संस्करण: 04 अक्टूबर-2010

आम सहमति से ही देश की उलझनपूर समस्याओं का हल होना चाहिए

 ? एल.एस.हरदेनिया

                       

      तीन महीने के अंतराल के बाद कश्मीर में शिक्षण संस्थाओं का फिर से खुलना और अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों को वहां भेजना एक शुभ संदेश है। अभिभावकों द्वारा पृथकतावादियों के आव्हान की उपेक्षा कर बच्चों को शिक्षण संस्थाओं में पढ़ने के लिए भेजना इस बात का संकेत है कि कश्मीर की जनता शांति चाहती है, व्यवस्था चाहती है। कश्मीर की जनता जानती है, इस बात में विश्वास करती है कि उसका भविष्य भारत में बने रहने में ही है। उसे मालूम है कि पाकिस्तान का हिस्सा बनने का अर्थ है कि एक अराजक, अनुशासनहीन, अमरीका के गुलाम देश का हिस्सा बनना। क्या कश्मीर की जनता से यह बात छिपी है कि सन् 1947 में देश विभाजन के दौरान जो मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गये थे उनके साथ आज भी दोयम दर्जे के नागरिक का व्यवहार किया जाता है, उन्हें वे सारे अधिकार प्राप्त नहीं है जो पाकिस्तान के मूल निवासियों को प्राप्त हैं। पाकिस्तान में सत्ता की लगाम आज भी सिर्फ पंजाबियो के हाथ में है। पंजाबियो का सत्ता के सभी अंगो पर नियंत्रण तो है ही, वहां की फौज पर भी उनका कब्जा है। पंजाबी, पाकिस्तान के बाकी लोगों के साथ गुलाम जैसा व्यवहार करते हैं। क्या कश्मीर के पाकिस्तान परस्त नेता, सभी कश्मीरियों को पाकिस्तानी नरक में भेजना चाहते हैं? भारत सरकार को चाहिए कि पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति से कश्मीर की जनता को अवगत कराये। फ़िल्मों व टी.वी. चैनलों के माध्यम से कश्मीर के आम लोगों को पाकिस्तान की वास्तविक स्थिति से परिचित कराया जाना चाहिए। पाकिस्तान परस्त नेता सिर्फ इसलिए कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाना चाहते हैं क्योंकि वे मुसलमान हैं और पाकिस्तान एक मुस्लिम देश है। यदि सिर्फ धर्म के आधार पर बने देश पुख्ता नींव पर खडे रहते तो पाकिस्तान क्यों टूटता? बांग्लादेश, पाकिस्तान से इसलिए अलग हुआ क्योंकि पश्चिमी पाकिस्तान के शासकों ने उर्दू को और वहां की संस्कृति को बांग्लादेश पर लादने की कोशिश की। यदि कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बनता है तो ऐसी बदसलूकी कश्मीरियों के साथ भी की जायेगी। कश्मीर की अपनी संस्कृति, अपनी भाषा है व एक गौरवशाली इतिहास है। कश्मीर के निवासियों ने आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया था, उन्होंने जिन्ना की सांप्रदायिक राजनीति को ठुकराया था, कश्मीरियों के नेता शेख अब्दुल्ला एक धर्मनिरपेक्ष, उच्च आदर्शवादी नेता थे, जिन्होंने जिन्ना को अपनी बात कहने के लिए कश्मीर में घुसने तक नहीं दिया था। कश्मीर की जनता ने अपने महाराजा हरिसिंह के कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र बनाये रखने के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया था और भारत का हिस्सा बनने के लिए सहमति दी थी। भारत सरकार के प्रचार तंत्र को चाहिए कि वह कश्मीर के इस गौरवशाली इतिहास से वहां के नौजवानों को परिचित कराये। यदि ऐसा किया जाता है तो ये युवक पुलिस के स्थान पर पाकिस्तान-परस्त नेताओं पर पत्थर फेंकेगे।

          कुछ ऐसे नेता भी हैं जो कश्मीर को पृथक देश के रूप में देखना चाहते हैं। नेताओं के इस समूह को पृथकतावादी कहा जाता है। इन पृथकतावादी नेताओं को भी यह समझना चाहिए कि कश्मीर पृथक देश के रूप में एक क्षण भी जिन्दा नहीं रह सकेगा। पृथक कश्मीर को एक नहीं अनेक देशों का गुलाम बनकर रहना पडेग़ा। सबसे पहिले अमरीका उसे अपना अड्डा बनायेगा। कुल मिलाकर, कश्मीरियों का भला न तो पाकिस्तान से मिलने में है व न ही स्वतंत्र देश बनने में।

