सिफारिश एक धोखा पसमान्दा समाज मुल्क में सियासी जरूरत बनें-कुरैशी

? मो. इब्राहीम कुरैशी

              

         भारतीय संविधान में धार्म के आधार पर आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। यही कारण है कि कई राज्य सरकारों ने महज राजनैतिक लाभ के लिए अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को आरक्षण दिये जाने की व्यवस्था है। तथा संविधान के अनुच्छेद 16(4) में राज्य सरकारों को इस संबंधा में निर्णय लेने, योजनाऐं बनाने की जवाबदारी सौंपी गई है।

      जहां तक जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट का सवाल है। जिसमें दलित मुस्लिमों एवं दलित क्रिश्चियनों को हिन्दू दलितों के समान सुविधा (आरक्षण) दिये जाने की अनुशंसा की है। उस संबंधा में इसी आयोग की सदस्य सचिव श्रीमती आशा दास आईएएस ने आयोग के प्रतिवेदन पर अपनी प्रतिकूल टिप्पणी दी है। ऐसी स्थिति में आयोग का यह प्रतिवेदन महज अनुशंसाओं का पुलिंदा मात्र रह गया है कानूनन उसकी कोई स्थिति नहीं है। इसी कारण केंद्र शासन ने विभिन्न राजनैतिक दलों की मांग पर जब इस आयोग की रिपोर्ट को पटल पर रखा तब बिना ए.टी.आर. के साथ प्रस्तुत किया। इसी तरह इस आयोग की एक अन्य सिफारिश 15 प्रतिशत अल्पसंख्यकों को शासकीय सेवाओं में आरक्षण दिये जाने संबंधी है जिसमें 10 प्रतिशत मुस्लिम अल्पसंख्यक तथा 5 प्रतिशत अन्य अल्पसंख्यक वर्ग के लिये है यह सिफारिश भी धार्म के आधार पर आरक्षण दिये जाने की अनुशंसा के कारण संवैधानिक है। तथा संपूर्ण आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं किया जा सकता मा. उच्चतम न्यायालय की पूर्ण पीठ के निर्णय के कारण अमल योग्य नहीं है। इस निर्णय के परिप्रेक्ष में संवैधानिक संशोधान की आवश्यकता होगी इसके लिए देश की कोई भी सियासी जमात तैयार नहीं है क्योंकि मुल्क का पसमान्दा तबका अभी इस मुल्क में सियासी जरूरत नहीं बना है। (तमिलनाडु एवं बिहार छोड़कर) यही स्थिति अल्पसंख्यकों की है। मुस्लिम ईसाई दलितों को अनुसूचित, जाति के मौजूदा कोटे में ही एडजस्ट करने से आपसी तकरार बढ़ेगी पृथक आरक्षण के लिए आरक्षण की उनकी सीमा बढ़ाना होगा वह भी संभव नहीं है। इस स्थिति से विद्वान जस्टिस श्री रंगनाथ मिश्र तथा आयोग के अन्य सदस्य वाकिफ थे कि इन सिफारिशों पर अमल नहीं हो सकता महज वाहवाही लूटने के मकसद से अल्पसंख्यकों के जजबात उभारने के लिये ऐसा किया गया प्रतीत होता है। विशेषकर उल्लेखनीय है कि मुस्लिम पसमान्दा समाज से कोई नुमाईन्दा इस आयोग में नहीं था।

      राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एवं राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने देश के दलित मुस्लिमों/ईसाईयों की जो बिरादरें हिन्दु दलितों के समान पेशा कर रही है जैसे हैला हलालखोर शेख मेहतर मौची मुसाहार, कधोड़ी, धोबी, खाटिक, कुरैशी, भिश्ती, (सक्का अब्बासी) आदि को दलितों के समान आरक्षण देने की सिफारिश धार्मिक आधार पर भेदभाव को दूर करने वाली यानी संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत लगाई गई रोक को हटाने के लिये है। जो सर्वदा उचित तथा संविधान के दायरे में है। ऑल इंडिया मुस्लिम बेकवर्ड क्लास ने भी इसी आधार पर दलित मुस्लिमों को आरक्षण दिये जाने की मांग की है। यदि रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट पर शासन कुछ अल्पसंख्यक नेताओं के दबाव में आकर निर्णय लेता है। तब उसे न्यायालय में अपने निर्णय को उचित सिध्द करने में दिक्कत पेश आयेगी तथा अल्पसंख्यक दुश्मनी के लिये अपनी पृथक पहचान रखने वाले राजनैतिक दलों, संगठनों को माहौल बिगाड़ने का अवसर मिलेगा। जिसकी शुरूआत उन्होंने कर दी है।

