संस्करण: 06अक्टूबर-2008

राजनीति में उलझा कुपोषण

 

 

अमिताभ पाण्डेय

 

न दिनों जबकि मध्यप्रदेश में भी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ी हुई है, सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता जनता को लुभाने के लिए नई-नई रणनीति बनाने में जुटे हैं तो 150 से ज्यादा बच्चों की मौत विभिन्न जिलों में हो जाने से माहौल गरमा गया है। सरकार, समाज, राजनीति के गलियारों में लगभग एक दर्जन जिलों के ग्रामीण अंचलों में मरने वाले बच्चों की मौत के कारण खोजे जा रहे हैं। भुखमरी, बीमारी और समय पर उपचार न मिलने के कारण बेवक्त मारे गये इन बच्चों की मौत कुपोषण से हुई या नहीं यह एक बड़ा सवाल बन गया है। सरकार एवं प्रशासन से जुड़े लोग सीधे बच्चों की मौत के लिए कुपोषण को जिम्मेदार नहीं मानते।

कुपोषण को लेकर सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है। इसी बीच यह पड़ताल गहराई से की जाना भी जरूरी है कि महिलाओं एवं बच्चों के विकास को ध्यान में रखकर केन्द्र एवं राज्य शासन की आर्थिक सहायता से मध्यप्रदेश के गांव-गांव में जो योजनाएं संचालित की जा रही है। उन योजनाओं की सफलता के जो आंकड़े प्रशासन से जुड़े अधिकारी पेश करते है यदि वे सही है तो अब तक मध्यप्रदेश के सभी बच्चों को कुपोषण मुक्त हो जाना चाहिये था। ऐसा मानने की वजह यह है कि मध्यप्रदेश में सिर्फ महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर एकीकृत बाल विकास परियोजना, जननी सुरक्षा योजना, बाल संजीवनी अभियान, आंगनवाड़ी, प्रोजेक्ट मुस्कान, शक्तिमान, संभावित बाल विकास सेवा सहित कुछ अन्य कार्यक्रम शासकीय स्तर पर संचालित किये जा रहे हैं। बड़े बजट के इन कार्यक्रमों को गांव-गांव गरीब तक पहुंचाने के लिए पूरा सरकारी अमला जुटा है। राज्य शासन के अधिकारिक आंकड़ों पर रोसा करें तो केवल आई सी डी एस (समान्वित बाल विकास सेवा) के माध्यम से ही 43 लाख बच्चे और 10 लाख महिलाएं लाभान्वित हुई है। इसी से मिले जुले सफलता के आकड़ें बड़े बजट की आकी योजनओं के भी हैं।

अधिकारिक ऑंकड़ों की माने तो राज्य में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर कम हुई है, कुपोषण का प्रतिशत कम हुआ है, महिलाओं और बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं एवं पोष्टिक भोजन देने के सभी इंतजाम किये गये है। राज्य सरकार के प्रवक्ता बताते हैं कि कांग्रेस शासन काल में वर्ष 2001 में कुपोषण का प्रतिशत 57.56 था जो कि भाजपा द्वारा मध्यप्रदेश में किये गये सुशासन के कारण वर्ष 2008 में घटकर 47.36 प्रतिशत रह गया है। वर्ष 2008 में 987 करोड़ के बजट से कुपोषण पर नियंत्रण पा लिया गया है फिर भी सुधार की गुंजाईश है। राज्य सरकार के प्रवक्ता जब कुपोषण का प्रतिशत कम होने का दावा करते हैं तो वह ठीक लगता है परंतु जब झाबुआ जिला मुख्यालय के वार्ड क्रमांक दो एवं तीन की आंगनवाड़ी का अचानक निरीक्षण करते हैं तो पंजीरी में चल रही इल्लियां जाहिर कर देती है कि इस जिले में 50 से ज्यादा बच्चें क्यों मर गये है? खरगोन जिले के करही गांव की आंगनवाड़ी हो या बन्हेर गांव की आगंनवाड़ी, हर तरफ पोष्टिक भोजन में इल्ली, ककंड, कोयले का चूरा मिला होने के प्रमाण मिल जाते हैं। बुरहानपुर, खण्डवा, धार सहित कुछ अन्य जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों का हाल यह है कि आगंनवाड़ियों में जहां प्रतिदिन 80 बच्चों को पोष्टिक आहार देना बताया जा रहा है वहां मौके पर 10 बच्चे भी दिखाई नहीं देते। नेपानगर की बात हो या मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की, बच्चों के लिए पोषण पुर्नवास केन्द्र या तो शुरू नहीं हो पाये अथवा कुछ दिन चलकर बंद हो गये। भोपाल के हमीदिया अस्पताल में पोषण पुर्नवास केन्द्र ही जब बंद हो गया हो तो प्रदेश के दूसरे हिस्सों में क्या हाल होगा, यह कल्पना महिला बाल विकास विभा, स्वास्थ विभाग के मंत्री, अधिकारी करे या न करें लेकिन आम आदमी आसानी से कर सकता है। सरकारी दावों की हकीकत यह है कि एक वर्ष पहले कुपोषित बच्चों के लिए होशंगाबाद जिले में प्रारंकिया गया प्रोजेक्ट शक्तिमान, भ्रष्टाचार, लापरवाही का शिकार हो गया है। जिले के केसला विकासखण्ड अन्तर्गत आदिवासी ग्राम बोरखेडा, बाराम हुआ में आगनवाड़ी के ठीक सामने रहने वाले विनोद की डेढ़ वर्षीय बेटी मुस्कान गंभीर कुपोषित है। इसी विकासखण्ड के गांव लालपानी में जीरुलाल की बेटी संजीत, खुशीलाल का बेटा आलोक भी कुपोषण की चपेट में है। भुखमरी और बीमारी का असर बच्चों के चेहरे पर देखा जा सकता है। ऐसे में प्रोजेक्ट शक्तिमान के लिए मिली राशि का कहां और कैसा उपयोग हुआ? इस सवाल का जवाब कौन देगा?

