संस्करण: 04 मार्च-2013

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मोदी की सोशल इंजिनीयरिंग :

मिथक एवम यथार्थ

       स्पृश्यता की प्रणाली हिन्दुओं के लिए सोने की खान है। इस व्यवस्था के तहत 24 करोड़ हिन्दुओं का मैला ढोने और सफाई करने के लिए 6 करोड अस्पृश्यों को तैनात किया जाता है, जिन्हें ऐसा गन्दा काम करने से उनका धर्म रोकता है। मगर चूंकि यह गन्दा काम किया ही जाना है और फिर उसके लिए अस्पृश्यों से बेहतर कौन होगा ?

              - डा अम्बेडकर

?    सुभाष गाताड़े


अगर बीजेपी ने मोदी को प्रधानमंत्री

पद का दावेदार बनाया तो अलग थलग पड़ जायेगी

       कांग्रेस के जयपुर चिंतन शिविर में जब राहुल गाधी को पार्टी का उपाध्यक्ष  बनाया गया तो हर रंग के कांग्रेसी ने उनको प्रधान मंत्री बनाने की राग में बात करना शुरू कर दिया । हद तो तब हो गयी जब उसी मंच पर मौजूद प्रधानमंत्री ड मनमोहन सिंह की मौजूदगी की परवाह न करते हुए कांग्रेसियों ने राहुल गाधी को प्रधान मंत्री बनाने की मांग करते हुए नारे लगाना शुरू कर दिया । ऐसा माहौल बन गया कि लगने लगा कि अब कांग्रेस का एक सूत्री कार्यक्रम राहुल गाधी को प्रधानमंत्री बनाना ही रह गया है।

? शेष नारायण सिंह


एनसीटीसी पर भाजपा की

दोहरी नीति या डर?

       तंकी हमलों से लेकर व्यापारिक गतिविधियों तक ऐसा कोई क्षेत्र नहीं दिखाई देता जहां भारतीय जनता पार्टी एक मत पर अडिग दिखाई देती हो। यह अच्छे विपक्ष की निशानी नहीं है। विपक्ष समानांतर सत्ता का केंद्र होता है, जो सरकार के कामकाज पर नजर रखता है, जिसकी देश के प्रति उतनी ही जिम्मेदार बनती है जितनी कि सत्ता पक्ष की। लेकिन भारतीय जनता पार्टी अपने इस दायित्व से दूर, सत्ता कैसे हासिल की जाए इस प्रयास में लगी रहती है। और यह प्रयास उसे प्रेरित करता है कि वह झूठा सच्चा जैसा भी हो सरकार का विरोध करे, ताकि सरकार के खिलाफ नकारात्मक माहौल पैदा हो और उसका लाभ उठाया जाए।

? विवेकानंद


सान्ता क्लाज़ को मात कर रहे हैं शिवराज

         ध्यप्रदेश के ''घोषणावीर'' मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इन दिनों बहुत जल्दी में दिख रहे हैं। उनकी घोषणाएं करने की गति में अप्रत्याशित तेजी आई है। वे सरकारी खजाने को लुटाने के अपने अभियान में प्राणपण से जुट गए हैं। वे जानते हैं कि कुछ ही माह बाद प्रदेश में आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हो जाएगी और उसके बाद उनके हाथ बां जावेंगे।  

? एलएसहरदेनिया


कितने युवाओं की बलियां और लेगा यह समाज

      मैंने अपने एक परिचित के पारिवारिक मामले में दखल देते हुए उसकी बेटी की शादी ऐसे परिवार में करवायी थी जो उनकी जाति के ही थे पर गोत्र में छोटे माने जाते थे। शादी के लगभग दो साल बाद जब उनके घर जाने का संयोग निकला तो स्वाभाविक रूप से बेटी की कुशलता भी पूछी। उन्होंने गम्भीर होकर कहा कि लड़की का ससुराल उनकी तुलना में कई गुना सम्पन्न है, कोठी है गाड़ियां हैं अच्छा व्यापार है और घर में सामंजस्य है पर शादी के बाद उन्होंने एक बार भी बेटी को उनके घर नहीं भेजा।

 ?   वीरेन्द्र जैन


अब क्यों याद आया ओवरब्रिज बनाना?

                  विश्व प्रसिद्ध सांची के पास ही है गुलाबगंज रेल्वे स्टेशन। जहां पटरी पार कर रहे दो बच्चों की ट्रेन से कटने से मौत के बाद आक्रोशित भीड़ ने रेल्वे स्टेशन में आग लगा दी। रेल्वे की सम्पत्ति को नुकसान पहुंचायायही नहीं स्टेशन मास्टर को भी जिंदा जला दिया। एक गेंगमेन भी मारा गया। इसके बाद तो रेल्वे कर्मचारी भी आगे आ गए। वे भी वही सब करने लगे, जो भीड़ ने किया। टे्रनें घंटों लेट हो गई। इतना सब कुछ होने के बाद वहां की सांसद सुषमा स्वराज को याद आया कि उनके क्षेत्र के उस रेल्वे स्टेशन में ओवरब्रिज नहीं है और लोग ऐसे ही पटरी पार करते हैं। 

