संस्करण: 06 दिसम्बर-2010  

हम पियें तो पुण्य, वो पियें तो पाप

राजनीति का यही है मंत्र-जाप

 ? राजेंद्र जोशी

           

          रस्पर आरोप-प्रत्यारोपों की चहुंओर काली घटाएं छाई हुई हैं। आरोपों की हवाओं के तीव्र झोंके अलग-अलग दिशाओं से उठ उठकर संपूर्ण परिवेश को झकझोर रहे हैं। असली-नकली सभी तरह के अपराधों के आरोपों की बौछारों से किसी को भी बचने नहीं दिया जा रहा है। विज्ञान के चमत्कारों का यह युग है, जिसके अंतर्गत नकली वर्षा भी अब संभव हो गई है। इसी तरह राजनीति में भी नकली और असली अपराधों के बादलों के गुबार उठाने में हमारे राजनैतिक विशेषज्ञ दुनिया में अपना अलग ही नाम कमाने की प्रतिस्पधर् में लग गये हैं।

      अब तो यह एक क्वालिफिकेशन मानी जाने लगी है कि यदि वह आरोपी है तभी वह उद्भट नेता कहलाने की पात्रता हासिल कर सकता है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि वह कहीं न कहीं किसी भी मामले में आरोपी है तो इसका मतलब ही यह हुआ कि वह कुशल, दक्ष और पारंगत नेता है। राजनीति में पक्ष और विपक्ष का लगता है, बस एक यही एजेंडा रह गया है कि वह एक दूसरे के चेहरे पर कितनी अधिक कालिख पोत सकता है और उसकी बची-खुची प्रतिष्ठा को किस तरह धूल में मिलाकर रख सकता है। इस तरह की पैतरेबाजी के प्रदर्शन के लिए राजनीति का क्षेत्र सर्वाधिक उपयुक्त और कारगर सिध्द होता जा रहा है। कोई भी सद्चरित्र और श्वेत वस्त्रधारी व्यक्ति इस राजनीति के मंच पर उतरता है वह आरोपों की बौछारों से बिना भींगे कैसे रह सकता है ?

      राजनीति के क्षेत्र में जब आरोप-प्रत्यारोपों के बवंडर उठते हैं तो इसका मतलब ही यह है कि कहीं न कहीं ऐसी एकाधा चिनगारी दबी हुई है जो किसी न किसी प्रभाव के आवरण में ढंकी हुई है और अदृश्य हैं। किंतु जब हवा देने के लिए कहीं न कहीं से फूंक लगाई जाने लगती है तो वह उतरकर ऊपर आ जाती है और वह बड़ी से बड़ी ज्वाला बनकर उजागर हो जाती है। राजनीति क्षेत्र की शुचिता पर अब प्रश्न इसलिए भी उठने लगे है कि वह दागदारों और अपराधिक दृष्टि से महाबलियों के चंगुल में फंसती जा रही है। मर्यादा, अनुशासन, नैतिकता और आदर्श के मार्ग का राही राजनीति की इस गड्डमगड्ड सड़क पर उलझ कर औंधो मुंह भी गिर पड़ सकता है। इस तरह की घटनाएं हो रही हैं। शायद यही वजह है कि जिन्हें अपनी सद्चरित्र की सफेद चादर पर गर्व होता है, वे राजनीति की गंदी और मैली-कुचैली चादर को ओढ़कर अपनी नींद हराम नहीं करना चाहते हैं।

      जब अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्ति राजनैतिक शुचिता का ढोंग रचकर अपने आचरणों का प्रदर्शन करने के लिए मुखौटा धारण करके मंच पर उतरने लगते हैं तो प्रजातंत्र की पावन-परिभाषा कलंकित होने से कैसे बच सकती है ? हाल ही में बिहार विधानसभा के निर्वाचन के परिणामों के बाद जो हकीकत समाचार पत्रों में पढ़ने में आई है वह निश्चित रूप से चौकाने वाली है। समाचार पत्रों में प्रकाशित आकलन के मुताबिक विधानसभा के ऐतिहासिक नतीजों का एक बेहद कड़वा पहलू यह भी है कि पिछले तमाम चुनावों के मुकाबले राज्य की 15वीं विधानसभा में सर्वाधिक बाहुबली, और धानकुबेर सदन में पहुंचे हैं। इन चुनावों में विजयी रहे 59 प्रतिशत विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित है। इन चुनावों में जीतकर आये 35 प्रतिशत उम्मीदवारों के खिलाफ हत्या, के प्रयास व हत्या जैसे मामले हैं। गंभीर मामलों में सर्वाधिक 43 विधायक जदयू के हैं जबकि अपने आपको राजनीति और संस्कृति का संरक्षक घोषित करने वाली भाजपा के 29 नवनिर्वाचित विधायकों पर गंभीर वारदातों के मामले हैं। यही नहीं इस बार चुनाव जीतने वाले कुल 42 विधायक करोड़पति हैं। जबकि पिछले विधानसभा में इनकी संख्या 8 थी।

      राजनीति ओर सत्ता पर जब इस तरह की प्रवृत्तियां हावी हो जाती हैं तो निश्चित ही पक्ष-विपक्ष को एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोपों के अवसर मिल जाते है और सारा का सारा परिवेश इसी तरह की मोर्चाबंदी में जुटा रहा है। ऐसे हालात में प्रशासनिक कार्यों के साथ ही कानून एवं व्यवस्था (लॉ एंड आर्डर) की स्थिति निरंकुश हो जाती है, विकास और जनकल्याण के कार्यों को जमीनी हकीकत नहीं मिल पाती है और कागजी उपलब्धियों के नाम पर भाषणों और नित-नई घोषणाओं के अंबार लगते हैं। बेचारी भोली भाली जनता मीठे लुभावने भाषण और प्रलोभनों में उलझकर रह जाती है। अपने आरोप-प्रत्यारोपों की राजनीति के खेल में इस तरह के चतुर-सुजान नेता अपनी ही पहलवानी पर आत्ममुग्धा होकर विज्ञापनों के लच्छेदार प्रदर्शनों में जबरन जनता के लाड़ले बनकर स्वयं को महान घोषित करने लगते हैं। ये जो भी 'पाप को वह पुण्य' और वो जो भी 'पुण्य को वह पाप' हो जाता है। इसका एक ही उदाहरण काफी है कि लोकसभा में यदि विपक्ष प्रजातंत्र की मर्यादा की धाज्जियां उड़ा रहा है तो वह पुण्य है, किंतु मधयप्रदेश विधानसभा में यदि विपक्ष अपनी भूमिका का निर्वहन करता है तो वह पाप हो जाता है। इस तरह के दोहरे मापदंड की राजनीति निश्चित ही प्रजातंत्र को शर्मसार करती हैं। परंतु अभी तो इसका कोई उपचार नहीं दिखता क्योंकि राजनीति यही मंत्र का जाप कर रही है कि ''हम पिये तो पुण्य, वो पिये तो पाप''।


? राजेंद्र जोशी