संस्करण: 06अप्रेल-2009

''ग्रामीण विकास में
योगदान देती सहकारी समितियां''

 


स्वाति शर्मा

      र्थिक विकास के विभिन्न साधानों में सहकारिता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। साथ मिलकर काम करने की भावना ही सहकारिता होती है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में तो सहकारिता की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। यह बात अलग है कि इस भावना में निरंतर कमी होती जा रही है जिसका कारण यह है कि समाज का ढांचा व्यक्तिवादिता की ओर बढ़ रहा है। वर्तमान में समूह के स्थान पर व्यक्तिगत भावना का बोलबाला अधिक है, जिसका प्रभाव सहकारिता पर पड़ रहा है। सहकारी समितियों को महत्व विकास कार्यक्रमों के संचालन में अधिक है। साथ-साथ काम करने से जहाँ एक ओर काम बंट जाता है, तो इसका प्रभाव उत्पादन एवं उत्पादकता पर भी पड़ता है। सहकारिता एक ऐसा संगठन है जिसके अंतर्गत लोग स्वेच्छा से मिलकर एवं संगठित होकर जनकल्याण के लिए कार्य करते हैं। इसकी सदस्यता स्वैच्छिक होती है। किसी व्यक्ति को इच्छा के विरुध्द इस संगठन का सदस्य बनने के लिए बाधय नहीं किया जा सकता। सहकारिता समिति का कार्य संचालन जनतांत्रिक आधाार पर होता है। इसमें सबको बराबर समझा जाता है। सभी को समान अवसर व समान अधिकार प्राप्त होते है। इन समितियों की एक विशिष्ट विशेषता यह होती है कि इसमें आर्थिक हितों के साथ-साथ सामाजिक एवं नैतिक हितों पर भी धयान दिया जाता है। अत: आर्थिक विकास के साथ-साथ इनमें नैतिक विकास पर भी बल दिया जाता है। सहकारी समितियों का उद्देश्य होता है कि वे न्यूनतम लागत पर अधिकतम सुविधााएँ अपने समुदाय के लोगों को सुलभ कराएं।

सहकारी समितियां समानता की भावना पर आधारित होती है। पूंजी, धर्म, राजनीति, जाति, सामाजिक स्तर आदि किसी भी आधाार पर कोई भी भेदभाव नहीं किया जाता। इन समितियों में संस्था के सदस्य अपने कार्यों का प्रबंधा व संचालन स्वयं करते हैं, यहाँ तक कि संगठन अपने सेवा कार्यों हेतु वित्तीय संसाधानों सहित सभी व्यवस्थाएं स्वयं करता है। आज की व्यक्तिवादी अर्थव्यवस्था में सहकारिता का महत्व अधिक बढ़ गया है। आर्थिक विकास की गति को तीव्र करने में इसका महत्व विशेष रूपसे रहा है। विगत चार दशकों में सहकारिता ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। देश के आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए जिन प्रमुख संस्थाओं की आवश्यकता महसूस की गई, उसमें सहकारी समिति प्रमुख हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी समितियों की स्थापना का मतलब है कि ग्रामीण निर्बल व्यक्ति भी अपना विकास करने में समर्थ हो जाते हैं क्योंकि इन समितियों का सदस्य बनने में धानी व निर्धान के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाता। सभी को समान अवसर,अधिकार व उत्तरदायित्व प्राप्त होते हैं। सहकारी समितियों का समाज में इसीलिए अधिक महत्व है, क्योंकि यह संगठन शोषण रहित सामाजिक आर्थिक व्यवस्था स्थापित करने में सहायक है।

