संस्करण: 06 दिसम्बर-2010

हममें से 'देशद्रोही' कौन नहीं है ?

? सुभाष गाताड़े

                          

भगतसिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की

देशभक्ति के लिए आज भी सज़ा मिलेगी फांसी की

-- शैलेन्द्र

(इप्टा से जुडे प्रख्यात गीतकार जिन्होंने आजादी के चन्द साल बाद ही यह नज्म लिखी थी)

      स्पेक्ट्रम घोटाले के मद्देनज़र प्रिन्ट एवं इलैक्ट्रानिकी मीडिया के सेलेब्रिटी कहे जा सकनेवाले पत्राकारों के कॉर्पोरेट सम्राटों के दलालों में होते रूपान्तरण की चर्चाओं के बीच राजधानी से निकलनेवाले एक दूसरे साप्ताहिक 'तहलका' की एक युवा पत्रकार के के शाहीना पर मंडराते गिरफ्तारी के बादलों के बारे में कहीं चर्चा नहीं हो रही है', जिस पर पिछले दिनों कर्नाटक पुलिस ने 'गवाहों को आतंकित करने का' केस दर्ज किया है।

      दरअसल बंगलौर के बम धामाके के अभियुक्त के तौर पर केरल के चर्चित नेता अब्दुल मदनी की कुछ माह पहले कर्नाटक सरकार द्वारा की गयी गिरतारी को लेकर सुश्री शाहीना ने स्टोरी की थी (तहलका 4 दिसम्बर 2010)। मामले में गवाह बताए जा रहे लोगों से उसने इसके लिए बात की थी। इसी स्टोरी को लेकर शाहीना पर पुलिस की वक्र निगाह गयी है। स्पष्ट है कि मामला विशेष को लेकर कर्नाटक पुलिस के आधिकारिक संस्करण पर चूंकि सुश्री शाहीना की स्टोरी  सवाल खड़े करती है, यही बात उन्हें नागवार गुजरी है।

      मीडियाकर्मियों को ही निशाने पर लेने का यह प्रयास निश्चितही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का ही हनन करता दिखता है और एक तरह से सत्ताधारियों की इसी मंशा को उजागर करता है कि पत्रकार अगर पुलिस या प्रशासन के स्टेनोग्राफर नहीं बनते हैं तो उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

      युवा पत्रकार शाहीना की जा रही यह घेरेबन्दी हमारे वक्त की दो अज़ीम शख्सियतों को इन दिनों व्यवस्था के हाथों झेलनी पड़ रही प्रताडना के मसले की बरबस याद दिलाती है। इनमें एक हैं प्रख्यात वकील एवम मानवाधिकार कार्यकर्ता जनाब प्रशान्त भूषण, जिन्होंने लगातार जनता के सवालों, जनान्दोलनों को कानूनी सहायता प्रदान की है और कई बार उन्हें न्याय दिलाने में भूमिका अदा की है।

      जनाब प्रशान्त भूषण की परेशानी तब शुरू हुई जब उन्होंने मीडिया को दिए गए साक्षात्कार में सर्वोच्च न्यायालय के विगत सोलह प्रमुख न्यायाधीशों में से आधो को भ्रष्ट आचरणों में लिप्त बताया। इसी मसले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का केस दर्ज किया, जिसके प्रमाणित होने पर उन्हें जेल भी भेजा सकता है। अदालत के सामने हाजिर होकर प्रशान्त भूषण ने एक शपथपत्र के साथ अदालत के सामने अपने वक्तव्य के प्रमाण प्रस्तुत किए, जिसमें उन्होंने इन न्यायाधीशों के आचरण को लेकर ठोस प्रमाण भी रखे।

