संस्करण: 04 अक्टूबर-2010  

चीन की चुनौती

 

 

  ? राखी रघुवंशी

       

            ताजा आंकड़ों के अनुसार, चीन की अर्थव्यवस्था आकार की दृष्टि से दुनिया में दूसरे नबंर पर आ गई है। अब केवल अमेरिका उससे आगे है। यदि कुछ अप्रत्याशित नहीं हुआ तो 2030 तक चीन उसे भी पछाड़ देगा। चीन की यह प्रगति वाकई कमाल की है। हमारे आज़ाद होने के दो वर्ष बाद वहां क्रांति की विजय हुई। उसके बाद उसे अनेक मुसीबतों से गुजरना पड़ा। इनके लिए माओ काल के दौरान उठाई गई दुस्साहसिक नीतियां मुख्य रूप से जिम्मेदार थीं। फिर वहां भारी अकाल पड़ा, जिसमें काफी जानें गईं। उसे अमेरिका ने अस्पृश्य बनाने की काफी कोशिशें  कीं। ताइवान से भी उसका लगातार तनाव बना रहा। फिर भी देंग शियाओ पिंग के दौर में नीतिगत परिवर्तनों के कारण वह आर्थिक संवृध्दि के पथ पर तेजी से आगे बढ़ता गया है। आर्थिक क्षेत्र में मात्र तीन दशकों में चीन ने जो कमाल किया है, वह अंचभे में डालने वाला है। उल्लेखनीय है कि शुरूआती अनेक वर्षों तक भारत आर्थिक रूप से चीन से कहीं आगे था। हाल के सालों में चीन ने जापान, फ्रांस और ब्रिटेन को पीछे छोड़ा है। पिछले चार दशकों से जापानी अर्थव्यवस्था अमेरिका के बाद दूसरे नबंर पर काबिज थी। आज से पांच साल पहले चीनी अर्थव्यवस्था आकार में जापानी अर्थव्यवस्था की आधी थी। लेकिन उसका आर्थिक प्रदर्शन इतना अच्छा रहा कि जापान को स्वीकारना पड़ा कि अब उसका चीन से आगे निकल पाना संभव नही है।

         जहां तक अमेरिका और चीन के बीच मुकाबले का सवाल है, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था आकार में चीनी अर्थव्यवस्था से तीन गुनी है। क्षेत्रफल की दृष्टि से दोनों के बीच समानता है, लेकिन जनसंख्या और प्राकृतिक संसाधानों के लिहाज से भारी अंतर है। चीन की आबादी विशाल है, मगर संसाधन अमेरिका के मुकाबले बहुत कम हैं। ज्ञान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी वह काफी पीछे है। आम चीनी काफी गरीब है। उसकी सालाना आय 3600 डॉलर है, जबकि एक औसत अमेरिकी साल में 46000 डॉलर कमाता है। हालांकि हाल के सालों में आर्थिक मंदी का यूरोपीय और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर जैसा असर पड़ा है, वैसा चीन पर नहीं पड़ा है। इस कारण विश्व अर्थव्यवस्था पर चीन का काफी प्रभाव हो गया है और आने वाले दिनों में एशिया में उसका दबदबा बढ़ता ही जाएगा।

        चीन ने आधारभूत ढांचे में काफी निवेश किया है। इस कारण उसकी आर्थिक संवृध्दि की दर इस वर्ष 10 फीसदी रहने की उम्मीद है। विदेश व्यापार के क्षेत्र में उसका असर काफी बढ़ा है। रूस, भारत, आस्ट्रेलिया और लैटिन अमेरिकी बाजार में उसके बढ़ते असर को देखा जा सकता है। हालांकि चीन की सफलता के पीछे जो कारण रहे हैं, वे उसके गले की फांस बन सकते हैं। चीन ने देंग के जमाने से निर्यातोन्मुखी आर्थिक संवृध्दि का मार्ग अपनाया है। वहां विदेशी बाजार के लिए उत्पादन करने पर जोर रहा। इस कारण अमेरिका और अन्य विकसित देशों तथा हमारे यहां भी सस्ते चीनी मालों की भरमार है। लेकिन उसका अपना घरेलू बाजार विकसित करने पर जोर नहीं दिया। इसकी वजह यह है कि चीनी खर्च करने के बदले बचत करने पर जोर देते हैं।

        चीन की कुल घरेलू बचत उसके सकल घरेलू उत्पाद का करीब 50 प्रतिशत है, जो बीती सदी के नब्बे के दशक में 40 प्रतिशत था। इस बचत को एक हद तक देश में औद्योगिक उत्पादन और आधारभूत ढांचे की क्षमता बढ़ाने में लगाया जाता है और शेष को अमेरिकी ट्रेजरी बांड़ों की खरीदारी में। इसके परिणामस्वरूप अमेरिकी विदेश व्यापार का वित्त पोषण होता है। यानी अमेरिका चीनी सामान खरीदता है। साथ ही, अमेरिका में ब्याज की दर निम्न स्तर पर बनी रही है, जिससे अब तक अमेरिकी बैंक लोगों को सस्ती दर पर ऋण देते रहे हैं। अमेरिका में पिछले तीन सालों से जारी संकट के पीछे इस कारण का बड़ा हाथ रहा है। चीन का घरेलू बाजार उसकी विशालकाय जनसंख्या और सकल घरेलू उत्पाद की दृष्टि से काफी छोटा है, क्योंकि वहां के लोगों पर खर्च घटाने और बचत बढ़ाने का दबाव हमेशा रहता हैं। सरकारी नीति के चलते वहां बच्चों की संख्या सीमित रखनी पड़ती है। इसलिए लोगों को यह चिंता सताती रहती है कि उम्र ढलने पर उनकी देखरेख कैसे होगी।

        समाजवादी देश होने का दावा करने के बावजूद वहां आम जन को वैसी सामाजिक सुरक्षा नहीं है, जैसी सोवियत संघ में थी। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि की व्यवस्था में राज्य का योगदान नगण्य है। बेरोजगारी से बचाव और पूर्ण रोजगार की कोई गारंटी नहीं है। मजदूरी की दर बहुत कम है। वहां न तो कारगर ट्रेड यूनियन हैं और न ही असरदार श्रम कानून। वहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली का भी अभाव है। इन वजहों से अनिश्चितता का माहौल है, जिसका सामना करने के लिए अधिक से अधिक मात्रा में बचत करने पर जोर है। हाल ही में वहां श्रमिक असंतोष भड़का था, जिसके पीछे यही सब कारण थे। आने वाले दिनों में अमेरिकी सरकार की नीतियों में भी बचत को बढ़ावा दिए जाने की संभावना है। अगर अमेरिका ने बचत बढ़ाने तथा उपभोग घटाने की ओर कदम बढ़ाया, तो चीन को धक्का लगेगा, क्योंकि उसे माल और पूंजी निर्यात घटाना पडेगा। मजबूरन उसे घरेलू बाजार के विकास को तरजीह देनी पड़ेगी। फिर उसे आर्थिक संवृध्दि का निर्यातोन्मुखी मॉडल छोड़कर सामाजिक सुरक्षा को विस्तार देना पड़ेगा। जल्दी ही वहां कमाउ जनसंख्या की तुलना में बूढ़ों की संख्या बढ़ेगी, जिसका अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। इस प्रकार चीन का भविष्य उतना उत्साहवर्ध्दक नहीं लगता, जितना उसका वर्तमान है।

? राखी रघुवंशी