संस्करण: 04 मार्च-2013

अगर बीजेपी ने मोदी को प्रधानमंत्री

पद का दावेदार बनाया तो अलग थलग पड़ जायेगी

? शेष नारायण सिंह

            कांग्रेस के जयपुर चिंतन शिविर में जब राहुल गाधी को पार्टी का उपाध्यक्ष  बनाया गया तो हर रंग के कांग्रेसी ने उनको प्रधान मंत्री बनाने की राग में बात करना शुरू कर दिया । हद तो तब हो गयी जब उसी मंच पर मौजूद प्रधानमंत्री ड मनमोहन सिंह की मौजूदगी की परवाह न करते हुए कांग्रेसियों ने राहुल गाधी को प्रधान मंत्री बनाने की मांग करते हुए नारे लगाना शुरू कर दिया । ऐसा माहौल बन गया कि लगने लगा कि अब कांग्रेस का एक सूत्री कार्यक्रम राहुल गाधी को प्रधानमंत्री बनाना ही रह गया है।

             उपाध्यक्ष  बनने के बाद दिल्ली में राज्यों के कांग्रेसी मुख्य मंत्रियों , विधान मंडल में कांग्रेस पार्टी के नेताओं और राज्य अध्यक्षों की बैठक में भी उत्तराखंड केमुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने राग प्रधानमंत्री का आलाप लिया । संतोष की बात यह है कि राहुल गाधी ने उनको फटकार दिया और यह बात वहीं बंद हो गयी। एक  हफ्ते से अधिक वक्त हो गया है और किसी कांग्रेसी का किसी भी अखबार में राहुल गाधी कोप्रधान मंत्री बनाने वाला बयान नहीं छपा है । यह देश की राजनीति के लिए सुकून की बात है कि देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के नेता और कार्यकर्ता फिजूल की बातों में समय नहीं लगा रहे हैं । सच्ची बात यह है कि अगर 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस इस स्थिति में रही कि वह अपने उम्मीदवार को प्रधानमंत्री बनवा सके तो वह राहुल गांधी समेत किसी को भी प्रधानमंत्री बनवा सकती है ।वह उनका अपना मामला है ।

             लेकिन देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी वाले अभी भी प्रधानमंत्री बनवाने वाले खेल में पूरी तरह से तल्लीन हैं । मीडिया में मौजूद  मोदी के मित्रों की मदद से नरेंद्र मोदी को प्रधान मंत्री बनवाने का अभियान प्रतिदिन रफ्तार पकड़ रहा है । टेलीविजन में भी नरेंद्र मोदी के समर्थक दिन रात इसी  कार्यक्रम में लगे हुए हैं । हालांकि इस बात की कोई संभावना नहीं  है कि बीजेपी को देश के अगले प्रधानमंत्री के चुनाव में कोई प्रभावशाली भूमिका मिलने वाली है ।जब एन डी ए के नेता के रूप में  अटल बिहारी वाजपेयी प्रधान मंत्री बने थे तो उनको बीस से ज्यादा राजनीतिक  पार्टियों का समर्थन हासिल था ।बीजेपी के अलावा उनके समर्थन में जनता दल यूनाइटेड,अकली दल,असं गन परिषद ,नागालैंड पीपुल्स फ्रंट,उत्तराखंड क्रान्ति दल,जनता पार्टीआल झारखण्ड स्टूडेंट्स युनियन ,महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी ,हरियाणा जनहित कांग्रेस , झारखण्ड मुक्ति मोर्चा , बहुजन समाज पार्टी ,जम्मू-कश्मीर नेश्कान्फरेंस,लोक जनशक्ति पार्टी ,एम डी एम के,डी एम के ,पी एम के ,इन्डियन  फेडरल डेमोक्रेटिक पार्टी, तृणमूल कांग्रेस , बीजू जनता दल ,इन्डियन नेशनल लोक दल , राष्ट्रीय लोक दल । तेलुगु देशम , शिव सेना आदि के सहयोग से बीजेपसत्ताधारी पार्टी  बनने में सफल हुई थी। इसमें से बहुत सारी पार्टियां 2004 के चुनावों में शून्य पर पंहुच गयीं । उनके  नेताओं से बात करने पर पता चला है कि वे इसलिए भी तबाह हो गयीं कि उनके समर्थकों में एक बड़ा वर्ग ऐसे लोगों का था जो बीजेपी की राजनीति के विरोधी थेलेकिन जब केन्द्र में सरकार में शामिल होने का मौका मिला तो वे पार्टियां बीजेपी के साथ शामिल हो गयीं । राजनीति के जानकार मानते हैं कि 2014 के चुनाव में अब वे पार्टियां बीजेपी के साथ नहीं जाने वाली हैं ।

