संस्करण: 06 दिसम्बर-2010

बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम

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 ? वीरेंद्र जैन

                       

      लोकतंत्र में जब सत्ता की राजनीति हावी होने लगती है तब केवल चुनाव परिणाम ही देखे जाते हैं। गत बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों पर प्रतिक्रिया देते समय पूरे मीडिया ने नितीश कुमार और विकास की जीत बतायी वहीं भाजपा के नेता अपनी प्रतिक्रिया देते समय इसे एनडीए की जीत बता रहे थे। सवाल है कि क्या यह एनडीए की जीत है या नीतिश कुमार की जीत है?  सच तो यह है कि तमाम बेशर्मी के साथ किसी तरह पीछे लटक कर भाजपा ने हमेशा की तरह भरपूर लाभ उठा लिया है, पर क्या वो अकेले लड़ कर उस जनता का समर्थन पा सकती थी जिसने रथयात्रा के दौरान अपने प्रदेश में लाल कृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार किये जाने पर तत्कालीन राज्य सरकार का खुलकर साथ दिया था और बाद में होने वाले चुनावों में अडवाणी को गिरफ्तार करने वालों को भरपूर समर्थन देकर विधानसभा और लोकसभा में भेजा था। यह जीत भाजपा के वैकल्पिक प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी और मुसलमानों के हाथ काटने की घोषणा करने वाले वरुणगान्धी को बिहार में चुनाव प्रचार न करने देकर एक सन्देश देने वालों की जीत है। नितीश कुमार ने तो चुनाव के पहले साफ घोषणा कर दी थी कि अगर गठबन्धान चलाना है तो वह हमारी शर्तों पर चलेगा। सत्ता के लिए किसी भी हद तक गिर जाने के लिए अभंजित रिकार्ड रखने वाली भाजपा ने उनके आदेश को सिर माथे लगा कर स्वीकार कर लिया था। नितीश के ये तेवर तो तब थे जब उनको अकेले दम पर सरकार बनाने के लिए कम से कम बत्तीस सीटें और चाहिए थीं और वे भाजपा के समर्थन पर बुरी तरह निर्भर थे।

      ताजा चुनाव परिणामों के अनुसार  नितीश को अपनी सरकार बनाने के लिए कुल आठ विधायकों का समर्थन चाहिए जो प्रदेश को भाजपा से मुक्त करने के लिए कोई भी कभी भी दे सकता है। दूसरी ओर भाजपा को अपनी सरकार बनाने के लिए कम से कम तेतीस सीटें चाहिए और उन्हें कोई भी समर्थन नहीं दे सकता। भाजपा को किसी गैर भाजपा दल ने तभी समर्थन दिया है जब वे इतनी कम सीटें जीत पाये कि भाजपा की सरकार बनवाना उनकी मजबूरी रही। किंतु जैसे ही परिस्थितिया बदलीं वैसे ही ऐसे समर्थकों ने अपना समर्थन वापिस लेने में देर नहीं की। मायावती ने तो भाजपा से कम सीटें होते हुए भी छह छह महीने सरकार चलाने के हास्यास्पद समझौते में पहले सरकार बनाने की शर्त मनवायी थी और बाद में उन्हें समर्थन देने से इंकार कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें व्यापक दलबदल का सहारा लेना पड़ा था और सारे दलबदलुओं को मंत्री बनाने का सौदा भी उन्हीं के खाते में दर्ज है। रोचक यह है कि एक एक विभाग के दो दो तीन मंत्रियों में से दर्जनों का यह कहना रहा कि उन्हें कभी किसी फाइल पर दस्तखत करने का अवसर नहीं आया।

      भाजपा के नेता बार बार जिस एनडीए की जीत की दुहाई दे रहे हैं उसका गठबन्धान के रूप में अस्तित्व कहाँ है! एनडीए की अपने किसी साझा कार्यक्रम के रूप में कोई पहचान नहीं है। भाजपा इसका सबसे बड़ा और इकलौता राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल है इसलिए इसकी भूमिका भी बड़े भाई की है। पर जिस जिस राज्य में भी उनको पूर्ण बहुमत प्राप्त है वहाँ वहाँ वे एनडीए के दूसरे किसी घटक को घास नहीं डालते। गुजरात, मधयप्रदेश, छत्तीसगढ, हिमाचल प्रदेश में भूले से भी उनके मुँह से एनडीए का नाम नहीं निकलता। बिहार, पंजाब, उड़ीसा में वे जूनियर पार्टनर और विवशता में बनाये घटक की तरह रहे। उड़ीसा में ईसाइओं के खिलाफ उनकी साम्प्रदायिक हिंसा के कारण बीजू जनतादल को उन्हें हटाना ही पड़ा। उत्ताराखण्ड, कर्नाटक, और झारखण्ड में सरकार बनाने की जोड़तोड़ में उन्हें एनडीए याद नहीं आया। केन्द्र में सत्ता होने के दौर में, तृणमूल कांग्रेस, तेलगुदेशम, एआईडीएमके, इंडियन नैशनल लोकदल, नैशनल कांफ्रेंस, आदि को उचित समय पर उनका साथ छोड़ देने में ही अपनी भलाई नजर आयी। ऐसी दशा में जब नितीश के आकर्षक शासन को पूरा श्रेय मिल रहा हो और उनकी निर्भरता भाजपा पर बहुत कम रह गयी हो तब सरकार में भी उनका महत्व कम ही होना तय है।

      इस चुनाव में गत विधानसभा चुनावों की तुलना में जेडीख्यू, बीजेपी गठबन्धान को कुल तीन प्रतिशत वोट अधिक मिले हैं किंतु विभाजित विपक्ष के कारण उसे 39: सीटों का लाभ हुआ है जो शासन की लोकप्रियता का प्रमाण तो नहीं कहा जा सकता। ताजा चुनाव परिणाम की पिछले विधानसभा चुनाव परिणामों से तुलना करने पर यह भी स्मरण में रखना होगा कि पिछले चुनाव आरजेडी और कांग्रेस आदि ने मिलकर लड़े थे जबकि उक्त चुनावों में ये अलग अलग लड़ रहे थे। भाजपा, जेडीयू को मिले कुल मतों की संख्या उनके विरोधा में पड़े कुल मतों की संख्या से कम है। पिछले चुनावों की तुलना में छह चरणों में हुये ये चुनाव अधिक स्वच्छ, सुरक्षित, व  हिंसामुक्त हुये हैं और कुल मतदान प्रतिशत में वृध्दि लिये हुए हैं। जातिवाद ने दलों की जगह उम्मीदवारों के स्तर पर काम किया है। लालू प्रसाद को सभी यादवों ने वोट नहीं दिया हो किंतु जिस क्षेत्र से जिस जाति का उम्मीदवार था उसे अपनी पार्टी के लिए उस जाति के वोट बटोरने में सहूलियत रही। 

      उम्मीदवारों द्वारा दाखिल किये गये शपथपत्रों के अनुसार चुने गये 243 विधायकों में से 141 के विरुध्द आपराधिक मामले दर्ज हैं।  इन 141 में से 117 के खिलाफ गम्भीर आपराधिक मामले हैं। इनमें से भी 85 के खिलाफ हत्या या हत्या के प्रयास का मामला दर्ज है। जबकि पिछले चुनावों में ये आंकड़े क्रमश: 117 और 68 का था। 2005 में कुल आठ विधायक करोड़पति थे जबकि अब ये आंकड़ा 47 तक पहुँच गया है।

 

 ? वीरेंद्र जैन