संस्करण: 04 मार्च-2013

एनसीटीसी पर भाजपा की

दोहरी नीति या डर?

? विवेकानंद

               तंकी हमलों से लेकर व्यापारिक गतिविधियों तक ऐसा कोई क्षेत्र नहीं दिखाई देता जहां भारतीय जनता पार्टी एक मत पर अडिग दिखाई देती हो। यह अच्छे विपक्ष की निशानी नहीं है। विपक्ष समानांतर सत्ता का केंद्र होता है, जो सरकार के कामकाज पर नजर रखता है, जिसकी देश के प्रति उतनी ही जिम्मेदार बनती है जितनी कि सत्ता पक्ष की। लेकिन भारतीय जनता पार्टी अपने इस दायित्व से दूर, सत्ता कैसे हासिल की जाए इस प्रयास में लगी रहती है। और यह प्रयास उसे प्रेरित करता है कि वह झूठा सच्चा जैसा भी हो सरकार का विरोध करे, ताकि सरकार के खिलाफ नकारात्मक माहौल पैदा हो और उसका लाभ उठाया जाए। पिछले चार वर्षों में एक भी वाकया ऐसा नहीं है जब भाजपा ने दलगत नीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित के लिए सरकार की आवाज से आवाज मिलाई हो। कई मौके तो ऐसे आए जब भाजपा अपनी सुविधा के हिसाब से अपनी ही नीतियों और नियमों से फिरती नजर आई।

               हैदराबाद ब्लास्ट को लेकर भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही है। प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते यह उसका अधिकार भी है और दायित्व भी है। लेकिन घटना में राजनीतिक हित देखने के कारण भाजपा का दायित्व दूषित हो जाता है। आतंकी घटनाएं केवल पिछले 9 साल में ही नहीं हुई हैं। इससे पहले भी हुई हैं, लिहाजा हैदराबाद की घटना को किन्हीं दो व्यक्तियों के बयान से जोडने का क्या औचित्य था यह समझ से परे है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने जहां ब्लस्ट को ओवैसी से जोड़ा, वहीं वैंकया नायडू इसे अप्रत्यक्ष रूप से गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के बयान से जोड़ते नजर आए। जो कम से कम इस मौके पर तो नहीं होना चाहिए था। और सुषमा स्वराज जैसी विदुषि नेत्री से तो इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। क्योंकि ओवैसी ने यदि पुलिस को हटाने वाला बयान दिया था तो प्रवीण तोगडिया ने भी पुलिस के हटने के बाद क्या-क्या हुआ जैसा बयान दिया था। दोनों ही स्थितियों में आखिर हटना तो पुलिस को ही है, फिर संदेह एक पर क्यों? बहरहाल यहां विषय यह नहीं है कि मामला किससे जुड़ा है और किससे नहीं। यहां विषय है कि आखिर आतंकी वारदातों पर लगाम लगाने के लिए एक राष्ट्रीय नीति क्या हो? एनएसजी, एनआईए जैसी जांच एजेंसियां आतंकी हमलों के बाद अस्तित्व में आईं, लेकिन इनका संचालन अभी भी दिल्ली से हो रहा है। देश में इनका व्यापक तंत्र नहीं है, इसलिए कई मोर्चों पर एजेंसियां फेल दिखाई देती हैं। वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने गृह मंत्री रहते हुए एक ऐसी एजेंसी की कल्पना की थी जिसका देश में व्यापक नेटवर्क हो, जो सूचनाओं का आदान प्रदान करे और आतंकी गतिविधियों से जुड़े लोगों पर नजर रखे। इसे उन्होंने नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर यानी एनसीटीसी नाम दिया था। अपराध शास्त्र के कई अनुभवी अफसरों का कहना है कि एनसीटीसी आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाने में सहायक हो सकती है। पुलिस और खुफिया एजेंसियों में काम कर चुके अफसर तो खुलकर एनसीटीसी का समर्थन कर रहे हैं। आईबी के पूर्व प्रमुख अरुण भगत और दिल्ली पुलिस के पूर्व कमिश्नर अजय राज शर्मा का साफ तौर पर मानना है कि देश में आतंकवादियों के मंसूबों को नाकाम करने के लिए इसकी सख्त जरूरत है। खुफिया एजेंसियों और पुलिस के कामकाज को बारीकी से समझने वाले इन पूर्व अधिकारियों का मानना है कि अगर देश में एनसीटीसी होता तो पहले से मिली खुफिया सूचनाओं का बेहतर इस्तेमाल होता, जिससे हैदराबाद के दिलसुखनगर में हुए धमाकों को रोकने में यकीनन मदद मिल सकती थी। लेकिन भाजपा और गैरकांग्रेस शासित राज्यों के विरोध के चलते यह मामला ठंडे बस्ते में पड़ा है। हालांकि हैदराबाद आतंकी धमाके के बाद समाजवादी पार्टी को एनसीटीसी का महत्व समझ में आया है, लेकिन अन्य दलों खासतौर से भाजपा शासित राज्यों के अलावा ममता बनर्जी, जयललिता और नवीन पटनायक को इस पर खास आपत्ति है। इस आपत्ति का आधार है देश का संघीय ढांचा। यह समझना बड़ा ही मुश्किल है कि ढांचा बचाना आवश्यक है या देश? यदि किसी आतंकी गतिविधियों में शामिल व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है तो क्या महत्वपूर्ण है, उसकी गिरफ्तारी या यह कि उसे गिरफ्तार करने वाला कौन है? और इसमें राज्यों के हितों पर अतिक्रमण कहां से होता है? दूसरी बात यदि राज्यों के हितों की चिंता है और कानून व्यवस्था राज्यों का ही अधिकार है तो फिर किसी आतंकीवारदात को न रोक पाने की जिम्मेदारी राज्य ही क्यों नहीं उठाते?

