संस्करण: 06अक्टूबर-2008

भोपाल के वकीलों का निर्णय संविधान विरोधी हैं !

 

 

एल.एस.हरदेनिया

क्या कोई शिक्षक किसी छात्र को पढ़ाने से इंकार कर सकता है ? क्या कोई डाक्टर किसी विशेष जाति, धर्म या वर्ग के रोगी का इलाज करने से इंकार कर सकता है? संभवत: नहीं। समाज में कुछ ऐसे प्रोफेशन होते हैं जो समग्र समाज की सेवा एवं सहायता के लिए बनाए गए हैं। शिक्षकों, डाक्टरों के साथ-साथ वकीलों का प्रोफेशन भी इसी श्रेणी में आता है। जिस तरह शिक्षक और डाक्टर पिक एंड चूज़ का दृष्टिकोण नहीं अपना सकते उसी तरह वकील भी ऐसा नहीं कर सकते। इन सभी व्यवसायों के सदस्य अपवाद स्वरुप विशेष परिस्थिति में व्यक्तिगत कारणों से तथा व्यक्तिगत हैसियत से किसी व्यक्ति को सेवा प्रदान करने से तो इंकार कर सकते हैं, लेकिन समूह के रुप में तो किसी भी स्थिति में ऐसा नहीं कर सकते। परन्तु इस परंपरा के विपरीत भोपाल के कुछ वकीलों ने सामूहिक रुप से यह शपथ ली है कि वे किसी भी आतंकवादी या नक्सलवादी की वकालत नहीं करेंगे।

कुछ दिनों पूर्व भोपाल के जिला न्यायालय के परिसर में कुछ वकीलों की सभा हुई। समाचार पत्रों में छपी खबरों के अनुसार सभा का आयोजन जिला बार एसोसिएशन, जूनियर लायर एसोसिएशन तथा मातृभूमि रक्षा मंच की ओर से किया गया था। सभा में भोपाल जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश व्यास एवं सचिव जगदीश परमार ने उपस्थित वकीलों को यह शपथ दिलाई कि वे आतंकवादियों और नक्सलवादियों के मामलों में उनकी पैरवी नहीं करेंगे। सभा को संबोधित करते हुए राजेश व्यास ने कहा कि देश भर में हो रही आतंकवादी घटनाओं को देखते हुए राजधानी के वकीलों ने यह फैसला लिया है। आतंकवादी बेकसूर लोगों की हत्या करते हैं, जिसकी वकील समुदाय निंदा करता है। उन्होंने चेतावनी भरे शब्दों में कहा कि इस शपथ के बाद भी जो वकील आतंकवादियों और नक्सलवादियों की पैरवी करेगा उसके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी। वकीलों द्वारा ली गई इस शपथ पर मिली-जुली प्रतिक्रिया हुई। भारतीय जनता पार्टी ने वकीलों के इस निर्णय का स्वागत किया वहीं अन्य दलों व सामाजिक संस्थाओं ने इस निर्णय की निंदा करते हुए उसे लोकतंत्र विरोधी बताया।

सर्वप्रथम इस निर्णय की निंदा करते हुए भोपाल के उदारवादी बुध्दिजीवियों ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया। वक्तव्य में नगर की अनेक जानी-मानी हस्तियों के अलावा स्वयंसेवी संस्थाओं से जुड़े अनेक व्यक्तियों ने इस शपथ की निंदा और उसे संविधान विरोधी बताते हुए लोगों के मूलभूत अधिकारों पर गंभीर कुठाराघात बताया। वकीलों के इस निर्णय को एक सामूहिक आतंकवाद निरुपित किया। यह अत्यंत आपत्तिजनक है कि शपथ के मध्यम से उन वकीलों को धमकी दी गई है जो आतंकवादियों या नक्सलवादियों की वकालत करने का साहस दिखाएंगे।

