संस्करण: 05अक्टूबर-2009

 

गांधी जी का साम्यवाद

डॉ. सुनील शर्मा

वैश्वीकरण के दौर में आज असमानता लगातार बढ़ रही है जिसका परिणामस्वरूप हिंसा,आतंकवाद और नस्लवाद का आतंक हमारे समक्ष है। हिंसा से बिखरती दुनिया को आज फिर समानता की तलाश है जो या तो साम्यवाद दे सकता था या फिर गॉधी का मार्ग। लेकिन साम्यवाद स्वयं पस्त है ऐसे में गॉधीवाद ही एकमात्र रास्ता है जो वैश्वीकरण के खतरे से दुनिया को बचा सकता हैं। वास्तव में गॉधीवाद और साम्यवाद एक दूसरे काफी निकट प्रतीत होते हैं और हैं भी मगर इनके रास्ते अलग अलग है। अपने साम्यवादी या समाजवादी मित्रों के चर्चा करते हुए गाँधी जी ने भी अक्सर यह दावा किया है कि वे उनसे ज्यादा अच्छें साम्यवादी या समाजवादी है। यह बात उनके कार्यो से स्वमेव सत्य साबित होती है,उन्होने विचार और आचार से कभी भी असमानता को स्वीकार नहीं किया था। गॉधी का मानना था कि हर एक को उसकी जरूरत के मुताबिक दिया जाए और हर एक से उसकी योग्यता के अनुसार काम लिया जाए। गाँधी जी के अनुसार समानता लाने के लिए विचारों का समपर्ण एक जरूरी औजार है जो व्यक्ति को उत्तेजित किए बगैर सही गलत का ज्ञान करा सद्कार्यो की ओर उन्मुख करता है।

गॉधी ने अपने विचारों को प्रयोगों में ढाला था, गाँधी जी के आश्रम खुद वे स्थान हैं जहाँ अहिंसा और हिन्दुस्तान के गरीबों की हालात के मद्देनजर साम्यवाद के प्रयोग किए गए थे। इस संदर्भ में सेवाग्राम आश्रम के प्रयोंग उल्लेखनीय है सेवाग्राम आश्रम में आश्रमवासी वहाँ के लोगों की मर्जी से ही रहते थे,गाँव के एक झगड़ालू आदमी ने ईंधन के लिए आश्रम के कुछ पेड़ काट डाले ऐसा उसे कोई हक नहीं था। एक दूसरे आदमी ने मुआवजा लेने के बाद भी अपने खेत से जाने वाले आश्रम के रास्ते को रोक दिया जिसके लिए कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की गई सिर्फ ऐलान कर दिया कि आश्रमवासी वहाँ गांववालों की सेवा के लिए रहते हैं,अगर गांववाले उन्हें नहीं चाहते तो वे दूसरी जगह चले जाएगें।

आखिरकार गांववाले अपने झगडालू साथियों को सीधी राह पर ले आए। साबरमती आश्रम की बहनों ने न सिर्फ अपने घरेलू रसोई घरों को आम रसोई घर में मिला दिया और उसे चलाया, बल्कि दूसरों के बच्चों को भी अपने परिवार में लेकर अपने बच्चों की तरह पालने पोसने के लिए राजीं हो गईं यह उस जमानें की जबरदस्त क्रांति थी। ये प्रयोग वैचारिक साम्यता लाने के अच्छे प्रयास थे जिनके जरिए द्वेष और वर्ण भेद का भंजन किया जा सकता था। जो कि गॉधी ने किया भी। साम्यवाद में आर्थिक समानता को प्रमुख लक्ष्य माना गया है,तथा इसका आधारभूत सिद्वांत ही आर्थिक समानता रहा है जिसकी व्याख्या गॉधीवाद में भी की गई है, आर्थिक समानता के विषय पर गॉधीजी ने मद्रास में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में उनसे किए गये प्रश्न कि 'आपकी राय में आर्र्थिक समानता की अवधाारणा क्या है ? पर काफी विशद विवेचना की थी गाँधी ने कहा था कि आर्थिक समानता की मेरी कल्पना का यह अर्थ नहीं है हर एक कों शब्दश: एक ही रकम दी जाए,उसका सीधा सादा मतलब यह है कि हर एक स्त्री या पुरूष को उसकी जरूरत के मुताबिक रकम मिलनी चाहिए। मसलन हाथी चींटी से हजार गुना ज्यादा खाता है,मगर यह असामनता सूचक नहीं है यह उसकी जरूरत है अत: यह असमानता नहीं है। इसलिए आर्थिक समानता का सच्चा अर्थ है-हरएक को उसकी जरूरत के मुताबिक दिया जाए। माक्र्स की व्याख्या भी यही है अगर कोई अकेला आदमी एक औरत और चार बच्चों वाले आदमी के जितनी माँग करता है तो इसको आर्थिक समानता के सिध्दांत का उल्लघंन कहा जाएगा। गॉधी ने आगे कहा था कि-उचें वर्ग के लोगों और आम जनता,राजा और रंक के बीच बड़े भारी भेद का यह कहकर उचित नहीं मान लेना चाहिए उनकी जरूरते पहलें से ही दूसरों से बढ़ी हुई है। यह बेकार की दलील और मेरे तर्क की खिल्ली उड़ाना होगा। आज के अमीर और गरीब के भेद से मेरे दिल को बड़ी चोट पहुचती है। विदेशी नौकरशाही और देश के रहनेवाले शहरी लोग गॉव के गरीबों का शोषण करतें है।

