संस्करण: 04 अक्टूबर-2010   

अंतरकलह में उलझी भाजपा

? महेश बागी

            

             भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर अंतरकलह में उलझ गई है। ताज़ा मामला बिहार विधानसभा चुनाव का है, जहां नरेन्द्र मोदी को प्रचार के लिए बुलाने पर पार्टी दो खेमों में बंट गई है। नीतीश कुमार ने तो साफ़ कह दिया है कि बिहार में मोदी को बुलाया तो गठबंधन खतरे में पड़ जाएगा। नीतीश अच्छी तरह जानते हैं कि भाजपा उनसे गठबंधन नहीं तोड़ना चाहेगी। वैसे भी सरकार ने बिहार में विकास का जो मार्ग प्रशस्त किया है, उससे जनसाधारण में उनकी छवि और निखरी है। ऐसे में जद (यू) से गठबंधन क़ायम रखना भाजपा की मज़बूरी है। लेकिन पार्टी का एक वर्ग चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी का नाम उछाल कर उनका क़द कम करने की कोशिश में जुटा है।

           इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा शासित राज्यों में नरेंद्र मोदी सबसे अव्वल हैं। वे आज भाजपा के कद्दावर नेता और स्टार प्रचारक भी माने जाते हैं। उनके हिन्दुत्व-प्रयोग के आगे संघ परिवार भी नतमस्तक है। लेकिन बिहार चुनाव के मामले में पार्टी का एक वर्ग उन्हें मोहरा बना रहा है। मोदी बिहार में प्रचार करने जाएं या न जाएं, किंतु उन्हें लेकर मची अंतरकलह से उन्हें भी किसी एक खेमे के आगे नतमस्तक होने को मजबूर होना पड़ेगा। पार्टी में मची इस अंतरकलह ने इस स्टार प्रचारक को वजीर के बजाय एक प्यादे में तब्दील कर दिया है। दरअसल भाजपा का एक खेा नीतीश कुमार को उकसा रहा है कि मोदी के बिहार आने का विरोध कर अल्पसंख्यक मतों को तो अपनी ओर खींचे ही, साथ ही यह संदेश भी दें कि जिस मोदी के आगे संघ परिवार नतमस्तक है, उन्होंने उससे टक्कर ली है। भाजपा का यह खेमा अपनी ताक़त बढ़ा कर पार्टी को अपनी अंगुलियों पर नचाना चाहता है।

          यह खेमा संघ प्रमुख मोहन भागवत से इसलिए ख़फा है, क्योंकि उन्होंने पार्टी अध्यक्ष पद की दौड़ से उन्हें बाहर कर नितिन गड़करी को आगे कर दिया था। इस खेमे ने गड़करी को तो अलग-थलग कर ही दिया है और अब नरेंद्र मोदी का क़द कम करने में भी लगा है।  पार्टी में जारी इस अंतरकलह के कारण भाजपा के ऑक्सीजन माने जाने वाले मुद्दे किसान आदिवासी, खेती-खनन और राम मंदिर हाशिये पर चले गए हैं। उधर नरेंद्र मोदी की दिक्कत यह है कि वे एक ओर सोहराबुद्दीन फर्ज़ी मुठभेड़ मामले में फंसे हुए हैं, तो दूसरी ओर संजय जोशी सीडी कांड में उलझे हैं। अब यह बात आईने की तरह साफ हो चुकी है कि जोशी को जान-बूझ कर फंसाया गया था। सोहराबुद्दीन मामले में फंसे अफ़सरान बता चुके हैं कि फर्जी सीडी  कैसे बनी थी और उसे मुंबई अधिवेशन में कैसे बंटवाया गया था। संघ प्रमुख मोहन भागवत को भी यह जानकारी सप्रमाण दे दी गई हैं। इसके बाद संघ ने गडकरी को निर्देश दिए हैं कि जोशी को संगठन के काम सौंपे जाएं।

          याद रहे कि गडकरी जब कार्यकारिणी का  गठन कर रहे थे, तब नरेंद्र मोदी खेमे की ओर से उन्हें संजय जोशी को दरकिनार करने की सलाह दी गई थी और कहा गया था कि वे पार्टी में टकराव की नींव न डालें। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में मोदी सरकार के एक मंत्री पर सीबीआई ने शिकंजा कस दिया है और लगभग सत्तर पुलिस अधिकारी भी इस आरोप की ज़द में हैं कि उन्होंने दंगे के दौरान मोदी का एजेंडा लागू किया था। रही-सही कसर संजय जोशी फर्ज़ी सीडी कांड ने पूरी कर दी। ऐसे में मोदी के बढ़ते कद से ख़फ़ा  खेमा अपना क़द बढ़ाने की कोशिश में लग गया है और मोदी अपनी साख बचाने में लगे हैं।

          सीबीआई ने जब मोदी सरकार के गृह राज्यमंत्री पर शिकंजा कसा था, तब भाजपा ने प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए भोज का बहिष्कार किया था, किंतु इसके बाद पार्टी ने उनका साथ देने की बजाय मनमोहन सरकार से न क़दमताल की, बल्कि कुछ अवसरों पर उसके लिए संकटमोचक की भूमिका भी निभाई। एटमी उत्तरदायित्व विधेयक और कश्मीर मुद्दे पर भाजपा केंद्र सरकार के साथ ग़लबहियां करती नज़र आई और मोदी को किनारे कर दिया। उधर संघ परिवार का रूख़ भी बदल चुका है। भागवत के संघ प्रमुख बनने के बाद संघ ने अपनी दिशा बदल दी है। मंदिर मुद्दे पर संघ अब क़ानून और संविधान का पक्ष ले रहा है। मंदिर मुद्दे पर संघ परिवार में आज ऐसा कोई चेहरा नहीं है, जिसका सामाजिक प्रभाव है। ले-देकर एक नरेंद्र मोदी हैं, लेकिन उन्हें फूटी आंख पसंद नहीं करती, तो संघ भी उनसे कन्नी काटता है'  भाजपा का एक खेमा भी मोदी को नापसंद करता है। ऐसे में मोदी सिर्फ़ गुजरात में सिमट कर रह गए हैं।

         अयोध्या मामले के फैसले को लेकर संघ मुख्यालय में हुई बैठक में भी यह साफ़ नज़र  आया कि भाजपा के वरिष्ठ नेता संघ से दूरी बना कर चल रहे हैं। ग़ौरतलब है कि इस बैठक में लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली शरीक नहीं हुए थे, जबकि पार्टी अध्यक्ष गडकरी थे। संघ की चिंता है कि अयोध्या मामले को लेकर पार्टी में कोई सर्वमान्य नेता नहीं है और मध्यप्रदेश तथा कर्नाटक तथा छत्तीसगढ़ में मंत्रियों के भ्रष्ट आचरण ने उसकी छवि शामिल की है। ऐसे में अन्य राज्यों में सत्ता पाना तो नामुमकिन होगा ही, साथ ही जहां सत्ता है, उसे बचाए रखना भी मुश्किल होगा। ज़ाहिर है कि पार्टी में मची अंतरकलह और भाजपा नेताओं का भ्रष्ट आचरण उसके भविष्य के लिए सुखद संकेत नहीं है।

 

 

? महेश बागी