              यही है आतंक पर विपक्ष की दोहरी नीति, न तो वह राष्ट्रीय स्तर पर किसी ठोस नीति पर काम होने देना चाहता है और न ही और न ही जिम्मेदारी लेने को तैयार है। इसके विपरीत राज्यों के अधिकारों पर अतिक्रमण की अफवाह फैलाकर लोगों को भ्रमित करता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि गृह मंत्री शिंदे ने जयपुर में जो कहा था वह सही हो। मैं व्यक्तिगत रूप से आतंक को कोई नाम या रंग देने के खिलाफ हूं, लेकिन भाजपा जिस तरह से एनसीटीसी को गिरफ्तारी के अधिकार का विरोध करती है उससे यही सवाल उठता है कि आखिर उसे किस की गिरफ्तारी का डर है। अन्यथा जब पिछले राज्यों ने जब एनसीटीसी का विरोध किया था तब तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने राज्यों को लिखे पत्र में स्पष्ट रूप से इस बात का उल्लेख किया था कि एनसीटीसी का अपरेशन विंग अगर किसी राज्य में आतंकियों के खिलाफ कोई कार्रवाई करती है, तो गिरफ्तारी के तुरंत बाद गिरफ्तार किए गए आतंकी को स्थानीय पुलिस को ही सौंपा जाएगा और मुकदमा भी वहीं पर चलेगा। ऐसे में यह एनसीटीसी राज्यों को आतंकवाद से लडने में मदद ही करेगी, न कि उनके अधिकार क्षेत्र में दखल देगी। इसके बाद भाजपा या किसी अन्य राज्य के लिए शंका की जगह कहां बचती है? और कैसे राज्य के अधिकारों का अतिक्रमण होता है? बावजूद इसके  विरोध करने वाले राज्यों ने मीडिया में जोर-शोर से यह प्रचारित किया कि केंद्र सरकार राज्यों के अधिकारों में दखल दे रही है और संघीय ढांचे को नष्ट कर रही है। और अब जबकि हैदराबाद धमाका सामने हैं और गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने एक बार फिर एनसीटीसी का मामला उठाया है तब भाजपा सरकार को सीख दे रही है कि उसे धमाकों पर राजनीति नहीं करना चाहिए। लेकिन एनसीटीसी पर उसे आज भी परहेज है।

                बहरहाल यह कोई पहला मामला नहीं है जहां विपक्ष ने दोहरी राजनीति का प्रदर्शन किया हो। विदेशी निवेश को लेकर पार्टी का यही रवैया रहा। खुदरा बाजार में विदेशी निवेश एनडीए सरकार में जनता के लिए हितकारी था, लेकिन विपक्ष में आते ही यह जनता के लिए अहितकारी हो गया। रामसेतु परियोजना भी एनडीए कार्यकाल में शुरू हुई थी, तब न तो आस्था आड़े आ रही थी न परंपरा, लेकिन जब यूपीए सरकार ने इसे आगे बढ़ाया तब यह आस्था का प्रश्न बन गया। गाधी परिवार पर वंशवाद का आरोप लगाना भाजपा जन्मसिद्ध अधिकार समझती है। भाजपा ही नहीं शिवसेना जैसे उसके सहयोगी दल भी यही राग अलापते हैं। जबकि शिवसेना पूरी तरह से ठाकरे खानदान की मिल्कियत बनी हुई है और भाजपा नेताओं की संतानें लगातार राजनीति में आमाद दे रही हैं। हाल ही में उत्तरप्रदेश के पार्टी अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने अपनी नई टीम की घोषणा की जिसमें नेताओं के पुत्रों को भरपूर स्थान दिया गया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को जहां महामंत्री बनाया गया है, वहीं कल्याण सिंह और लालजी टंडन के बेटे को भी जगह मिली है। गोपाल टंडन और राजबीर सिंह को प्रदेश उपाध्यक्ष  के खिताब से नवाजा गया है। यह दोहरी राजनीति भाजपा को किस दिशा में ले जाएगी और जनता इस पर कितना भरोसा करेगी भगवान ही मालिक है।

? विवेकानंद