संस्करण: 06 दिसम्बर-2010   

क्या कूटनीतिज्ञों का गुप्तचर और पत्रकारों का बिचौलिया बनना उचित है?

? एल.एस.हरदेनिया

  

           स समय हमारे देश में और विश्व की अनेक राजधानियों में इस प्रश्न पर बहस जारी है कि क्या कोई व्यक्ति, अपने व्यवसाय का दुरूपयोग किसी अन्य व्यक्ति को लाभ पहुचाने या उसका हितसाधान करने के लिए कर सकता है? इस बहस का संबंध पत्रकारिता और कूटनीति के क्षेत्रों से है। जहां पत्रकारिता संबंधी बहस हमारे देश तक सीमित है वहीं कूटनीति संबंधी बहस का संबंध पूरे विश्व से है।

           अभी हाल में आसनजे नाम के एक व्यक्ति ने अमरीका द्वारा समय-समय पर जारी किये गये गुप्त कूटनीतिक संदेशों को सार्वजनिक किया है। इन संदेशों में अनेक राष्ट्रप्रमुखों के बारे में अत्यन्त अपमानजनक बातें कहीं गई हैं। जैसे, रूस के प्रधानमंत्री पुतिन को अल्फा कुत्ता कहा गया है। इन्हीं संदेशों में सऊदी अरब के शाह द्वारा अमरीका से किया गया यह अनुरोध भी शामिल है कि अमरीका ईरान रूपी सांप का फन कुचल दे (ईरान को नष्ट कर दो)। इन लीक किये गये संदेशों से यह स्पष्ट है कि अमरीका ने अपने कूटनीतिज्ञों को आदेश दे रखा है कि जिन देशों में उनकी पदस्थापना है, उनके राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और अन्य नेताओं पर नजर रखें। उनकी समस्त गतिविधियों का रिकार्ड रखें, उनके क्रेडिट कार्ड का नंबर पता लगाएं, उनकी यात्राओं का लेखाजोखा रखें, उनके ई-मेल पते, सेलफोन नंबर और यहां तक कि उनके डी.एन.ए. का भी पता रखें। अमरीकी  सरकार द्वारा प्रसारित गुप्त आदेशों का पता लगने के बाद दुनिया के अनेक देशों में तहलका मचा। सभी ने अमरीका द्वारा कूटनीतिज्ञों से गुप्त सूचनायें एकत्रित कराने की प्रक्रिया की निंदा की। उसके बाद अमरीकी विदेश सचिव ने दोहराया कि उनका रवैया वही रहेगा जो पहले था। वे अपने कूटनीतिज्ञों से गुप्त सूचनाओं को एकत्रित करवातीं रहेंगी। उनका कहना है कि यह हमारी कूटनीति का हिस्सा है।

           लीक किये गये संदेशों के अनुसार, दूसरे देशों के नेताओं के बारे में जो जानकारी एकत्रित की गयी, उनके कुछ उदाहरण यहां दिये जा रहे हैं। जैसे, इटली के प्रधानमंत्री सिलवियो के बारे में कहा गया कि वे एक कमजोर नेता हैं। उनकी देर रात्रि की हरकतों का विवरण भी दिया गया। अफगानिस्तान के एक नेता के बारे में बताया गया है कि जब वे यू.ए.ई. की यात्रा पर आये थे तब उनके पास पांच करोड़ डालर से ज्यादा रकम थी। यू.ए.ई. के अमरीकी दूतावास ने यह भारी रकम उन्हीं के पास रहने दी और उनसे यह जानकारी भी नहीं ली कि यह रकम उनके पास कहां से आई। लीबिया के तानाशाह गद्दाफी के बारे में यह सूचना दी गई कि वे अपनी यात्राओं में यूक्रेन की एक सुंदरी को अपने साथ रखते हैं क्योंकि उसे ही उनकी दिनचर्या का पूरा ज्ञान रहता है। इसी तरह की अपमानजनक बातें यमन के राष्ट्रपति व जर्मनी के चांसलर के बारे में भी कहीं गई हैं। जो सनसनीखेज बातें अन्य देशों के बारे में कही गई हैं उनसे अमरीका के इन राष्ट्रो से संबंधा तनावपूर्ण हो जायेगें। परंतु अमरीका को इस बात की तनिक भी चिंता नहीं है। लीक किये गये इन संदेशों में से एक में हिलेरी क्लिन्टन को यह कहते हुए बताया गया है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत के दावे में कोई दम नहीं है। अमरीका ने इन संदेशों को लीक करने वालों और उन्हें प्रकाशित एवं प्रसारित करने वाले समाचारपत्रों और चैनलों के विरूध्द कानूनी कार्यवाही करने की धामकी दी है। पंरतु इस धामकी का आसनजे पर कोई असर नहीं पड़ा है और उन्होंने घोषणा की है कि वे शीघ्र ही दुनिया के कुछ बैंकों की गैरकानूनी गतिविधियों से संबंधित दस्तावेजों को जारी करेंगे। इन संदेशों के लीक होने के बाद यह बहस शुरू हो गयी है कि क्या कूटनीतिज्ञों को गुप्तचर का काम करना चाहिए?

