संस्करण: 04 मार्च-2013

प्राथमिक शिक्षा और

राज्यों का असहयोग

? सुनील अमर

                रबों रुपया खर्च करने के बावजूद प्राथमिक शिक्षा की हालत जस की तस बनी हुई है। इसमें आमूल चूल परिवर्तन के उद्देश्य से एक दशक पहले केन्द्र सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान नामक एक अभूतपूर्व योजना शुरु की थी जिसके लक्ष्य में 'सब पढ़ें, सब बढ़ें' के ध्येय वाक्य शामिल था। केन्द्र और राज्यों की सहभागिता के आधार पर चलने वाली यह योजना असल में प्राथमिक शिक्षा के लिए कंक्रीट के जंगल खड़ा करने के खेल में ग्राम प्रधान व अध्यापकों की कमीशनखोरी का साधन बनकर रह गई। शिक्षा, महज बढ़िया भवन और अच्छे साधनों से नहीं मिलती। उसके लिए समर्पित और सामर्थ्यवान शिक्षकों की प्राथमिक आवश्यकता होती है। अफसोस की बात है कि इस मुद्दे पर राज्य सरकारें एकदम उदासीन हैं। सरकारी रपटों ने ही सरकार की विफलता और उदासीनता का खाका खींचा है। एक रपट बताती है कि देश के 20 प्रतिशत स्कूलों में शौच तक का पानी मयस्सर नहीं है, पीने का पानी तो दूर की बात है! जो बात सबसे ज्यादा विस्मय पैदा करती है वह ये है कि धन उपलब्ध होने के बावजूद ये विद्यालय सुविधाओं से वंचित हैं। देश में करोड़ों युवा बेरोजगार हैं और शिक्षकों के तेरह लाख से अधिक पद भी रिक्त हैं फिर भी नियुक्तियाँ नहीं हो पा रही हैं।

                   केन्द्र बहुत सी ऐसी योजनाऐं लागू करता है जिनमें एक निश्चित अनुपात में राज्यों की भागीदारी होती है। सर्व शिक्षा अभियान में राज्यों की वैसी ही भागीदारी है जैसे मनरेगा में है। केन्द्र सरकार की संस्था राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसांधन और प्रशिक्षण परिषद (एनसीअारटी) क़े आठवें ऑल इन्डिया एजुकेशनल सर्वे की रपट बताती है कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित प्राथमिक स्कूलों की हालत बहुत ज्यादा खराब है। कुल 13,06,992 स्कूलों में सर्वेक्षण किया गया जिसमें 85 प्रतिशत से अधिक स्कूल ग्रामीण क्षेत्र से थे। इससे यह निष्कर्ष निकला कि 40 प्रतिशत स्कूलों में महज दो शिक्षक हैं तो 20 प्रतिशत स्कूलों में पानी ही नहीं है। देश के आो से अधिक स्कूलों में खेलकूद का मैदान तक नहीं है। सिर्फ दो राज्य अरुणाचल और पुडुचेरी ही ऐसे हैं जहाँ सारे विद्यालयों में सब सुविधायें हैं। यह सारी विसंगतियॉ तब हैं जब सर्व शिक्षा अभियान के तहत बनाये जाने वाले स्कूल भवनों का मानक तय हैं, भवन निर्माण ग्राम प्रधान और अध्यापक कराते हैं और मानक के अनुरुप निर्माण न किये जाने पर संबनित अध्यापक को दंडित किये जाने का प्राविधान है। प्राथमिक विद्यालयों में अध्यापकों की कमी एक द्विअर्थी समस्या है। इसमें कोई शक नहीं कि अध्यापक कम हैं लेकिन ये भी सच है कि प्राय: प्रत्येक विद्यालय में पंजीकृत छात्र संख्या भी आधो से अधिक फर्जी होती है। छात्र-अध्यापक अनुपात अगर सख्ती से लागू किया जाय तो जो दो अयापक तैनात बताये जा रहे हैं वो भी ज्यादा ही होंगें क्योंकि विद्यालयों में छात्र हैं ही नहीं। प्राथमिक विद्यालयों में प्राय: निकटवर्ती क्षेत्र के अध्यापक अपनी नियुक्ति करवा लेते हैं। वे विद्यालय से स्थानांतरण नहीं चाहते इसलिए फर्जी छात्र संख्या दिखाकर अपनी नियुक्ति को बनाये रखते हैं। दूसरे, छात्र संख्या के आधार पर ही दोपहर का भोजन बनता है। इसमें प्रति छात्र के हिसाब से पैसा मिलता है। अधिकतम छात्र संख्या पर अधिकतम सरकारी ऱन मिलता है जिसकी बंदरबॉट हो जाती है।

