संस्करण: 04 मार्च-2013

इस्लामी कट्टरवाद बनाम बंगाली राष्ट्रवाद

शाहबाग ने की इतिहास दुरुस्त करने की मांग

?  अमूल्य गांगुली

               ढाका के शाहबाग चौक पर पिछले 8 फरवरी को उदारवादी मुसलमानों और कट्टरपंथी इस्लामी तत्वों के बीच जो टकराव हुआ उसका परिणाम चाहे जो भी हो, वह सिर्फ बांग्लादेश की सीमा तक सीमित नहीं रह सकता।

               यदि उदारवादी जीतते हैं तो चार दषक पुराने गणतंत्र की आशा पूरा होने में सफलता हासिल होगी और बांग्लादेश एक आधुनिक सेकुलर देश के रूप में उभरेगा और एशिया व अन्य देशों खासकर इस्लामी देशों पर इसका अच्छा असर होगा। लेकिन यदि इस्लामी कट्टरवादी तत्व जीतते हैं तो बांग्लादेश मययुगीन आंकार में एक बार फिर वापस चला जाएगा, जहां महिलाओं को घरों के अंदर तक ही सीमित रहना होगा और विज्ञान व कला को नकार दिया जाएगा।

               गौरतलब है कि यह सिर्फ प्रगतिशील और कठमुल्लावादी तत्वों के बीच संघर्श का मामला नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की प्रचलित मान्यताओं और सांस्कृतिक मूल्यों की फिर से वापसी और उनके संरक्षण का मामला है। ये मूल्य बांग्लादेश और भारत के बंगालियों को जोड़ने वाले हैं। 1955 में पाकिस्तान की संविधान सभा में बोलते हुए शेख मुजीबुर्रहमान ने कहा था कि ''पश्चिम पाकिस्तान'' की जगह इसे बंगाल कहा जाए, क्योंकि बंगाल का एक अपना अलग इतिहास और अपनी खास परंपराएं हैं।

               शाहबाग में उदार और प्रगतिशील मुसलमानों की भीड़ देखने लायक थी। वह अपने आप वहां आई थी और सबकुछ स्वत:स्फूर्त था। उनपर मुस्लिम कठमुल्लावादी तत्वों खासकर जमात के समर्थकों का हमला भी हुआ था। जाहिर है जमात के लोग उस उमड़ रही भीड़ को देखकर डर गए थे और उसके कारण ही वे हिंसा पर उतारू हो गए। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि उस टकराव का क्या परिणाम होगा। इसका कारण यह है कि इस टकराव के पीछे 4 दशक पुरानी घटनाओं की छाया है। वह समय बांग्लादेश का इतिहास का काला अयाय है, जब पाकिस्तान की सेना और कठमुल्लावादी तत्वों ने वहां के लोगों पर भारी जुल्म और सितम ढाए थे।

                  यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि बांग्लादेश की मुक्ति के बावजूदए जमात न सिर्फ पहला दौर जीतने में सफल रहा, बल्कि वह पिछले 4 दशकों से वहां अपने आपको जिंदा रख पाने में भी सफल रहा है। यदि उसे करारी मात नहीं मिली, तो वह आने वाले दिनों में भी अपना वजूद कायम रखेगा। यह सबको पता है कि जमात की वहां लगातार उपस्थिति इसलिए बनी हुई है, क्योंकि उसे बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का समर्थन हासिल है। यह पार्टी मुजीब की अवामी लीग की विरोधी पार्टी है।

                 इन दो संगठनों का अस्तित्व इसलिए संभव हो पाया कि बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम अपने असली मुकाम तक नहीं पहुंच पाया। बांग्लादेश के गठन के कुछ ही साल के अंदर मुजीब रहमान की हत्या कर दी गई और उसका एक असर यह हुआ कि बांग्लादेश के जिन तत्वों ने पाकिस्तानी सेना के द्वारा किए गए अपराध में उनका साथ दिया था, वे सजा पाने से बचे रहे।

               एक न्यायिक प्राधिकरण ने बहुत ही विलंबित फैसले में जमात के अब्दुल कादर मुल्ला, जिसे कसाई के नाम से भी जाना जाता है, उम्र कैद की सजा सुना दी। मुल्ला ने 1971 में लोगों के खिलाफ भयंकर अपराध किया था। उस उम्रकैद की सजा के बाद सोशल साइट्स पर बांग्लादेश के लोगों की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। लोग मुल्ला की फांसी चाहते थे। जाहिर है उसे मिली उम्र कैद की सजा से वह बहुत ही नाखुश और असंतुष्ट थे। फिर क्यथा, इंटरनेट पर ही एक दूसरे को बताकर वे षाहबाग चौक पर जुटने लगे और मुल्ला को फांसी दिए जाने की मांग करने लगे। धीरे धीरे उनकी भीड़ वहां बढ़ने लगी। यदि उनका प्रदर्शन शांतिपूर्वक चलने दिया जाता, तो भीड़ के और भी ज्यादा बढ़ने की आशंका थी, इसलिए जमात के कुछ तत्वों ने प्रदर्शनकारियों पर हमला कर दिया और उसके बाद वहां दुतरफा टकराव होने लगे। प्रदर्शनकारियों का गुस्सा एक ब्लॉगर अहमद राजीब हालदर की हत्या किए जाने के कारण भी बढ़ रहा था।

              जमात के खिलाफ लोग क्यों इतने उबल रहे हैं, इसे समझने के लिए पाकिस्तानी सेना के सेवानिवृत मेजर जनरल खादिम रजा की पुस्तक के कुछ अंश देखना जरूरी है, जिसे ब्लॉगर हालदर से सोशल साइट्स पर डाला था। रजा लिखते हैं कि 1971 में मार्शल लॉ प्रशासक बनाए जाने के बाद लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने कहा था कि '' मैं इस हरामजादी कौम की नसल बदल डालूंगा।'' उन्होंने धमकी दी थी कि वे सेना के जवानों को महिलाओं के बलात्कार के खुले आदेश जारी कर देंगे। ये सब बातें उन्होंने मेजर जनरल खादिम रजा और अन्य सैन्य अधिकारियो को संबोधित करते हुए की थी। यहां यह जानना जरूरी है कि खादिम रजा खुद भी बंगाली थे।

                 रजा अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि नियाजी के उस कथन के बाद वहां भयंकर खामोशी छा गई थी और उस फूहड़ बात पर लोग एक दूसरे का मुंह देखने लगे थे। फिर बैठक समाप्त हो गई थी मेजर मुश्ताक नाम का एक बंगाली अधिकारी उसके बाद बाथरूम में गया और वहां उसने खुद को गोली मार डाली। वह वहीं मर गया।  

 
? अमूल्य गांगुली