संस्करण: 06अक्टूबर-2008

दस मुखी दानव का दहन

मानव की दोमुखी प्रवृत्ति का दहन भी हो !

 

राजेन्द्र जोशी

स मुंह वाले दानव लंकेश को तो हम प्रतिवर्ष एक निश्चित तिथि पर ज़श्न के साथ जला देते हैं किंतु दो मुँह वाली मानवीय प्रवृत्ति को जड़ मूल से खत्म करने में हम कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। भगवान राम ने जिस दिन दानवाधिपति दशासन का वध किया था, उस दिन को विजयपर्व के रूप में मनाकर हम प्रतिवर्ष बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाते आ रहे हैं। हम उत्सवधर्मी लोगों की यह एक खासियत है कि हम पर्व, उत्सव और त्यौहारों के महत्व को सिर्फ उसी दिन समझ पाते हैं जिस दिन वह त्यौहार होता है। बाकी के दिनों में हम इन त्यौहारों के पीछे छुपे महत्वों को बलाए ताक रख देते हैं। अन्धेरे पर उजाले की विजय के व्याख्यानों प्रवचनों और हमारे रहनुमाओं के संदेशों की उस तमाशे वाले दिन झड़ी लग जाती है। लोग संकल्प ले लेते हैं उल्टा-सीधा रस्ता छोड़कर सद्मार्ग में चलने का। विजयपर्व के दिन संदेश और संकल्प लेने के लिए जगह-जगह मंच सज जाया करते हैं। सभी के मुख से एक ही ध्वनि निकलती है, कि हम बुराई को जड़मूल से खत्म करके ही चैन से बैठेंगे। लेकिन दूसरे दिन से हमारे चेहरे के भाव एकदम बदल जाया करते हैं। इसका कारण यह है कि दूसरे दिन से हम अपने मुँह का उपयोग करने लगते हैं।

जिस तरह हम देव और मानव के दुश्मन रावण के दुर्गुणों और उसकी दुष्प्रवृत्ति की भर्त्सना करते हैं, उसे कोसते हैं और दशहरे के दिन उसके जलने के बाद उसकी राख और उसकी देह के ढांचे के जले हुए खाके की अस्थियों को बूट से रौंदने लगते हैं तो क्या दो मुख वाले मानव की भर्त्सना करने वाले या उसकी दुष्प्रवृत्ति के खिलाफ सृष्टि चुप बैठी हुई है ? कतई नहीं। सृष्टि में केवल मानव ही प्राणधारी जीव नहीं है बल्कि अन्य प्राणी भी हैं जो मानव को अपने लिए दानव मानता आया है। कहा जाता है कि एक बार वानर समाज ने एक अधिवेशन आयोजित किया जिसमें संसार भर के वानरों को आमंत्रित किया गया। इस अधिवेशन में सिर्फ़ एक ही प्रस्ताव रखा गया था जिसे वानर समाज ने सर्वसम्मति से पारित कर दिया। यह प्रस्ताव था डार्विन की उस थ्यौरी के खिलाफ जिसमें कहा गया है कि मानव के पूर्वज वानर थे। वानरों के मुखिया ने इस प्रस्ताव को प्रस्तुत करते हुए अपने भाषण में कहा कि यह वानर जाति का सरासर अपमान है। वानरजाति सदैव अपनी नैतिकता, मर्यादा और अनुशासन में रहती आई है जबकि मानव में हमारे आदर्शों की जरा सी भी झलक दिखाई नहीं देती है। हमारा मुँह भले ही काला या लाल हो किंतु वह एक ही है। जबकि मानव जाति एक मुख की है ही नहीं। हमारे वानर समाज का इतना नैतिक पतन नहीं हुआ है कि हम हमारे आदर्श भगवान राम की भक्ति को कहीं से भी बट्टा लगने दें। न तो हम अपनी समाज में एक दूसरे की टांग खींचते हैं, न ही एक दूसरे का शोषण करते हैं और न ही एक दूसरे को धोखा देते हैं जबकि मानव धोखेबाज है शोषणकर्ता हैं और परस्पर एक दूसरे के खून का प्यासा रहता है। मुखिया का यह भाषण सुनकर वानर समाज ने अपने पूर्वज रामदूत श्री हनुमान की जय के नारों से आसमान को गुंजा दिया और मानव की प्रवृत्तियों के खिलाफ उनके समाज द्वारा रचे गये गीत और संगीत पर पूरा का पूरा समाज नृत्य करने लगा। मुखिया ने अपने भाषण के अंत में कहा कि डार्विन की थ्योरी के खिलाफ हम भगवान राम की अदालत में याचिका दायर करेंगे और कहेंगे कि वानर जाति का एक ही धर्म है, वह धर्मों में नहीं बंटी है, हमारे मुख में राम तो है पर बगल में छुरियां नहीं हैं अत: मानव को वानरों की संतान मानने की इस थ्यौरी पर पाबंदी लगा दी जाय।

प्रत्येक प्राणी का अपना अपना धर्म है, अपनी-अपनी नैतिकता है और अपने अपने आदर्श हैं। चाहे वह प्राणी जलचर हो, थलचर हो या नभचर हो। किंतु मानव ने जल, थल और नभ पर अतिक्रमण करके अपने धर्म की मर्यादाओं के साथ खिलवाड़ किया है। विज्ञान, तकनीकी आधयात्म और शिक्षा के विविधा आयामों का दुरूपयोग करते हुए वह लोभ, लालच और स्वार्थ के वशीभूत होकर दोमुंह जिंदगी जीने लगा है। रावण में दानवीय दुर्गुणों के काले पक्ष के साथ धावल पक्षों के भी सद्गुण थे और वे गुण यह थे कि वह भगवान शंकर का भक्त था और अपने युग का एक प्रकांड विद्वान था। इसीलिए रावण की मृत्यु के समय जब उसकी कुछ ही सांसे शेष बची थी तब राम ने लक्ष्मण को रावण के पास उससे उसके कौशल और विद्या की सीख लेने के लिए भेजा था। क्या आज विजय दिवस के दिन रावण वध के समय कोई लक्ष्मण उस प्रकांड विद्वान के ज्ञान से कुछ सीखने जा पा रहा है ? आज का मानव दशहरे के दिन सिर्फ़ रावण की प्रतीक उसके काठ की देह कों जलाकर खुश तो हो लेता है किंतु उसके ज्ञान भंडार से कुछ सीखना नहीं चाहता। दस मुँह वाले दानव को जलाने का तमाशा करने वाले मानव को अपने भीतर के दानव को भी मारना होगा जिसके दो मुँह है। इन दो मुखों में है एक कथनी का और दूसरा मुख है करनी का। इस कथनी और करनी के भेद को मिटाना ही विजय पर्व का सबसे बड़ा संदेश है। हमारा यह पारंपरिक विजय दिवस, जलसा, उत्सव, जश्न और तमाशों के दिखावों तक ही सिमटकर रह गया है। आज के युग के इस बदलते दौर में मुखौटा उतारकर फेंक देना ही सबसे बड़ा विजयपर्व होगा।

 

राजेन्द्र जोशी