      देश में अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के बीच से बड़ी तादाद में पिछड़े वर्गों की पहचान 1955 में गठित काका कालेलकर आयोग तथा 1980 में गठित मंडल कमीशन और राज्य स्तर पर विभिन्न राज्यों में गठित पिछड़ा वर्ग आयोगों ने की है। उसमें मुस्लिम पिछड़े वर्गों को भी शामिल किया गया है। पूरे मुल्क में करीब 140 मुस्लिम बिरादरें पिछड़ा तबका घोषित है तथा 22 मुस्लिम बिरादरें अनुसूचित जनजाति में आती है। चूंकि अनुसूचित जनजाति के लिये धर्म का कोई बंधन नहीं है इसलिए इन्हें अनुसूचित जनजाति की सभी सुविधाएं कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक बिना भेदभाव के प्राप्त है। अभी हाल में भारतीय प्रशासनिक सेवा के 31 युवाओं का चयन हुआ जिसमें 22 प्रतिभागी मुस्लिम पसमान्दा समाज तथा मुस्लिम अनुसुचित जनजाति से है।

      आज तक किसी भी आयोग में मुस्लिम पसमान्दाओं के साथ हालांकि भेदभाव किये जाने की शिकायत दर्ज नहीं है। फिर भी व्यवहार में देखा जाये तब राजनैतिक प्रशासनिक स्तर पर सबसे ज्यादा भेदभाव पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र में हो रहा है। सबसे ज्यादा शिकायतें जाति प्रमाणपत्र हासिल करने में आ रही दिक्कतों से संबंधित है जो कि किसी भी सुविधा को हासिल करने के लिये पहली शर्त है। महाराष्ट्र में इस प्रक्रिया से भ्रष्टाचार बढ़ा है। इसी लिये मुल्क का पसमान्दा तबका संगठित होकर सभी राजनैतिक दलों में अपनी हिस्सेदारी मांग रहा है। ऑल इंडिया मुस्लिम बेकवर्ड क्लास फेडरेशन ने भी मुस्लिम पसमान्दा समाज को सामाजिक न्याय दिलाने के लिये मुहिम छेड़ी हुई है और केंद्र एवं राज्य स्तर पर पिछड़े वर्गों के लिये दिये गये 27 प्रतिशत आरक्षण में से आबादी के अनुपात में 8.5 आरक्षण प्राप्त  आरक्षण में से ही इन वर्गों के लिये सुरक्षित करने की मांग की है। जो कि मंडल आयोग की सिफारिशों के अनुरूप है।

      अभी हाल में अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय राज्यमंत्री श्री सलमान खुर्शीद ने भी अल्पसंख्यक समुदाय के मुस्लिम पिछड़े तबकों को पृथक से आरक्षण दिये जाने की मांग का समर्थन किया है। क्यूंकि हकीकत युपीए सरकार की एवं देश की सबसे बड़ी सियासी पार्टी कांग्रेस की समझ में आ गई है कि पूरे मुस्लिम समुदाय को आरक्षण दिया जाना असंवैधानिक कदम होगा। तथा न्याय पालिका शासन के इस निर्णय को पलट सकती है। धर्म के आधार पर आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। पूरे मुल्क में कुल मुस्लिम आबादी का 80 प्रतिशत मुस्लिम पसमांदा समाज है जिसमें इस्लाम वर्ग का अनुयायी अनुसूवित जनजाति का वर्ग भी आता है। लेकिन मुस्लिम पसमान्दा समाज को सरकार तथा सियासी पार्टियों में नुमाइंदगी 2 प्रतिशत भी नहीं है। सबसे दयनीय स्थिति कांग्रेस पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, सी.पी.एम., जनता दल की भाजपा शिवसेना का जहां तक सवाल है उनके एजेंडे में ही अल्पसंख्यकों के कल्याण को प्राथमिकता नहीं है तब पसमान्दा मुसलमानों के बारे में सोचने का प्रश्न कहां पैदा होता है।

