संस्करण: 04 अक्टूबर-2010  

चुनाव सुधार की ओर

एक जनप्रतिनिधि ऐसे भी चुनें

 ? वीरेंद्र जैन

           

         पनी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दल अपने दलों की नीतियों, कार्यक्रमों, घोषणा पत्रों, उम्मीदवार के व्यक्तित्व आदि के आधार पर वोट माँगने का दिखावा करते हैं किंतु यथार्थ में धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा, वादे, रिश्ते, गैर राजनीतिक कारणों से प्राप्त लोकप्रियता, और वैध-अवैध ढंग से कमाये धन के आधार पर गला काट प्रतियोगिता कर वोट जुगाड़ते रहते हैं। राज्य सभा में कुछ सीटों पर सरकार की सलाह से राष्ट्रपति विभिन्न तरह के समाज सेवियों, जैसे डाक्टरों, पत्रकारों, लेखकों, कलाकारों वैज्ञानिकों, शिक्षकों आदि क्षेत्रों के शिखर व्यक्तित्वों को मनोनीत करते हैं। यह मनोनयन आम तौर पर सत्तारूढ दल से जुड़े लोगों का ही किया जाता है। उनके इस मनोनयन से उन्हें सम्मान तो मिलता है किंतु समाज में समाज सेवा के काम को कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता। कला के क्षेत्र के अनेक लोग तो एकाध बार से अधिक कभी भी संसद में नहीं आते। कितना अच्छा हो अगर हम संसद के लिए केवल एक विशेष प्रतिनिधि चुनने के लिए पूरे देश से और विधान सभा के लिए एक-एक विशेष विधायक चुनने के लिए प्रदेशों से निम्न पात्रताओं के नागरिकों को एक अतिरिक्त मत देने हेतु ए विशिष्ट निर्वाचन क्षेत्र का गठन करें और उसके लिए क्रमश: देश और सम्बन्धित राज्य के मान्यता प्राप्त दलों के  सुपात्र उम्मीदवारों के बीच पोस्टल या आन लाइन मतदान से उस प्रतिनिधि का चुनाव करें।

          सारे ही दल समाजसेवी होने के दावे करते रहते हैं, और ये दावे ज्यादातर झूठे  ही होते है इससे समाज सेवा का दावा करने वाले दलों की पहचान होगी और उनमें सच्ची समाज सेवा के लिए एक  स्वस्थ प्रतियोगिता विकसित होने से समाज का कुछ भला हो सकेगा।

इस विशिष्ट मतदान के लिए अनिवार्य न्यूनतम दो पात्रताएं निर्धारित अवधि में,

n     वह नागरिक जिसने सम्बन्धित चुनाव अवधि में एकाधिक बार रक्तदान किया हो।

n     वह नागरिक जिसने प्रेरित करके कम से कम पाँच लोगों की नसबन्दी करायी हो।

n     वह नागरिक जिसने प्रेरित करके कम से कम पाँच लोगों की आंखों का आपरेशन कराया हो

n     वह दम्पत्ति जिसने एक लड़की तक अपने परिवार को सीमित रखा हो

n     वह ग्रह प्रमुख नागरिक जिसने अपने परिवारजनों की मृत्यु पर उनका शवदाह विद्युत शवदाहग्रह में किया हो।

n     वे दम्पत्ति जिन्होंने अंतर्जातीय विवाह किया हो।

n     वे खिलाड़ी जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय या राष्ट्रीय पुरस्कार जीते हों।

n     वे फिल्म निर्माता जिनकी फिल्मों को राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हों।

n     वे वैज्ञानिक जिनकी खोजों को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिली हो।

n     वे लेखक जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हों।

n     वे नागरिक जिन्हें पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया हो।

n     वे नागरिक जिन्हें साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला हो

n     वह नागरिक जिसने नेत्रदान का संकल्प पत्र भरा हो।

n     वह नागरिक जिसने देहदान का संकल्प पत्र भरा हो।

कुछ अन्य ऐसी ही पात्रताएं जो स्वयं सिध्द हों और जिनमें पक्षपात न किया जा सकता हो, और जिनके बीच मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों में प्रतियोगिता बढने से ठोस और प्रमाणित समाज सेवा के कार्यों में वृध्दि हो।

          असल में हमने कुछ संवैधानिक आदर्श तो बना लिए हैं किंतु उन आदर्शों को पालन कराने के लिए समाज में कोई प्रोत्साहन नहीं रखा है जबकि यथास्तिथिवादी समाज तरह तरह से व्यक्तियों पर दबाव डालकर उन्हें कुरीतियों से जकड़े रखना चाहता है। चुनावी राजनीति में चुनावी नेता सबसे अधिक सक्रिय होते हैं और अगर इनकी इस सक्रियता को समाज से पुष्ट होने वाली सेवा से जोड़ दिया जाये तो कुछ ठोस परिणाम सामने आ सकते हैं। बहुत सम्भव है कि राजनेता जो धन वोट खरीदने के लिए दारू में खर्च करते हैं वह समाज सुधार के कामों वाले वोटरों को प्रोत्सहित करने में लग सके। हमारा लक्ष्य एक जाति मुक्त समाज बनाना रहा है किंतु गैर राजनीतिक आधार पर होने वाले चुनावों के कारण हम तरह तरह से जातियों में जकड़ते जा रहे हैं। गत दिनों जातिवार जनगणना के सवाल पर एक वर्ग ऐसा भी उभरा जो अपनी जाति हिन्दुस्तानी लिखवाना चाहता है। सच्ची भावना से ऐसा चुनाव करने वाले यदि जाति लिखवाने वालों से अधिक संख्या में सामने आते हैं तो यह जातियों से मुक्त होने के लक्ष्य की ओर एक बड़ा कदम होगा। भले ही सरकार विभिन्न तरह के दबावों में जातिवार जनगणना के लिए तैयार हो गयी हो, पर यही जनगणना जातियों से मुक्त होने वाले बड़े वर्ग का संकेत दे कर जातिवादी राजनीति करने वालों को आइना दिखा सकता है। जो राजनीतिक दल स्वयं को जातिवादी दल नहीं मानते उन्हें अपने सदस्यों को स्वतंत्रता देते हुए भी खुलकर हिन्दुस्तानी लिखवाने का प्रचार करना चाहिए ।


? वीरेंद्र जैन