                संसद के पिछले सत्र में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री शशि थरुर ने एक प्रश्न के उत्तर में बताया था कि देश में शिक्षकों के कुल तेरह लाख पद रिक्त हैं जिसमें सात लाख तेरह हजार पद सर्व शिक्षा अभियान के तहत रिक्त हैं जिन्हें केन्द्र सरकार के मानकों के अनुसार विभिन्न राज्यों में भरा जाना है। ये पद कैस भरे जा रहे हैं इसका सबसे सटीक उदाहरण उत्तर प्रदेश है जहॉ कुल 90 हजार पद भरे जाने हैं और वर्ष 2011 से शिक्षा के अधिकार की धारा 25(1) के तहत अध्यापक पात्रता परीक्षा, जिसे प्राय: टीर्ऌटी क़े नाम से जाना जाता है, चल रही है किन्तु यह आलेख लिखे जाने तक एक भी अयापक की भर्ती नहीं की जा सकी है। इसमें तमाम बंधों-उपबंधों की वौता को लेकर मामला उच्च न्यायालय में चला गया है। उत्तर प्रदेश में ऐसा ही बीटीसी क़ी प्रवेश परीक्षा को लेकर भी वर्ष 2002 से हो रहा था जिसमें जाने कितनी बार अभ्यर्थियों ने सशुल्क आवेदन किया, तो परीक्षा ही नहीं हुई और परीक्षा दी तो  परिणाम नहीं आया और न ही अभ्यर्थियों का धन वापस किया गया। अभी कुछ वर्ष पहले उच्च न्यायालय ने ऐसे ही एक मामले को निस्तारित किया तो बीटीसी क़ी प्रवेश परीक्षा और पढ़ाई पटरी पर आयी।

                देश में शिक्षा का अधिकार कानून वर्ष 2009 से ही लागू हो चुका है जिसके तहत छह वर्ष से लेकर 14 वर्ष तक का प्रत्येक बच्चा नि:शुल्क शिक्षा पाने का अधिकारी है। इसके लिए भवन व अध्यापक नियुक्ति हेतु वांछित धन की व्यवस्था केन्द्र सरकार ने कर दी है लेकिन राज्य सरकारों का रवैया इसमें बधाक है। असल में जिस तरह की तैयारी ऐसे अभियानों के पूर्व की जानी चाहिए वैसा कुछ सम्बनित सरकारी विभाग तो करते नहीं। आनन फानन में योजना शुरु कर दी जाती है, फिर जैसे-जैसे समस्या सामने आती है, उसके निराकरण का प्रयास किया जाता है। इससे देरी होती है। बार-बार व्यवस्था बदलने से तमाम लोगों को अदालतों में जाने का मौका मिल जाता है। टीर्ऌटी में यही हो रहा है। टीर्ऌटी एक योग्यता प्रदायी प्रवेश परीक्षा है। इसमें चयनित होने वालों को शिक्षा के अधिकार की धारा 23(2) के तहत राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद यानी एनसीटीर्ऌ प्रशिक्षित करेगा।

                 केन्द्रीय योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकारों का सहयोग बहुत जरुरी होता है। मनरेगा एक बहुचर्चित और उपयोगी योजना है लेकिन अधिकांश राज्यों ने इसे आधो-आधूरे मन से ही लागू किया है। ऑकडे बताते हैं कि इस योजना में अब तक एक लाख दस हजार करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं। इतनी विशाल राशि से तो देश के श्रमिक वर्ग की हालत सुधर जानी चाहिए थी लेकिन हालत बहुत ज्यादा नहीं बदले हैं। राज्यों का असहयोग ऐसा रहता है कि पैसा खाते में पड़ा-पड़ा वापस हो जाता है लेकिन उसे योजनाओं पर खर्च नहीं किया जाता। देश में बेरोजगारों की भरमार है और लाखों पद वर्षो से खाली पड़े हैं लेकिन राज्य सरकारों की स्वेच्छाचारिता है कि वे भरे नहीं जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में लगभग 90 हजार शिक्षकों के रिक्त पद के लिए चार लाख अभ्यर्थियों ने योग्यता परीक्षा उत्तीर्ण की है तो शिक्षित बेरोजगारों की हालत का अनुमान लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश मे तो सरकारी चिकित्सकों के ही 17,000 पद रिक्त हैं! यही हाल अन्य सरकारी विभागों का है। विभागों में धन है, रिक्तियाँ हैं, बेशुमार बेरोजगार हैं लेकिन भर्ती नहीं की जा रही है।

               देश में सरकारी प्राथमिक शिक्षा की हालत किस तरह रसातल को जा चुकी है, इस पर गत वर्ष 'असरा नामक संस्था की एक रिपोर्ट आयी थी जिसमें एक व्यापक सर्वेक्षण के बाद बताया गया था कि तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले साढ़े आठ प्रतिशत बच्चों को अक्षर ज्ञान ही नहीं था, साठ प्रतिशत बच्चों को जोड़ना-घटाना नहीं आता था और 27 प्रतिशत बच्चों को गिनती ही नहीं आती थी! कितनी भयावह तस्वीर है यह! और यह तस्वीर देश के 75 प्रतिशत आबादी की है। ऐसी आबादी को लेकर हम किस तरह सर्वांगीण विकास कर सकेंगें, यह सोचा जाना चाहिए।

? सुनील अमर