           हमारे देश में इसी तरह की बहस पत्रकारों के बारे में जारी है। अभी हाल में अंग्रेजी साप्ताहिक आऊटलुक और एक और पत्रिका ने नीरा राड़िया और देश के कुछ नामी-गिरामी पत्रकारों के बीच हुई बातचीत के टेप छापे हैं। नीरा राड़िया देश के कुछ प्रसिध्द औद्योगिक घरानों के लिए जनसंपर्क का काम करती हैं। जिन औद्योगिक घरानों के लिए वे काम करती हैं उनमें टाटा और मुकेश अंबानी भी शामिल हैं। पत्रकारों से हुई बातचीत से यह साफ  है कि ये पत्रकार डी.एम.के. नेता ए.राजा को केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल करवाने और उन्हें दूरसंचार विभाग का मंत्री बनवाने में मदद करने के लिए तैयार थे। जिन पत्रकारों से बातचीत की गई उनमें थे एन.डी.टीवी अंग्रेजी चैनल की गुरप एडीटर बरखा दत्त, हिन्दुस्तान टाईम्स के संपादकीय सलाहकार वीर संघवी, इकानामिक टाइम्स के सीनियर एडीटर एम.के. वेनू, इंड़िया टुडे के प्रबंध संपादक शंकर अय्यर, इकानामिक टाईम्स के वरिष्ठ सहसंपादक गणपती सुब्रमणयम और  इंडिया टुडे के भाषायी संस्करणों के संपादक प्रभु चावला।

           टेप की गई बातचीत के अनुसार, वीर संघवी, नीरा राड़िया को आश्वासन देते है कि वे कांग्रेस से बात करेंगे। वे इस बारे में अहमद पटेल से भी बात कर सकते हैं। वे नीरा राड़िया से अपने कालम ''काउंटर प्वाइंट'' में उठाए जाने वाले मुद्दों के बारे में भी सलाह लेते हैं। अभी हाल में वीर संघवी ने यह घोषणा कर दी है कि वे कुछ दिनों तक हिन्दुस्तान टाईम्स में अपना कालम नहीं लिखेंगे। बरखा दत्त, राडिया से जानना चाहती हैं कि वे कांग्रेस नेताओं से क्या बात करें। इसी तरह, राडिया, वेनू से सलाह लेती हैं कि उनके पास जो मसाला है, वह प्रचार के लिए वे किसे दें। पत्रकारों के अलावा रतन टाटा, ए.राजा, करूणानिधि की पुत्री सांसद कनीमोजझी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दामाद रंजन भट्टाचार्य से राडिया के वार्तालाप के विवरण भी जारी किये गये है।

           इन टेपों के प्रकाशन से यह प्रश्न उठता है कि क्या पत्रकारों को बिचौलियों की भूमिका निभानी चाहिए या उन्हें अपने प्रोफेशन तक सीमित रहना चाहिए। वैसे भी, वर्षों से यह बात कही जा रही है कि बड़े-बड़े अखबारों के विशेष संवाददाता अपने मालिकों के हित संरक्षण का काम करते हैं। यह भी स्पष्ट है कि पत्रकारों का काम एक प्रकार की दुधारी तलवार है। पत्रकार का मुख्य काम समाचार खोजना है। कभी-कभी इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसी राजनीतिज्ञ या अधिकारी का हितैषी होने का दिखावा भी करना पड़ता है। पर मुख्य बात यह है कि पत्रकार को किसी राजनीतिज्ञ के हित  साधाने के लिए रिश्वत या अन्य कोई लाभ नहीं लेना चाहिए। यदि उक्त पत्रकारों ने ऐसा किया है तो उन्होंने अपने  व्यवसाय से गद्दारी की है और यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उनका चरित्रहनन उचित नहीं होगा। लगभग इसी प्रकार का मत बी.जी. वर्गीज ने प्रगट किया हैं। वर्गीज, हिन्दुस्तान टाईम्स और इंड़ियन एक्सप्रेस के संपादक रह चुके हैं।

 

? एल.एस.हरदेनिया