संस्करण: 04 मार्च-2013

दुर्गुणों से दूर रहता है,

आस्थावान व्यक्ति

?  राजेन्द्र जोशी

              र्तमान सदी में मनुष्य जितना भ्रम और भ्रांति द्वापर और कलयुग इन चारों युगों में प्रेम, आस्था, श्रद्धा विश्वास और परम्परा सम्मान की भावनाऐं, मानव चरित्र की विशेषताओं को परिभाषित करती रही हैं। मनुष्य के हृदय की भावनाऐं उसके जीवन में आत्मबल और नैतिकता का संचार करती हैं,वहीं उसके कोमल स्वभाव की विशेषताओं से परिचय भी कराती हैं। कतिपय विचारों के बावजूद मानव हृदय में परस्पर विश्वास और आस्था के भाव उसकी जीवनशैली में मूर्त और अमूर्त रूप में विद्यमान रहते हैं।

                आस्था के भावों की मौजूदगी अनेक दुर्गुणों से मनुष्य को दूर रखती है। आस्थावान व्यक्ति अपने जीवन के मार्ग में किसी व्यवधान का अनुभव नहीं करता है। शालीनता, शिष्टता और उसके आचार व्यवहार की धवलता सदैव बेदाग रहती हैं, जिससे उसकी आत्मा अशुद्ध नहीं रह पाती। अपने ईष्ट के प्रति प्रेम, आस्था रखने वालों के ऐसे अनेक उदाहरण तो देखने में मिलते हैं, जिन्हें अपने सद्कर्मों और सद्गुणों से समाज में उपलबिधयां अर्जित की हैं। इस दिशा में अनेक महापुरुषों, समाजसेवियों और पुण्यात्माओं के नाम गिनाये जा सकते है जिन्होंने अपने अपने हृदय में आस्था के भावों को महत्व दिया।

               प्रेम, दया, करुणा, सहयोग और सहानुभूति जैसे भावों के प्रदर्शन से इंसान मानवता की ऊंचाई को छू लेता है और आस्था के भावों की उपस्थिति से वह मानवता की गहराई से परिचित करा देता है। कोई भी व्यक्ति या कोई भी समाज यदि आस्थावान नहीं है तो उसके अस्तित्व में शून्यता का बोध होने लगता है। इसीलिए यह आवश्यक है कि जिस क्षेत्र में भी जीवन को आधार मिलता है, उस क्षेत्र के प्रति और उसके महत्व के प्रति अनास्था का भाव नहीं पनपना चाहिए। कला, संस्कृति का क्षेत्र हो, व्यवसाय या  किसी तरह की सेवा का ही क्षेत्र क्यों न हो, उस क्षेत्र के प्रति जब तक आस्था  नहीं होगी, व्यक्ति को उसमें सफलता मिलने में संदेह ही बना रहता है। अपने ईष्ट के प्रति श्रद्धा रखते हुए उसके प्रति भक्ति के भावों के प्रदर्शन का महत्व तब और अधिक बढ़ जाता है जब उसमें आस्था की प्रधानता होती है। अपने अपने धर्मों, जातियों, संप्रदायों और वर्गों के प्रति आस्था प्रकट करते रहने के साथ ही मानव स्वभाव है कि वह ईश्वर और अपने अपने धर्मगुरुओं के प्रति श्रद्धा, भक्ति और आस्था के भावों का प्रदर्शन कर अपनी सामाजिकता का बोध कराता रहता है।

               विश्वभर में विभिन्न धर्मों और संप्रदायों का अस्तित्व ही इस बात का प्रतीक है कि प्रेम, दया, करुणा, सहानुभूति के साथ ही लोगों के हृदय में आस्था के भाव विद्यमान हैं जो मनुष्य को सद्मार्ग पर ले जाते हैं। भारत के संदर्भ में जब हम देखते हैं तो हम पाते हैं कि यहां की सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और सामाजिक परम्परायें, यदि आज जीवित है तो इसलिए कि यहां परस्पर प्रेम, श्रद्धा,भक्ति और आस्था जैसे भावों के प्रति समाज में आदर और सम्मान की मजबूत भावनाओं ने इंसान को इंसान से और सामाजिक और सांस्कृतिक मर्यादाओं से जोड़े रखा है।

                  र्म, सांस्कृतिक और सामाजिकता की परम्पराओं के संरक्षण में जनआस्था का बहुत बड़ा योगदान देखा जाता है। विभिन्न पर्वों, उत्सवों और त्यौहारों के अवसर पर आस्था के भावों का सैलाब देखा जा सकता है। देश की पवित्र नदियों के घाट, नदियों के संगम और सरोवरों पर इन पर्वों के अवसर पर श्रद्धा और भक्ति के भावों को मूर्तरूप में देखा जा सकता है। धार्मिक स्थलों पर विभिन्न धर्मावलंबियों की भीड़, तीर्थयात्रियों के समूह के समूह तथा कथा प्रवचनों और विभिन्न अनुष्ठानों में जनउपस्थिति इस बात को प्रमाणित करती है कि मनुष्य जीवन में आस्था के भाव का कितना अधिक महत्व है। हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं के प्रति आस्था के भाव तब देखने को मिलते है जब किसी पवित्र नदी या किसी धार्मिक स्थल से हम गुजरते हैं। ऐसे अवसरों पर आस्थावान व्यक्ति, पवित्र नदियों और धार्मिक स्थलों में सिक्का चढ़ाते देखे जाते हैं। दुनिया का प्रगतिशील समाज भी आस्था के वशीभूत देखा जाता है। इसका उदाहरण यूरोप के रोम शहर में देखने को मिलता है यहां शहर में एक ऐसा कुआंनुमा जलाशय है, जिसके किनारे की दीवाल पर कुये की ओर पीठ करके लोग बैठ जाते हैं और कुये में सिक्का उछालकर पीछे की तरफ से डाल देते हैं। यह सिक्का किसी भी देश की मुद्रा का हो सकता है। लोगों में ऐसी आस्था है कि (आंख मूंदकर पीछे की तरफ कुये में सिक्का उछालने से) जो भी आपकी मनौतियां हैं उसका नाम लेकर मनोकामना पूण्र् हो जाती है। इसी तरह प्रगति देशों में कई स्थलों पर आस्था के प्रदर्शन के उदाहरण देखने को मिलते हैं।

? राजेन्द्र जोशी