ग्रामीण समुदाय में सहकारिता का लाभ विशेष रूप से मिलता है क्योंकि देश का ग्रामीण क्षेत्र विकास की धारा में पीछे रह जाता है। अत: आर्थिक विकास को इन क्षेत्रोंमें तीव्र करने का यह मुख्य साधान है। इन समितियों के माधयम से ग्रामीण क्षेत्रों को बहुत लाभ होते है,जैसे-सस्ती साख,ग्रामीण एवं लघु उद्योगों का विकास,कृषि का विकास, फिजूल खर्ची में कमी, संपत्ति का समान वितरण, सामाजिक कल्याण, श्रमिकों के साथ अच्छे संबंधा, आर्थिक सुरक्षा आदि। सहकारिता के विश्लेषण से ग्रामीण विकास में उसकी समर्पित भूमिका परिलक्षित होती है। सहकारी समितियों की सदस्य संख्यासे श्रमिक ऋण राशि तक में निरंतर वृध्दि हुई है।

लेकिन यदि हम सहकारिता के आर्थिक आंकड़ो को छोड़ कर वास्तविक रूप में उसकी समीक्षा करें तो पाएँगे कि देश के कई भागों में आज भी इसका विस्तार नहीं हो पाया है। लगभग 40 से 50 प्रतिशत ग्रामीण परिवार अभी भी सहकारी समितियों के क्षेत्र से बाहर है। सहकारी समितियो में आपसी वाद-विवाद बढ़ते जा रहे है। राजनीतिक प्रभाव इनमें दृष्टिगत हो रहा है। यद्यपि समितियों ने देश के आर्थिक विकास में विशेष रूप से ग्रामीण  विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन इसके बावजूद भी ये अनेक क्षेत्रों में दोषपूर्ण रही हैं। सहकारी समितियों की असफलता का एक ये महत्वपूर्ण कारण यह रहा है कि इन समितियों में प्रशिक्षित व कुशल प्रबंधा का अभाव रहा है। फलस्वरूप इनकी आय, व्यय, ऋण आदि के हिसाब में अनियमितताएं एवं अन्य अनेक कमियां परिलक्षित होती हैं। सहकारी समितियों का उद्देश्य आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक व नैतिक विकास करना भी था, लेकिन देखने में यह आया है कि ये सहकारी समितियां मात्र वित्तीय समितियां बन कर रह गई है, इनके द्वारा सामाजिक व नैतिक विकास का लक्ष्य अधारा रह गया है। सहकारी साख समितियों के पास पर्याप्त संसाधानों की कमी है। कई जगह वित्तीय संसाधानों ग्रामीण किसानों एवं कारीगरों को उपलब्धा करायी गईं, वह अपर्याप्त रूप में रहीं। उसमें कुछ राज्यों में ऋण राशि अधिक रहीहै, तो अनेक राज्यों में यह बहुत ही कम रही है। सहकारी समितियों की स्थापना भी देश में सभी जगह समान रूप से नहीं हो पाई है। पंजाब,महाराष्ट्र,राज्यों की 75 प्रतिशत, जनता के लिए सहकारी समितियां उपलब्धा हो पाई हैं जबकि उड़ीसा, बिहार तथा असम राज्योंमें 25 प्रतिशत ग्रामीण जनता को भी यह सुविधाा सुलभ नहीं हो पायी है। इनके द्वारा प्रदत्त कुल ऋणों का मात्र 15 प्रतिशत भाग सीमांत कृषकों एवं 5 प्रतिशत सहकारी समितियों द्वारा कृषकों को ऋण सुविधा देते समय इस बात का निरीक्षण व जांच पड़ताल नहीं की गई कि उस व्यक्ति में ऋण वापस करने की योग्यता व शक्ति है या नहीं अथवा ऋणी को ऋण की आवश्यकता है या नहीं। ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी समितियों के पूर्ण सफल न होने के पीछे एक कारण यह भी है कि इनकी नीति व कार्यक्रमों में समन्वय का अभाव रहा है।

सहकारी समितियों की पूर्ण सफलता के लिए यह आवश्यक है कि इन समितियों की नियमित जांच,सर्वेक्षण, पर्यवेक्षण तथा निरीक्षण होना चाहिए। तभी ये ग्रामीण विकास में अपना पूर्ण योगदान दे सकेंगी, जिस उद्देश्य से इनकी स्थापना की गई है।
 


स्वाति शर्मा