उधर शिवपुरी जैसे जिलों के लिए कुपोषण कोई नहीं बात नहीं है। वहां के गांवों में रहनेवाले सहरिया जाति के लोग कुपोषण, भूख, गरीबी, बेरोजगारी को ही अपनी नियति स्वीकार कर चुके हैं। पहले इन जिलों में Hkूखमरी, कुपोषण से बच्चों की मौत पर हल्ला मच जाया करता था लेकिन अब नहीं होता। शिवपुरी, श्योपुर जिलों में कुपोषण को अधिकारी भी मानते है इसीलिए हर साल इन जिलों के लिए सरकारी, गैर सरकारी स्तर पर योजनाएं बनाई जाती है। ये योजनाएं कुपोषण े ही दूर न कर सकें लेकिन कुछ प्रभावशाली लोगों के हितों का पोषण तो जरुर कर रही हैं। मुख्यमंत्री हो, मंत्री हों अथवा विधायक, सासंद किसी का भी प्रभावक्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जहां कुपोषण के शिकार बच्चे नहीं ढूढ़े जा सके। प्रदेश के गांव-गांव में पैर पसार चुके कुपोषण को नेता एवं अधिकारी सिरे से खारिज कर देना चाहते है लेकिन मैदानी इलाकों से मीडिया में जो खबरें मिल रही है वे कुपोषण का सच उजागर कर देती है। प्रसगंवश उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों के 60 फिसदी से अधिक बच्चे कुपोषित हैं। राज्य में एक लाख बच्चों का कुपोषण श्रेणी 3 और 4 तक जा पहुंचा है। विपक्षी दलों के नेताओं के मुताबिक पिछले 40 माह में कुपोषण से 97 हजार से अधिक बच्चे मारे जा चुके है फिर भी सफलता के आकड़ों की चमकदार तस्वीर क्यों दिखाई जा रही है, यह समझ से परे है। अधिकारी यह बताते है कि राज्य के 313 ग्रामीण क्षेत्रों 54 नगरीय क्षेत्रों में बाल विकास की विभिन्न परियोजनाओं का बेहतर संचालन हो रहा है। राज्य में 69 हजार 238 आंगनवाड़ियों में 58 हजार, 24 हजार से ज्यादा बच्चों को 2 रुपये प्रति बच्चे के हिसाब से पोषण आहार दिया जा रहा है। महिला बाल विकास मंत्री कुसम मेहदेले कहती है कि उनके विभाग ने बच्चों को कुपोषण और अकाल मौतों से बचाने के लिए अनेक योजनाएं चलाई है जिनके पूरी तरह लागू होने के बाद कोई बच्चा कुपोषण से नहीं मर सकता। ऐसा ही बयान स्वास्थ्य मंत्री डॉ. गौरीशंकर रोजगार का भी है जो कहते है कि कुपोषण से प्रभावित इलाकों में बच्चों के लिए विभाग ने पर्याप्त इंतजाम किये है। मेरा सवाल यह है कि क्या आप भी मैदानी सच्चाई को जाने बगैर मंत्री या अधिकारियों के आकड़ों, दावों से सहमत हो सकते है?  यदि गलत आकड़ें पेश करने वालों की पहचान कर उनके विरुध्द सख्त कार्यवाही नहीं की गई तो बच्चों की मौत का सिलसिला कैसे रुकेगा?

 

अमिताभ पाण्डेय