      और दूसरी हैं सुश्री तीस्ता सीतलवाड। सीतलवाड के खिलाफ मामला उनके पूर्वसहयोगी किन्हीं रईस खान के इशारे पर उठाया गया है, जिसने यह हलफनामा दिया है कि गुजरात के दंगापीड़ितों को वह सीखा कर भेजती थीं। गुजरात 2002 के जनसंहार और उसमें संघ परिवारी संगठनों की सक्रिय भूमिका, जिन्हें सूबे की हुकूमती मशीनरी की तरफ से मिली शह के बारे में तमाम प्रमाण प्रस्तुत है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी गुजरात में जो कुछ हुआ उसे रोम के सम्राट नीरो के उपक्रम की तुलना की है, जिसके बारेमें कहा जाता है कि जब रोम जल रहा था तब नीरो बांसुरी बजा रहा था। यह तीस्ता जैसों की  कोशिशों का ही नतीजा रहा है कि आजाद हिन्दोस्तां के इतिहास में किसी मुख्यमंत्री को दंगे के चुनिन्दा मामलों की जांच के लिए बनी स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के सामने हाजिर होना पड़ा और अपनी सफाई देनी पड़ी।

      मगर शायद इन दिनों की सबसे बड़ी ख़बर कही जाएगी मोहतरमा अरून्धाती रॉय के खिलाफ दर्ज देशद्रोह का मुकदमा, जो कश्मीर के मसले पर केन्द्रित एक सेमिनार में दिए गए अपने भाषण की वजह से उनके खिलाफ दर्ज किया गया है। सुश्री अरून्धाती रॉय अपने पहले ही उपन्यास 'गॉड आफ स्माल थिंग्जस' के जरिए राष्ट्रीय स्तर की नहीं बल्कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर की शोहरत पा चुकी हैं, जिन्हें प्रतिष्ठित बुकर सम्मान से भी नवाजा जा चुका है।

      मगर राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी शोहरत महज एक साहित्यकार के तौर पर नहीं है, वह अपनी बेबाक कलम के लिए -जो तमाम शोषितों-वंचितों के तमाम सवालों को लेकर उठती रही है - के लिए अधिक जानी जाती है। नर्मदा आन्दोलन के विस्थापितों का सवाल रहा हो, ऑपरेशन ग्रीन हंट को लेकर आदिवासी बहुल इलाकों में सेना, अर्ध्दसैनिक बलों के दमन का प्रश्न रहा हो, साम्प्रदायिकता की भीषण चुनौती हो, उत्तार पूर्व की जनता को झेलने पड़ते तमाम दमनात्मक कानूनों का मसला रहा हो, सुश्री रॉय ने ऐसे सवालों को मुख्यधारा की बहस में लाने से कभी गुरेज नहीं किया है। उनकी कलम की यह खासियत है कि आप उनसे सहमत हों या न हों, वह आप को सोचने के लिए अवश्य मजबूर कर देती है। पिछले साल छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित इलाकों की यात्रा के बाद अंग्रेजी साप्ताहिक 'आउटलुक' में प्रकाशित उनका लगभग पैंतीस पेज का आलेख काफी चर्चित रहा है।

      दिल्ली के सेमिनार में उन्होंने कश्मीर में मानवाधिकारों के भारी दमन की वर्तमान स्थिति को लेकर अपने विचार प्रगट किए थे, जिसमें उनका यहभी कहना था कि कश्मीर हमेशा ही विवादास्पद रहा है। उनके वक्तव्य को निशाना बना कर दक्षिणपंथी समूहों ने पहले काफी शोरगुल किया मगर केन्द्र सरकार ने सन्तुलित रवैया अख्तियार किया और उनके खिलाफ केस दर्ज करने से इन्कार किया। अब कोई एक व्यक्ति ने दिल्ली की अदालत में गया और मैजिस्टेरट ने उनके खिलाफ अरून्धाती एवम बैठक में शामिल अन्य लोगों के खिलाफ देशद्रोह की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया। जिन धाराओं के तहत उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है वह गैरजमानती हैं और अगर सही साबित होते हैं तो इन धाराओं के तहत उम्रकैद तक की सज़ा हो सकती है।

