संस्करण: 06 दिसम्बर-2010  

मध्यप्रदेश में हावी खनिज माफिया

? महेश बाग़ी

     

            धय प्रदेश में खनिज माफिया जम कर चांदी कांट रहे हैं। पूरे प्रदेश में चारों ओर खनिज संपदा लूटी जा रही है। सत्ता साकेत में बैठे राजनेताओं के रिश्तेदारों को तो जैसे लूट की खूली छूट दे दी गई है। जिस सरकार पर राज्य के हितों की रक्षा का दायित्व है, वह ख़ुद खनिज माफिया के आगे बिछी जा रही है। सरकार की इस मंशा पर रोक लगाने के लिए कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। राजनीति विश्लेषकों की मानें तो प्रदेश के संसदीय इतिहास में ऐसी लूटख़ोरी पहले कभी नहीं हुई, जितनी अब हो रही है।

      मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के भाई होशंगाबाद में नर्मदा को खोखला करने में जुटे हैं। मीडिया में इस संबंधी खबरें आने के बावजूद वहां रेत खनन जारी है और समूचा प्रशासन तंत्र मूक दर्शक बना हुआ है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री के एक भाई को रायसेन में अवैध खनन करते पकड़ा गया था। यह मामला अब ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है और 'भाई साहब' फिर अवैध खनन में जुट गए हैं। खुद सरकार भी खनिज माफियाओं को उपकृत कर रही हैं खजुराहों में संपन्न ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में खनिज संबंधी एमओयू भी किए गए। अब सरकार को कौन समझाए कि खनिज के ठेके देने से प्रदेश का औद्योगिक विकास नहीं होता। यह काम तो अख़बारों में निविदा जारी कर भी किया जा सकता था। उसके लिए इन्वेस्टर्स समिट करने की ज़रूरत नहीं होती है।

      यह सरकार खनिज माफिया के आगे बिल कदर बिछी जा रही है, यह खुद मुख्यमंत्री साबित करने छतरपुर का दौरा किया था। उस दौरान उन्होंने खनिज क्षेत्र से जुड़े लोगों को आश्वस्त किया था कि पन्ना टाइगर रिज़र्व के क़रीब पन्द्रह गांवों को बफर जोन या कोर एरिया से बाहर किया जाएगा, ताकि वहां खनन किया जा सके। मुख्यमंत्री के बाद उनकी धार्मपत्नी श्रीमती साधाना सिंह भी अचानक पन्ना टाइगर रिज़र्व क्षेत्र गई थीं। चर्चा है कि उनकी यह यात्रा कथित तौर पर खनिज माफिया को संरक्षण देने के उद्देश्य को लेकर थी। वन विभाग के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया  पन्ना टाइगर रिजर्व से लगी राजस्व भूमि  पर कुछ लोगों को खनिज की अनुमति दे दी गई है। इसी का लाभ लेकर संरक्षित वन क्षेत्र में भी अवैधा खनन शुरू कर दिया गया है। पन्ना टाइगर रिज़र्व के बफर ज़ोन में आने के कारण यहां खनन कार्य बंद होने की आशंका के चलते खनिज माफिया ने मुख्यमंत्री तक पहुंच बढ़ाई और बफर ज़ोन के गांवों में खनन का आश्वासन लिया। लेकिन जबलपुर हाईकोर्ट ने इस मंशा पर पानी फेर दिया है। हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि टाइगर रिजर्व के क्षेत्र, बफर ज़ोन और कोर एरिया से कोई छेड़छाड़ न की जाएं और किसी भी स्थिति में टाइगर रिजर्व में 25 प्रतिशत से अधिाक क्षेत्र पर्यटकों के लिए न खोला जाए।

      देश में मधयप्रदेश को 'बाघ प्रदेश' का गौरव हासिल था, किंतु बाघों के शिकार और उनकी संदिग्ध मौतों के चलते यह दर्जा छिन गया है। वन विभाग के आला अफ़सरान केन्द्र को झूठी रिपोर्ट देकर बाघों की काल्पनिक संख्या बताते रहे और अनुदान हड़पते रहे, किंतु अब सच्चाई सामने आ गई तथा अफसरान मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं, वन मंत्री सरताज सिंह ने बाघों की बढ़ती मौतों की सीबीआई जांच कराने की घोषणा की थी, किंतु इस पर अब तक अमल नहीं किया जा सका है। राज्य सरकार की ओर से केन्द्र को सीबीआई जांच का कोई प्रस्ताव नहीं भेजा गया है। यही वजह है कि वन माफिया और तस्कर अवैधा शिकार कर रहे-सहे बाघों को भी निशाना बना रहे हैं।

      दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि जिस सरकार पर वन और वन्य प्राणियों के संरक्षण का दायित्व है, वहीं वनों का विनाश करने और वन्य प्राणियों को खत्म करने में जुटी है। पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर संरक्षित वन क्षेत्र में होटल और रिसोर्ट बना दिए गए हैं। केंद्र सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम में संशोधान कर वन और वन्य प्राणियों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की थी तथा संरक्षित वनों में ईको सेंसेटिव्ह ज़ोन बनाने के निर्देश दिए थे,  किंतु राज्य सरकार ने इस दिशा में कोई क़दम नहीं उठाया। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी गया, जहां राज्य सरकार को निर्देश दिए गए कि वह ईको सेंसेटिव्ह ज़ोन शीघ्र बनाए।

      इसके बाद सरकार ने कागज़ी घोड़े दौड़ाना शुरू कर दिए। अब स्थिति यह है कि शासन के आठ विभागों में इस संबंधी फाइलें दौड़ रही हैं और चार साल बाद भी कोई ठोस पहल नहीं हो पाई है। ईको सेंसेटिव्ह ज़ोन न बनाने की यह वजह बताई जा रही है कि यदि ऐसा हो गया तो वन तथा खनिज़ माफिया की गतिविधियों पर अंकुश लग जाएगा। इसीलिए मामला लटकाया जा रहा है और माफिया अपनी मनमर्ज़ी कर रहे हैं।

      वन-खनिज माफिया पर राज्य सरकार की कथित मेहरबानी के चलते अब केंद्र सरकार को ही पहल करना होगी। इस दिशा में पहला क़दम यह हो सकता है कि केंद्र वन संरक्षण के लिए अनुदान देना बंद कर दे और अपने स्तर पर वन और वन्य प्राणियों की वास्तविक स्थिति का पता लगाए। इसमें स्वयंसेवी संगठनों की भी मदद ली जा सकती है। वन और वन्य प्राणियों के संरक्षण की दिशा में ये क़दम तुरंत उठाए जाने चाहिए।


? महेश बाग़ी