              आज की राजनीतिक सच्चाई यह  है कि  केवल शिव सेना और अकाली दल आज बीजेपी के साथ पूरी तरह से हैं । एक अन्य मजबूत सहयोगी नीतीश कुमार की जनता दल(यू )भविष्य में  बीजेपी के साथ नही रहेगी । अगर एकप्रतिशत वे बीजेपी के साथ जाना चाहेगें भी तो नरेंद्र  मोदी के साथ तो बिलकुल नहीं रहेगें । यह बात खुद नीतीश कुमार ने बार बार दोहराई है। ऐसी हालत में नरेंद्र मोदी को प्रधान मंत्री बनाने वालों को देश की भावी राजनीति  की सच्चाई पर गौरकरना जरूरी है ।

             मीडिया में मौजूद नरेंद्र मोदी समर्थकों की उतावली का आलम यह है कि  किसी के बयान को भी नरेंद्र मोदी  को प्रधान मंत्री बनाने वाला बयान साबित करने में किसी तरह का संकोच नहीं करते। पिछले दिनों देवबंद के किसी मौलाना ने कुछ कह दिया जिसे मोदी समर्थकों ने मोदी के समर्थन में दिया गया बयान बता दिया । टी वी  चौनलों पर उन मौलाना साहेब की बातें छाई रहीं ।जोर शोर से  यह प्रचार किया गया कि देवबंद  जैसी जगह से आने वाले इतने बड़े मौलाना ने ऐलान कर दिया है कि मुसलमान अब नरेंद्र मोदी से नफरत नहीं करते , वे मोदी को प्रधान मंत्री के रूप में स्वीकार करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं ।लेकिन जब उन्हीं मौलाना साहेब ने अपनी सफाई देने की कोशिश की तो उनकी बात को आगे बढाने वाले पता नहीं कहाँ गायब हो गए । वे बेचारे छोटे मोटे टी वी चौनलों के जरिये अपनी बात कहने की कोशिश करते पाए जा रहे हैं ।

              मोदी को प्रधान मंत्री बनाने वालों को बहुत जल्दी है और वे बहुत गुस्से में भी हैं । इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि अगर कहीं मोदी के खिलाफ कोई भी बात लिखदी जाती है तो उसके खिलाफ तो टिप्पणियां आती हैंवह गाली गलौज की भाषा अख्तियार कर लेती हैं । आज ही देश के एक बड़े अखबार में नरेंद्र मोदी की तुलना 1933 के बाद के जर्मनी के नेता से करने की कोशिश करने वाला एक लेख छपा है । उसके खिलाफ मोदी समर्थकों का जो अभियान चल  रहा है उस से अंदाज लगाया जा सकता है कि मोदी को प्रधानमंत्री बनाने वाली ब्रिगेड  कितनी असहिष्णु है । अभी पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के पूर्वजज मार्कंडेयकाटजू ने नरेंद्र मोदी के  बारे में एक विश्लेषणात्मक लेख लिख दिया था । बीजेपी आलाकमान के एक नेता ने पार्टी के अधिेंत प्रकाशन में काटजू के खिलाफ अभियान की शुरुआत कर दी ।नतीजा यह हुआ कि बीजेपी का हर छुटभैया नेता इस विवाद में टूट पड़ा और संघ समर्थक मीडिया की मदद से तूफान खडा कर दिया । इस वक्त अगर भारतीय मीडिया के एक बड़े वर्गपर नजर डाली जाए तो समझ में आ जाएगा कि बीजेपी के मोदी  गुट वालों का  कितना प्रभाव है । दिलचस्प बात  यह है कि बीजेपी या आर एस एस ने अभी हर स्तर पर यह बात बार बार दोहराया है कि नरेंद्र मोदी आधिकारिक रूप से प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश नहीं किये गए  हैं। पार्टी के राष्ट्रीय  अध्यक्ष , राजनाथ सिंह ने कई बार  मीडिया के जरिये स्पष्ट कर दिया है कि नरेंद्र मोदी को पार्टी ने प्रधान मंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश नहीं किया है ।पार्टी के सही मंचों पर फैसला लिया जाएगा लेकिन मोदी समर्थकों के पास यह सब सुनने का समय नहीं है । उन्हें  तो प्रधानमंत्री के पद पर मोदी की तैनाती चाहिए ।