      मुस्लिम पिछड़े वर्गों की स्थिति कुल मुस्लिम आबादी की राज्यवार स्थिति में इस प्रकार है। सर्वाधिक बिहार 92 प्रतिशत राजस्थान, महाराष्ट्र, मधयप्रदेश, जम्मू कश्मीर 90 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल 86 प्रतिशत गुजरात उत्तर प्रदेश, आंध्रप्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड, झारखंड, हरियाणा में 80 प्रतिशत तथा दिल्ली, तमिलनाडु, केरल, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, 70 प्रतिशत तथा अन्य राज्यों में करीब 60 प्रतिशत है। जागरूकता के अभाव में यह वर्ग अभी सियासी पार्टियों के लिये राजनैतिक आवश्यकता नहीं बन सका है। तमिलनाडु एवं बिहार को छोड़कर जो कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में आवश्यक है। जिन राज्यों में मुस्लिम पिछड़े तबकों में राजनैतिक चेतना आई है वहां सामाजिक न्याय के नाम पर सियासत करने वाली राजनैतिक पार्टियों ने नुमाइंदगी देने की पहल की है। इसमें बिहार देश का पहला राज्य है। लेकिन आम मुस्लिम पसमान्दा समाज की हालत सुधारने कोई प्रयास नहीं हुए उल्टे मुस्लिम पसमान्दा समाज के नेताओं ने निजी स्वार्थ के लिए मुस्लिम समाज में आपस में नफरत फैलाने का गैर इस्लामी काम फिरकापरस्त सियासी ताकतों को प्रत्यक्ष फायदा पहुंचाने का काम किया।

      लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि समय रहते देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस ने इस संबंध में अपनी सोच में कोई बदलाव नहीं लाया इसकी वजह स्पष्ट है कि केंद्र की युपीए सरकार एवं कांग्रेस पार्टी पर अल्पसंख्यकों का उच्च वर्ग पिछड़े मुसलमानों को सामाजिक न्याय दिलाने का दिल से पक्षधार नहीं है। तथा इन वर्गों की राजनैतिक हिस्सेदारी से परेशान है हाल ही में हरियाणा राज्य चुनाव में पांच मुस्लिम विधायक चुन कर आये है। जो सभी पिछड़े वर्ग से संबंधा रखते हैं। मात्र एक विधायक कांग्रेस पार्टी से है। स्थिति निम्नानुसार है। जैसे अफजल अहमद मेंव कांग्रेस नूह चौधरी इलियास आई.एन.एल.डी. पुन्हाना, नसीन मेव आई.एन.एल.डी., फिरोजपुर झिरका, अकरम गुर्जर, बी.एस. पी. यमुनानगर, और तलेब खां मेव निर्दलीय हतीम, हालांकि इन सभी सीटों पर कांग्रेस पार्टी के टिकिट मांगने वाले प्रबल दावेदारों की कमी नहीं थी लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने केंद्र में जिस अल्पसंख्यक नेता को प्रत्याशी चयन की जवाबदारी सौंपी थी वह मुस्लिम उच्च वर्ग से होने से मुस्लिम पसमान्दा बिरादरों का हरियाणा में कांग्रेस पार्टी के भीतर कोई वर्चस्व तैयार हो ऐसा नहीं चाहते थे। नतीजा इस राज्य में कांग्रेस कमजोर हुई हैं।

      यह सुखद स्थिति है कि देश की एक और सियासी जमात जिसकी पश्चिम बंगाल में सरकार है। उसने मुस्लिम पसमान्दा में आई इस राजनैतिक चेतना को महसूस किया है और पिछड़े वर्गों को दिये जाने वाले आरक्षण की सीमा बढ़ाने उसमें से 10 प्रतिशत आरक्षण पश्चिम बंगाल के मुस्लिम पसमान्दा तबकों को दिये जाने की घोषणा की है। और इस आरक्षण का लाभ भी 15 दिसम्बर 2010 से इस सूबे के मुस्लिम पसमांदा समाज को मिलने लगेगा तदविषयक शासन आदेश भी जारी किये है। सामाजिक न्याय की दिशा में यह प्रयास मील का एक पत्थर साबित होगा। ऑल इंडिया मुस्लिम बेकवर्ड क्लास फेडरेशन जो मुल्क में एक गैर सियासी सामाजिक संगठन है। पश्चिम बंगाल में लिये गये इस निर्णय का स्वागत करता है। तथा मुल्क के मुस्लिम पसमान्दा समाज की न्याय प्राप्त करने की कोशिशों की जीत बताया है। इसका लाभ वामपंथी दलों को आगामी विधानसभा चुनाव में मिल सकता है।