      अब जहां तक देशद्रोह कानून की बात है तो वर्तमान समय में देखें तो दो कारणों से यह कानून विवादों के घेरे में आया है। एक तो उससे औपनिवेशिक शासकों के कदमों की बू आती है तथा दूसरे उसकी बुनियादी अन्तर्वस्तु आधुनिक जनतंत्रा के अन्तर्निहित सिध्दान्तों से विपरीत बैठती है। यह अकारण नहीं कि अधिकतर परिपक्व जनतंत्रों में देशद्रोह के कानून को या तो औपचारिक तौर पर खतम किया गया है या अब वह महज कानून की किताब में महज विराजमान है। युगांडा जैसे अफ्रीकी देश में पिछले दिनों उच्च अदालत के फैसले के बाद देशद्रोह अब कोई आपराधिक मामला नहीं रहा, मालावी जैसे अन्य अफ्रीकी देश में भी इस प्रावधान को चुनौती मिली है। आस्ट्रेलिया में भी इसके खातमे के आसार हैं, वहां आखरी दफा 1960 में एक व्यक्ति के खिलाफ इस धाराओं के तहत केस दर्ज हुआ था। 'मुक्त अभिव्यक्ति के लिए जारी वैश्विक मुहिम' की अपील का यह कहना बिल्कुल दुरूस्त है कि ' तमाम अदालतों के फैसले और कानून सुधार आयोग की संस्तुतियां इसी बात को रेखांकित करती हैं कि देशद्रोह के कानून से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता। वह पूरी तरह गैरजनतांत्रिक है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक असंवैधानिक आक्रमण है।'

      इस सन्दर्भ में बुनियादी प्रश्न यह उठता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रा कहे जानेवाले मुल्क के कानून की किताबों में ऐसे कठोर प्रावधानों की जरूरत क्यों है जो सरकार को किसी भी व्यक्ति के गिरफ्तारी का मौका प्रदान करती है।

      सोचने का सवाल बनता है कि दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्रा कहे जाने वाले इस मुल्क के आंका आखिर कब तक इस मधययुगीन कानून को अपने विधान में शामिल रखेंगे ? और अगर वह इस मसले पर टस से मस नहीं होते हैं तो क्या संवेदनाशून्य हो चुका नागर समाज अपनी तरफ से इस मसले पर क्या कोई पहल करेगा ?

      अरून्धाती रॉय और अन्यों के खिलाफ दर्ज देशद्रोह के मुकदमे को खारिज करने की मांग करते हुए हम खुद महात्मा गांधी के इस सन्दर्भ में दिए गए कथन पर भी गौर कर सकते हैं। वर्ष 1922 में मोहनदास करमचन्द गांधी और शंकरलाल गेलाभाई बैंकर के खिलाफ -'यंग इण्डिया' के सम्पादक और मुद्रक/प्रकाशक होने के नाते अहमदाबाद की जिला एवम सत्र न्यायाधीश के सामने देशद्रोह की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। इस मामले में अपने अपराधा को स्वीकारते हुए गांधी ने कहा :

      इस अदालत से मैं इस हकीकत को छिपाना नहीं चाहता कि वर्तमान शासनप्रणाली के खिलाफ असहमति प्रगट करना मुझ जैसे लोगों का जूनून बन चुका है। कानून की निगाह में देशद्रोह भले ही सचेतन अपराधा हो मगर मुझे लगता है कि वह नागरिक का सबसे बड़ा कर्तव्य है।

 

("I have no desire whatsoever to conceal from this court the fact that to preach disaffection towards the existing system of Government has become almost a passion with me…" Sedition, said Gandhi, "in law is a deliberate crime", but it "appears to me to be the highest duty of a citizen.")

 

      हमारे मुल्क की विडम्बना ही कही जाएगी कि कुछ लाख करोड़ का घोटाला करने में मुब्तिला लोग खुलेआम घुमते हैं, जनसंहारों को अंजाम देनेवाले सत्ता की कुर्सियों पर विराजमान हो जाते हैं, मगर जनता की बात करनेवालों को सलाखें ही मयस्सर होती हैं।

 

? सुभाष गाताड़े