संस्करण: 05अक्टूबर-2009

 

विश्व बैंक से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को कर्जा :
समाजकल्याण कार्यक्रमों में कटौती के लिए सुगम होता रास्ता

 

 

 

सुभाष गाताड़े

कोई भी महाजन, कोई भी बैंक जब तक उसे अपना लाभ नज़र न आए तब तक वह अपना पैसा दांव पर नहीं लगा सकता ! प्रश्न उठता है कि भारतीय बैंकों को विश्व बैंक से जो 2 बिलियन डॉलर अर्थात लगभग 9,600 करोड़ रूपए कर्ज के रूप में मिला है, वह किस वजह से मिला है ? भारत सरकार को इस रकम के एवज में बैंक की कौनसी शर्ते माननी पड़ी हैं।

गौरतलब है कि विश्व बैंक द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की मजबूती की तारीफ या अपने बजट भाषण में खुद वित्त मंत्री द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण के चालीस साल पूरे हो जाने पर इस 'ऐतिहासिक घटना' के पढ़े गए कसीदों की चकाचौंधा में यह सवाल कहीं दफन सा होता दिखा है। उल्टे मीडिया में विश्व बैंक के इस पैकेज पर खुशी का ही इजहार किया जा रहा है और यह एक तरह से 'भारत के सार्वजनिक बैंकों की कामकाज और सरकारी उपायों के प्रति' इस अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान का प्रमाणपत्र  माना जा रहा है।

जानने योग्य है कि पिछले साल जब अमेरिका तथा अन्य विकसित पूंजीवादी देशों को जबरदस्त वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा था, उन दिनों भारतीय अर्थव्यवस्था तक उसकी अधिक आंच न पहुंच पाने के पीछे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की तारीफ हुई थी। वहीं स्वयं विश्व बैंक को तथा अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं को अपनी अनावश्यक सख्ती और सभी को एक ही डण्डे से हांकने की प्रवृत्ति की वजह से आलोचना का शिकार होना पड़ा था। इसमें कोई दोराय नहीं कि एक ऐसे वक्त में जबकि दुनिया भर में बैकिंग के संचालन एवम तौर तरीकों पर नए ढंग से पुनर्विचार हो रहा है, भारत सरकार का विश्व बैंक के दरवाजे जाना - जो अपने पुराने तौर तरीकों पर ही कायम है - इन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के सार्वजनिक स्वरूप को गहराई से प्रभावित कर सकता है।

वैसे इस कर्जे को लेकर आधिकारिक तौर पर जो कुछ कहा जा रहा है, उस पर गौर करें : भारत के लिए नियुक्त विश्व बैंक के कन्ट्री डायरेक्टर के हिसाब से देखें तो यह कर्जा नयी पूंजी का निवेश करना है, जो सार्वजनिक क्षेत्र की चन्द बैंकों को अवरचना विकास, छोटे तथा मध्यम दर्जें के उद्यम आदि के लिए कर्जा देने के काम को विस्तारित करेगा। विश्व बैंक के इस कदम को बैंकों के रिकैपिटलायजेशन अर्थात उसकी पूंजी के नूतनीकरण कहने से इन्कार करते हुए - जिसका अर्थ होगा वहां पूंजी की कमी है - निदेशक महोदय ने बिल्कुल साफ किया चूंकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है, इसलिए वहां पूंजी/लिक्विडिटी की कभी समस्या नहीं रही है।जब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अपने आप में मजबूत हों तो सहज सवाल उठ सकता है कि क्या विश्व बैंक के दरवाजे जाने के पहले अन्य वैकल्पिक रास्तों पर विचार नहीं किया जा सकता था ?