      यह हकीकत है कि इस मुल्क की सियासी पार्टियों मुस्लिम समुदाय के जितने भी धार्मिक संगठन (तंजीमें है।) ने मुस्लिम पिछड़े तबकों को पसमान्दा तबकों में शामिल किये जाने की कभी मुखालफत नहीं की और अब तो खुलकर समर्थन भी कर रही है। यह इन पसमान्दा तबकों में सियासी बैदारी आने पर ही संभव हुआ है।

      यह हकीकत है कि मुस्लिम पसमान्दा समाज की लड़ाई हिन्दु पसमान्दा तबकात के लीडरों एवं सामाजिक न्याय के पक्षधार नेताओं ने लड़ी और बराबर का इंसाफ दिलाने में मदद की उस समय मुस्लिम पसमान्दा तबकों में इतनी बैदारी नहीं थी कि वे अपनी लड़ाई खुद लड़ते मंडल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर स्व. विश्वनाथ प्रताप सिंह तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस मुल्क के पूरे पसमान्दा तबकों को सामाजिक न्याय दिलाने में अहम भूमिका निभाई। जिनमें मुस्लिम पसमान्दा तबका भी शामिल है और उन्हें सदैव याद रखेगा। मुस्लिम पसमान्दा समाज को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए स्व. देवकी नंदन बहुगुणा उत्तर प्रदेश कपूरी ठाकुर बिहार, महात्मा ज्योतिबा फुल महाराष्ट्र, स्व. साहिब सिंह वर्मा दिल्ली, श्री पी.एस. कृष्णन आय.ए.एस., पूर्व सचिव, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार का योगदान अविस्मरणीय है।

      1980 के बाद इसकी शुरूआत म.प्र. राज्य में सर्वप्रथम तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अर्जुन सिंह श्री दिग्विजय सिंह ने की मुस्लिम पसमान्दा समाज को अन्य पिछड़े वर्गों को शामिल कराने के लिए राज्य में पिछड़ा वर्ग आयोगों की सिफारिशों को आधार बनाकर 39 मुस्लिम बिरादरों को पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया जो सूबे की कुल मुस्लिम आबादी का 85 प्रतिशत है। स्व. श्री रामजी महाजन, श्री सरदार सिंह डंगस तत्कालीन अधयक्ष राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग, का प्रयास भी सराहनीय है। इसी प्रकार श्री अशोक गहलोत मुख्यमंत्री राजस्थान सरकार, श्री छगन भुजबल मंत्री महाराष्ट्र सरकार, श्री वीरप्पा मोईली, केंद्रीय कानून मंत्री भारत सरकार, श्री सलमान खुर्शीद केंद्रीय राज्यमंत्री अल्पसंख्यक मामले मो. शफी कुरैशी पूर्व केंद्रीय मंत्री कश्मीर, मौलाना असरारूल हक सांसद बिहार मुस्लिम पसमान्दा समाज के हितों के संरक्षण के लिये सदैव प्रयत्नशील है।

      राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम पसमान्दा समाज के हकों के लिए संघर्ष करने में स्व. कयूम अंसारी बिहारी बाबा ए कौम अंसारी, बिरादर, स्व. कासिम अली आबिद स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पूर्व सांसद आंध्र प्रदेश, स्व. चौधरी रहीम पूर्व सांसद हरियाणा. स्व.पी.एम. सईद, लक्षद्वीप, स्व. अशफाक हुसैन अंसारी सांसद गोरखपुर, उ.प्र. स्व. चौधरी नूर मोहम्मद एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट दिल्ली, स्व. मौलाना बशीर मोहम्मद कोटा राजस्थान, स्व. हफीज मोहम्मद विधायक चैयरमैन अल्पसंख्यक आयोग राजस्थान, स्व. मुईनउद्दीन हक्कानी, जयपुर, दुनिया के सबसे लम्बी उम्र के व्यक्ति स्व. हाजी हबीब मिया (139 वर्ष) बाबा ए कौम अब्बासी बिरादर जयपुर, स्व. रमजान खां कायमखानी पूर्व मंत्री राजस्थान, स्व. गुलाम सरवर पूर्व अधयक्ष विधान बिहार, स्व. चौधरी खलीलर्उरहमान मुरादाबाद, स्व. जलील अब्बासी पूर्व सांसद (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी) उत्तर प्रदेश, स्व. भैया रशीद उद्दनी बाबा ए कौम कुरैश बिरादर, हयात अली खान पूर्व सांसद पश्चिम बंगाल ने अहम भूमिका निभाई यह हमारे प्रेरणास्त्रोत है।

 

? मो. इब्राहीम कुरैशी