इस विरोधा को सामूहिक रुप देने के लिए एक संवाद का आयोजन किया गया। संवाद में सभी ने एक स्वर से भोपाल के वकीलों के निर्णय को संविधान विरोधी बताया क्योंकि संविधान में देश के प्रत्येक नागरिक को आवश्यकता पड़ने पर कानूनी सहायता प्राप्त करने का अधिकार दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार जेल में रह रहे कैदी को भी कानूनी सहायता पाने का अधिकार है। संविधान के प्रावधानों के अनुसार कानूनी सहायता अनिवार्य रुप से उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इसी तरह हमारे देश के अन्य कानून भी आरोपी को अपनी कानूनी रक्षा का अधिकार देते हैं। जिन लोगों ने यह शपथ ली है वे यह बात भूल जाते हैं कि हमारी कानूनी व्यवस्था का आधार ही यह है कि जब तक कोई आरोपी अदालत से दोषी साबित नहीं होता तब तक वह निर्दोष है। इस तरह वकील क्या सिर्फ पुलिस के कहने पर किसी को भी आतंकी या नक्सली मान लेंगे? पुलिस के सामने दिए गए बयान या पुलिस के समक्ष की गई अपराध की स्वीकारोक्ति को हमारी न्यायपालिका मंजूर नहीं करती है। अत: वकीलों का ऐसा रवैया पूरी तरह अनुचित है।

भोपाल में आयोजित इस संवाद में एक राय से यह माना गया कि किसी भी आरोपी द्वारा अधिवक्ता की कानूनी सहायता प्राप्त करना उसका मूलभूत अधिकार है। देश के हर नागरिक को इस बात की गारंटी संविधान ने दी है। इसलिए यदि कोई अधिवक्ता या अधिवक्ताओं का समूह यह फैसला करता है कि वे किसी विशेष श्रेणी के आरोपी की वकालत नहीं करेंगे तो उनका यह निर्णय संविधान विरोधी होगा और नागरिकों के मूलभूत अधिकार का उल्लघंन होगा।

उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश एवं म. प्र. मानवाधिकार आयोग के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस आर. डी. शुक्ला की राय में अधिवक्ताओं को ऐसी शपथ नहीं लेनी थी। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह का निर्णय हमारे देश के लोकतांत्रिक समाज पर कुठाराघात है। इस तरह के निर्णयों के दूरगामी परिणाम होंगे।

बैठक में अनेक अधिवक्ता, राजनैतिक एंव सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधा, साहित्यकार एवं पत्रकार भी शामिल थे। बैठक के विशेष अतिथि के रुप में बोलते हुए बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के विधि विभाग की डीन श्रीमती निशा दुबे ने कहा कि बार एसोसिएशन द्वारा की गई यह कार्यवाही किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। यदि इस तरह की शपथ दिलाई गई थी तो उसके प्रति मध्यप्रदेश बार कांउसिल एवं बार एसोसिएशन आफ इंडिया का ध्यान आकर्षित करना उचित होगा। उनसे उचित कार्यवाही की अपील भी की जा सकती है। श्री शुक्ला एवं श्रीमती दुबे ने सुझाव दिया कि पहले सभी तथ्यों को एकत्रित करके उसके बाद अगली कार्यवाही की जानी चाहिए। इस संबंध में भोपाल बार एसोसिएशन को पत्र लिखकर यह पूछा जाना चाहिए कि क्या उस दिन की सभा अधिकृत थी और यदि उसके पदाधिकारी यह स्वीकार करते हैं कि ऐसी सभा विधिवत रुप से हुई थी तो उनसे अनुरोध किया जाना चाहिए कि वे घोषणा करें कि दिलाई गई शपथ वापिस ली जाती है। यदि ऐसा नहीं होता तो विधि व कानून सम्मत कार्यवाही की जानी चाहिए।

बैठक में उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता राजेन्द्र बब्बर ने कहा कि बैठक का न तो नोटिस जारी किया गया और न ही उस दिन की कार्यवाही नियम व कानून सम्मत थी। हम इस तरह की किसी भी शपथ से बंधे हुए नहीं हैं। कुछ वक्ताओं ने कहा कि यह अधिवक्ताओं को बांटने का घिनौना प्रयास था। कुछ वक्ताओं की राय थी कि बार एसोसिएशन से जानकारी लेने की आवश्यकता नहीं है, आवश्यकता सीधी कार्यवाही की है। कुछ वक्ताओं ने स्मरण दिलाया कि कुछ दिन पहले धार में कुछ हिन्दुवादी संगठनों के लोगों ने एक वकील की इसलिए पिटाई कर दी थी  क्योंकि वह सिमी के एक गिरतार कार्यकर्ता की वकालत कर रहा था। यदि ऐसी प्रवृत्ति पर तुरंत नियंत्रण नहीं किया गया तो धार जैसी घटनाएं भोपाल सहित अन्य स्थानों पर भी होंगी। बैठक में यह भी बताया गया कि बार काउंसिल आफ इंडिया और मध्यप्रदेश बार काउंसिल ने वकीलों में उत्पन्न इस प्रवृत्ति को आपत्तिजनक बताया है।

 

एल.एस.हरदेनिया