         जहां हम कश्मीर के पाकिस्तान में शामिल होने या आजाद देश बनने के विरोधी हैं वहीं हमारी मान्यता है कि कश्मीर की समस्या का हल बातचीत में है। कश्मीर पर से बंदूको का साया हटाया जाए व न तो सेना और न ही पुलिस वहां के आम आदमी को परेशान करे। यदि कुछ नौजवान पत्थर फेंक रहे थे तो उन्हें फेंकने देना था। वे कब तक पत्थर फेंकते। वे पत्थर ही फेंक रहे थे। गोलियां तो नहीं चला रहे थे। नक्सलियों के समान कश्मीर के युवकों ने बन्दुकों का सहारा तो नहीं लिया है। सांसदो के एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की हालिया कश्मीर यात्रा का जादुई प्रभाव हुआ। जब कश्मीरियों ने देखा  कि हमारी समस्या को हल करने में देश की सभी पार्टियाँ हिस्सा ले रही हैं तो उनपर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा और उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल-कालेज भेजना शुरू कर दिया। कश्मीर की स्थिति में आये इस परिवर्तन से यह सिध्द हो जाता है कि देश में यदि प्रतिद्ववंदिता की जगह सहयोग व आम सहमति की राजनीति हो तो गंभीर से गंभीर समस्या का हल ढूँढा जा सकता है। सर्वदलीय संसदीय शिष्ट मंडल के साथ जो रचनात्मक पहल प्रारंभ हुई है उसे जारी रखा जाना चाहिए। इस संदर्भ में संवाद जारी रखने के लिए मध्यस्थां की टीम बनाने का प्रस्ताव स्वागतयोग्य है।

         मेरा सुझाव है कि इस तरह के मिले जुले प्रयास अन्य उलझनपूर्ण समस्याओं को सुलझाने के लिए भी किये जाना चाहिए। जैसे, राम मंदिर विवाद भी इसी तरीके से सुलझाने का प्रयास होना चाहिए। इस समय राम मंदिर विवाद को लेकर सभी की निगाहें अदालत पर हैं। परंतु इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि अदालत का निर्णय सभी को मान्य नहीं होगा। जहां एक ओर मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्थाओं ने घोषणा की है कि वे अदालत का जो भी निर्णय होगा वह उन्हें मंजूर होगा वही हिन्दुओं की कुछ संस्थाओं का कहना है कि राम मंदिर का संबंधा आस्था से है अत: यह जरूरी नहीं है कि हम अदालत के फैसले को मानें ही। इस तरह के तर्क देने वालों में सबसे आगे हैं विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल। वैसे इस बारे  में संघ परिवार विभाजित  है। जहां विश्व हिन्दू परिषद कह रही है कि यह जरूरी नहीं है कि मंदिर के मामले में अदालत का निर्णय माना जाए वहीं कुछ और संगठन मानते हैं कि समस्या का हल, संसद द्वारा पारित कानून से ही हो सकता है। यह आश्चर्य की बात है कि जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में थी उस समय क्यों ऐसा कानून नहीं बनाया गया। यदि अब समस्या का हल कानून है तो उस समय भी तो समस्या का हल कानून हो सकता था। परंतु जब भाजपा सत्ता में होती है तो संघ परिवार मंदिर समस्या को ठंडे बस्ते मे डाल देता है। अपने 6 साल के कार्यकाल में भाजपा ने उस नारे को अमली जामा पहिनाने का रत्ती भर प्रयास नहीं किया जिसके बल पर वह सत्ता में आई थी। भाजपा ने धारा 370, समान नागरिक संहिता एवं राम मंदिर का मामला ताले में बंद कर दिया था। यह कहते हुए कि जब हम (भाजपा) अपनी दम पर सत्ता में आयेंगे उस समय इन तीनों मुद्दों को हल करेंगे। चूंकि ऐसा दिन कभी नहीं आयेगा इसलिए उनका तर्क है कि हमारे द्वारा पैदा की गई समस्या का हल हम नहीं ढूँढेगे। इन्हें हल करने जिम्मेदारी आपकी (कांग्रेस) है। परंतु मेरी राय है कि इस तरह ही उलझनपूर्ण समस्याओं का हल मिल जुलकर आम सहमति से ही किया जाय। इसलिए जो पहल कश्मीर के मामले में हुई है उसी तरह की पहल राममंदिर-बाबरी मस्जिद के मामले से में भी होनी चाहिए।

 ? एल.एस.हरदेनिया