संस्करण: 06 दिसम्बर-2010  

गौरव दिवस ने छीना शिक्षा का अधिकार

  ? अमिताभ पाण्डेय

       

            ''मधयप्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में पहले की तुलना में बेहतर कार्य हुआ है,इस क्षैत्र में अभी बहुत सुधार की जरूरत है।'' मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने कार्यकाल के पॉच वर्ष पूर्ण होने पर जब मीडिया के लिए उक्त आशय के बयान दे रहे थे लगभग उसी समय भोपाल के एक दर्जन से अधिक स्कूलों को  29 नवम्बर के दिन बंद रखने का निर्णय शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने लिया । राज्य में सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री श्री सिंह के कार्यकाल की 5 वर्ष  की अवधिा पूरी हो जाने पर 29 नवम्बर को गौरव दिवस के रूप में मनाने का आवहान किया गया । इस आवहान मे प्रदेश भर के कार्यकर्ताओं से भोपाल आने के लिए कहा गया जहॉ भाजपा के दिग्गजों ने भव्य समारोह में मुख्यमंत्री  श्री सिंह का सम्मान किया ।

      भाजपा के आवहान पर आयोजित गौरव दिवस से किसी को कोई आपत्ती नहीं लेकिन इसके नाम पर एक दिन कुछ स्कूलों को बंद कर देने की घोषणा कहॉ तक उचित है? भोपाल के भेल इलाके  में  एक दर्जन स्कूलों में 29 नवम्बर को तालाबंदी हो जाने से बच्चों की पढाई का नुकसान हुआ। भेल क्षेत्र के जवाहर लाल  नेहरू विघालय, डॉ राधाकृष्णन स्कूल, सेंट जेवियर्स स्कूल, विक्रम हायर सेकण्डरी स्कूल, रमन स्कूल, कार्मल कान्वेट स्कूल, विवेकानंद विघापीठ,     डी ए वी हायर सेकण्डरी स्कूल, सेंट थेरसा स्कूल सहित कुछ अन्य स्कूलों को बंद रखने से बच्चों को एक दिन की पढाई का जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई कौन करेगा?

      भेल क्षेत्र में स्थित संकुल केन्द्र महात्मा गॉधी स्कूल के प्राचार्य विकास जोशी के अनुसार जम्बूरी मैदान पर होने वाले भाजपा के आयोजन के कारण दिनभर क्षैत्र में भारी भीड रहेगी जिससे बच्चों को परेशानी हो सकती है। इसके चलते स्कूल प्रंबधान ने 29 नवम्बर को छुटटी रखने का निर्णय लिया है। इसी प्रकार राज्य शिक्षा केन्द्र ने भी भेल क्षेत्र के कुछ स्कूलों में 29 नवम्बर को होने वाली छमाही परीक्षा भी स्थगित कर दी। यह परीक्षा अगले दिन आयोजित करने के निर्देश दिये गये हैं। मतलब यह कि गौरव दिवस के लिए एक दिन की पढाई का बलिदान किया गया, साथ ही बच्चों की छमाही परीक्षा भी प्रभावित हुई।

      एक ओर जहॉ मधयप्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता को बढाने के लिए नई नई योजनाओ के क्रियान्वयन का दावा हो रहा है, शिक्षा के अधिकार को त्वरित गति से लागू किये जाने की चर्चा हो रही हैं वहीं राजनीतिक आयोजन के चक्कर में बच्चों की पढाई को कुर्बान  किया जा रहा हैं। इसके पहले मधयप्रदेश के ही टीकमगढ जिले के एक गॉव में सत्तारूढ  दल के नेताजी की रैली को सफल बनाने के लिए जनपद पंचायत के अधिकारी ने मधयान्ह भोजन के बजट का उपयोग करने के लिए लिखित निर्देश दे डाले थें। जब इसका हल्ला मचा तो मामले को रफा दफा कर दिया गया ।

      यहॉ यह पूछना प्रासंगिक है कि राजनीतिक आयोजन के कारण बच्चों की पढाई प्रभावित नहीं हो, क्या ऐसी कोई व्यवस्था साकार हो सकेगी?

      राजनीति के चक्कर से बच्चों की शिक्षा को मुक्त करने के कडे प्रावधान कब प्रभावशील होगें? इस बारे में शिक्षा के लिए कार्यरत युवा समाज सेवी प्रशांत दुबे कहते है कि मधयप्रदेश में शिक्षा को लेकर जो बडे बडे आकड़े पेश किए जा रहे हैं प्रचार प्रसार माधयमों में जो सुनहरी तस्वीर दिखाई जा रही है। दरअसल हकीकत में ऐसा नहीं है। अब भी प्रदेश में स्कूल जाने योग्य उम्र के एक लाख अस्सी हजार से ज्यादा बच्चे शिक्षा से दूर है। शहर से दूर ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की स्थिति चिंताजनक है। स्कूलों में पीने के पानी, शौचालय, शैक्षणिक सामग्री का अभाव है। मधयान्ह भोजन और शिक्षक विद्यार्थी अनुपात में गडबडी होने के साथ ही अन्य कई समस्याएं भी है। जिनका समाधान वर्षों से नहीं हो पाया है। शिक्षा के क्षेत्र की इन अव्यवस्थाओं को नजरअंदाज कर भाजपा सरकार ने अपनी पीठ ठोकने के लिए खुद ही गौरव दिवस का आयोजन कर डाला। इस आयोजन से आम आदमी को क्या हासिल हुआ यह देखा जाना चाहिए। श्री दुबे मानते हैं कि ऐसे समारोह जिनके लिए स्कूलों को बंद करना पडे वे अनुचित ही है। स्कूलों को शिक्षा को राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए।

      उल्लेखनीय है कि शिक्षा का सर्वव्यापी और सर्वस्पर्शी होना राज्य एवं राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में होना चाहिए। परंतु नेताओं के वादे अक्सर घोषणा पत्रों में ही सिमटकर रह जाते हैं। शिक्षा का मूलत: बच्चों से जुड़ा मामला है और बच्चे वोट नहीं देते जो वोट नहीं देते उनकी चिंता करना नेताओं के लिए शायद जरूरी नहीं है। हमें मानना होगा कि राजनीतिक दल चाहे कोई भी हो सभी ने बच्चों और उनकी शिक्षा के प्रति पर्याप्त धयान नहीं दिया है। यदि बच्चों को हक में चलाई जाने वाली बडे बजट की योजनाएं वाकई साकार हो जाती तो बाल श्रम और स्कूलों से बच्चों की दूरी को अब तक खत्म हो जाना चाहिए था। हम यह भी देखते हैं कि साल दर साल बजट की राशि बढती चली जाती है लेकिन बच्चों के प्रति नेताओं की उपेक्षा के भाव में कोई परिवर्तन नहीं दिखता। ऐसा लगता है कि बच्चों को उनके हाल पर छोड दिया गया है और अधिकारी हो या नेता सब अपने स्वार्थ की चिंता में लगे है।

      चूंकि असरदार नेताओं, अधिकारियों, उद्योगपतियों और संपन्न वर्ग के लोगों के बच्चे शानदार निजी स्कूलों में महंगी फीस देकर पढते हैं इसलिए सरकारी स्कूलों में पढने वाले बच्चों की पढाई राम भरोसे ही चलती है। जबतक सभी स्कूलों में समान शिक्षा प्रणाली लागू न हो और शिक्षा के अधिकार को पूरी गंभीरता के साथ लागू न किया जाए तब तक बच्चों की शिक्षा से नेता हो या अधिकारी खिलवाड करते ही रहेंगे।

 

? अमिताभ पाण्डेय