? डॉ महेश परिमल


दुर्गुणों से दूर रहता है,

आस्थावान व्यक्ति

      र्तमान सदी में मनुष्य जितना भ्रम और भ्रांति द्वापर और कलयुग इन चारों युगों में प्रेम, आस्था, श्रद्धा विश्वास और परम्परा सम्मान की भावनाऐं, मानव चरित्र की विशेषताओं को परिभाषित करती रही हैं। मनुष्य के हृदय की भावनाऐं उसके जीवन में आत्मबल और नैतिकता का संचार करती हैं,वहीं उसके कोमल स्वभाव की विशेषताओं से परिचय भी कराती हैं। कतिपय विचारों के बावजूद मानव हृदय में परस्पर विश्वास और आस्था के भाव उसकी जीवनशैली में मूर्त और अमूर्त रूप में विद्यमान रहते हैं।

? राजेन्द्र जोशी


इस्लामी कट्टरवाद बनाम बंगाली राष्ट्रवाद

शाहबाग ने की इतिहास दुरुस्त करने की मांग

      ढाका के शाहबाग चौक पर पिछले 8 फरवरी को उदारवादी मुसलमानों और कट्टरपंथी इस्लामी तत्वों के बीच जो टकराव हुआ उसका परिणाम चाहे जो भी हो, वह सिर्फ बांग्लादेश की सीमा तक सीमित नहीं रह सकता।

               यदि उदारवादी जीतते हैं तो चार दषक पुराने गणतंत्र की आशा पूरा होने में सफलता हासिल होगी और बांग्लादेश एक आधुनिक सेकुलर देश के रूप में उभरेगा और एशिया व अन्य देशों खासकर इस्लामी देशों पर इसका अच्छा असर होगा।

? अमूल्य गांगुली


प्राथमिक शिक्षा और

राज्यों का असहयोग

        रबों रुपया खर्च करने के बावजूद प्राथमिक शिक्षा की हालत जस की तस बनी हुई है। इसमें आमूल चूल परिवर्तन के उद्देश्य से एक दशक पहले केन्द्र सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान नामक एक अभूतपूर्व योजना शुरु की थी जिसके लक्ष्य में 'सब पढ़ें, सब बढ़ें' के ध्येय वाक्य शामिल था। केन्द्र और राज्यों की सहभागिता के आधार पर चलने वाली यह योजना असल में प्राथमिक शिक्षा के लिए कंक्रीट के जंगल खड़ा करने के खेल में ग्राम प्रधान व अध्यापकों की कमीशनखोरी का साधन बनकर रह गई। शिक्षा, महज बढ़िया भवन और अच्छे साधनों से नहीं मिलती। उसके लिए समर्पित और सामर्थ्यवान शिक्षकों की प्राथमिक आवश्यकता होती है।

? सुनील अमर


मध्यप्रदेश में कुपोषण का कहर

       विकास और सुशासन के दावों के बीच मध्यप्रदेश में कुपोषण का कहर चरम पर है। जबकि प्रदेश भर के बालक-बालिकाओं के मुंहबोले मामा बने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सार्वजनिक मंचों पर बच्चों को गोद में लेकर दावा करते हैं, कि इनकी सेहत, शिक्षा, विवाह और रोजगार की गांरटी इस मामा पर है। ये दावे थोथे इसलिए हैं, क्योंकि सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कुपोषण से एक साल के भीतर मरने वाले बच्चों की जो जानकारी विधानसभा ने दी है, उतने बच्चे किसी और प्रदेश में कुपोषण के कहर से अकाल मौत की गोद में नहीं सोए हैं।    

? प्रमोद भार्गव


8 मार्च विश्व महिला दिवस पर विशेष

नारी-अस्मिता : समूची दुनिया में हाशिए पर

        प्रदेश में बीते दिनों हुई बेमौसम की बरसात किसानों पर कहर बनकर टूटी है। तेज बारिश के साथ कई जगह ओलावृष्टि होने से फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है। ग्वालियर-चंबल, जबलपुर, इंदौर, होशंगाबाद और भोपाल आदि संभागों के कई जिलों में अतिवृष्टि और ओलों ने तबाही मचाकर रख दी। खेतों में लहलहा रही फसल किसानों के देखते-देखते उनकी आंखों के सामने ही बिछ गई। हालत यह है कि कई जिलों में रबी सीजन की प्रमुख फसल गेंहू, चना, मटर, सरसों, धनिया, मक्का, मिर्च आदि को ओलों ने खासा नुकसान पहुंचाया है।

? डॉ ग़ीता गुप्त


आपदाग्रस्त किसानों को मिले कर्जमुक्ति उपहार है

       केंद्र सरकार ने किसानों की बेहतरी के लिए 2009 में 74 हजार करोड़ रूपये की कर्जमाफी की सौगात दी थी। तथा केंन्द्र सरकार ने राष्ट्रीयकृत बैंकों,नाबार्ड तथा सहकारी बैंकों के मायम से कृषि ऋण आवंटन की सीमा भी कई गुना बढ़ाई है। वर्ष 2000 की तुलना वर्ष 2012 में यह 755 फीसदी तक बढ़ गई है।किसानों को जीरो फीसदी से लेकर चार फीसदी ब्याज दर पर ऋण उपलब कराने का भी प्रावधान किया है। लेकिन इसका लघु और सीमांत किसान कितना फायदा ले पा रहें हैं यह विचारणीय है।    

? डॉ सुनील शर्मा


  04 मार्च-2013

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