 गॉववाले अन्न पैदा करते है और खुद भूखों मरतें है। वे दूध पैदा करते है और उनके बच्चों को दूध की एक बूद भी मयस्सर नहीं होती यह शर्मनाक है। हरेक को पौष्टिक भोजन, रहने के लिए उम्दा मकान,बच्चों को तालीम की जरूरी व्यवस्था और दवादारू की मदद मिलनी चाहिए। मेरी नजर से यही आर्थिक समानता है। वास्तव में सबको रोटी सबको काम की ऐसी ही कल्पना माक्र्स की भी थी। गॉधी और माक्र्स आर्थिक समानता लाने के लिए प्रतिबध्द थे लेकिन उनके रास्ते अलग अलग थे। साम्यवादियों और समाजवादियों का मानना था कि वे आर्थिक समानता को जन्म देने के लिए कुछ भी कर सकते है,हिंसा और द्वेष से भी उन्हे परहेज नहीं है, उनका कहना है कि राजसत्ता पाने पर वे लोगों से समानता का सिद्वांत अमल कराएगें। जबकि गॉधी की सोच थी कि राज्य प्रजा की इच्छा को पूरा करेगा न कि लोगो को हुक्म देगा या अपनी आज्ञा जबरन् उन पर लादेगा। मैं घृणा से नही, प्रेम की शक्ति से लोगो को अपनी बात समझाउँगा और अहिंसा के जरिए आर्थिक समानता पैदा करूगा। वास्तव में गॉधी और माक्र्स के लक्ष्य एक से थे लेकिन रास्ते अलग-अलग,अक्सर यह कहा जाता रहा है कि साम्यवाद से हिंसा को हटा दिया जाये तो गांधीवाद और साम्यवाद एक ही चीज है। या गांधी जी अहिंसक साम्यवादी थे या गांधी जी और साम्यवाद के बीच साध्य का कोई फर्क नहीं केवल साधन का ही फर्क है। साधन की शुध्दि यानि सत्य और अहिंसा पर गांधी जी का जोर था।

 अगर साम्यवाद इस शर्त को मंजूर कर ले तो गांधीवाद और साम्यवाद एक ही चीज हो जाते हैं। यदि कोई कहता है कि गांधी जी पूंजीपतियों, जमींदारों और अंग्रेजों के मित्र हैं तो उसे भी वे मान्य करते थे। और इससे उल्टा कोई कहता कि वे दरिद्र नारायण के सच्चे सेवक हैं और शुध्द साम्यवादी हैं तो उसे भी वे सत्य समझते थे। गॉधी जी की आर्थिक समानता की बात सृजन में विश्वास रखती थी और माक्र्स का विश्वास संघर्ष और हिंसा में था। राह में अंतर के कारण ही आज माक्र्सवाद सिकुड़ रहा है जबकि गॉधीवाद की स्वीकार्यता बढ़ रही है, हमें उस दिन की प्रतीक्षा करनी चाहिए जिस दिन विकास के जरिए गॉधी की आर्थिक समानता का मूर्त रूप साकार होगा। वास्तव में हमें माक्र्सवाद की मृत्यु घोषणा का इंतजार नहीं वरन इसे गॉधी के नजरिए प्रतिस्थापित होने का इंतजार होना चाहिए।

 


डॉ. सुनील शर्मा