जैसे कुछ समय पहले ख़बर आयी थी कि बैंकों के नानपरफार्मिंग एसेटस् अर्थात ऐसी सम्पत्ति जो खराब कर्जे के रूप में फंसी है, उसकी अकेली रकम 44 हजार करोड़ तक पहुंची है (टाईम्स आफ इण्डिया, 5 अगस्त 2009)। वैसे यह आंकड़ा इस वजह से कम भी दिखता है कि साल भर पहले केन्द्र में सत्तासीन कांग्रेस के नेतृत्ववाली संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धान की सरकार ने बहुत सारे ख़राब कर्जे माफ कर दिए थे। जहां इन ख़राब कर्जों का महत्वपूर्ण हिस्सा कृषि क्षेत्र को तथा छोटे उद्यमों को दिए कर्जे में फंसा है, वहीं यह भी स्पष्ट है कि इसका बहुलांश कार्पोरेट क्षेत्र को दिए गए कर्जों का है। कुछ समय पहले आल इण्डिया बैंकिंग एम्लाइज एसोसिएशन - जो बैंक कर्मचारियों का सबसे सशक्त संगठन है - ने इस बात का विस्तृत विवरण पेश किया था कि इन ख़राब कर्जों अर्थात नानपरफारर्मिंग एसेटस का 90 फीसदी से अधिक इन कार्पोरेट उद्योगपतियों के यहां फंसा है ।

आखिर यह बात कितनी अतार्किक लगती है कि इन ख़राब कर्जों की सख्ती से वसूली करने के बजाय, कार्पोरेट उद्यमों पर लगाम कसने के बजाय, जनता के टैक्स से जमा रकम के आधार पर इन्हें माफ किया जाता है और बैंकों की सेहत सुधारने के लिए विश्व बैंक के पास कटोरा लेकर पहुंचा जाता है। पूंजी निवेश के लिए अन्य वैकल्पिक रास्तों के सन्दर्भ में अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में प्रतिष्ठित पत्रिका 'इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली' (19 सितम्बर 2009) कहता है कि 'क्या ऐसा नहीं हो सकता था कि नब्बे के दशक की तरह जब वित्त मंत्रालय ने बैंकों में इक्विटी/पूंजी लगायी थी और बैंकों से कहा था कि उसी रकम के बॉण्ड वह सरकार से खरीद ले।' पत्रिका के उपरोक्त सम्पादकीय में चीन के अनुभव की भी चर्चा की गयी है जिसमें उसने बैंकों में नयी पूंजी निवेश के लिए अपने ही विदेशी मुद्रा भण्डार का एक हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में निवेश का रास्ता ढूंढ निकाला। मालूम हो कि फिलवक्त भारत का विदेशी मुद्रा भण्डार 260 बिलियन डॉलर तक पहुंचा है, उसके सामने 2 बिलियन डॉलर की राशि बहुत मामूली जान पड़ती है।

विडम्बना इस बात की है कि जहां रिजर्व बैंक आफ इण्डिया विदेशी मुद्रा में स्थित अपनी परिसम्पत्ति पर 2 या 3 फीसदी के हिसाब से सूद प्राप्त करता है, दूसरी तरफ अब विश्व बैंक के इस कर्जे पर ब्याज की दर होगी 10 से 12 फीसदी। विश्व बैंक की शर्तों को अभी उजागर नहीं किया गया है, लेकिन वह सार्वजनिक क्षेत्र के इन बैंकों की कर्जा देने की वर्तमान प्रणाली में कोई रैडिकल बदलाव नहीं लाएगी। जाहिर है इन बैंकों की कर्जा नीति के तहत ग्रामीण क्षेत्र के लिए दिए जानेवाले संस्थागत कर्जे में लगातार आ रही कमी रही है और विश्व बैंक के प्रस्तुत कर्जे के चलते उसमें और कमी आएगी। विगत एक दशक के अन्तराल में ग्रामीण क्षेत्रों से एक लाख से अधिक किसानों द्वारा की गयी आत्महत्या के समाचारों का बैंकों की बदलती ऋणनीति से गहराई से सम्बन्ध है।

अन्त में जब संसाधान उपलब्धता की समस्या न हो और न सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की वह प्राथमिकता में वह बात न हो, इसके बावजूद विश्व बैंक से कर्जा क्यों लिया गया है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि इस कदम से भारत सरकार कुछ समय पहले रिजर्व बैंक आफ इण्डिया की समझदारी को अमली जामा पहना रही है जिसके अन्तर्गत भारत में विदेशी बैंकों की उपस्थिति को सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ाने के प्रति अपनी प्रतिबध्दता जाहिर की गयी थी। ऐसा ही प्रतीत होता है कि विश्व बैंक की शर्तों का बहाना बना कर घरेलू बैंकिग क्षेत्रो को रैडिकल ढंग से बदलने की योजना शायद पर्दे के पीछे बन रही है।
 

सुभाष गाताड़े