               राजनीतिक सच्चाई  यह है कि अगर बीजेपी वाले नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश कर देते हैं तो देश में चुनावकी राजनीति के बहुत सारे समीकरण बदल जायेगें ।बीजेपी के साथ रहकर जिन राजनीतिक पार्टियों ने अपनासब कुछ गँवा दिया है वे किसी भी हालत में बीजेपी के पास नहीं जायेगीं। मुसलमानों के समर्थन से चुनाव जीतने वाली पार्टियां भी बीजेपी के साथ नहीं जायेगीं । 1999से 2004के बीच में बीजेपी के साथ रहकर कई पार्टियों ने अपनी राजनीतिक हैसियत को चौपट किया है । इस लिस्ट में राम विलास पासवान, चंद्र बाबू नायडू जैसे नेता सरे फेहरिस्त हैं।अगर नरेंद्र मोदी को बीजेपी ने आगे कर दिया तो उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में कांग्रेस की मजबूती  की संभावना बहुत ज्यादा  बढ़ जायेगी ।  2007 और 2012 के विधान सभा चुनावों में उत्तर प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को कोई महत्व नहीं दिया लेकिन इन दो चुनावों के बीच जब 2009 का लोक सभा चुनाव हुआ  तो कांग्रेस को अच्छी खासी सीटें मिल गयीं। जानकार बताते हैं कि जनता ने केन्द्र में आर एस एस की संभावित सत्ता  को रोकने के लिए ऐसा किया था। यह बात इस बार भी हो सकती है । वैसे यह भी सच है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति के मौजूदा गणित में भी ऐसा कुछ नहीं है जिस से बीजेपी को सत्ता के करीब जाने में मदद मिलेगी। वहाँ चाहे कांग्रेस जीते या मायावती और मुलायम सिंह यादव , कोई भी  बीजेपी की सरकार नहीं बनवाने वाला है। इसी तरह से ममता बनर्जी ने भी बीजेपी से दूरी बनाकर मुसलमानों का वोटहासिल किया है और आज कल मुख्यमंत्री बनी हुई हैं । उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद मुसलमानों को खुश करने के लिए उनको बहुत सारी सुविधाएँ दी हैं ,उर्दू अखबार वालों को बहुत महत्व दिया है और अपने आपको मुसलमानों का बहुत बड़ा हित चिन्तक साबित करने का अभियान चलाया है । ऐसी हालत में ऐसा नहीं लगता कि वे भविष्य में बीजेपी के साथ जायेगीं क्योंकि अगर उन्होने ऐसा किया तो उनको राजनीतिक रूप से घाटा होने की पूरी आशंका है ।  आन्धर प्रदेश  की पार्टियां तेलुगु देशम और तेलंगाना राष्ट्र समिति वाले भी बीजेपी के साथी बनकर चुनावी मैदान में हार का सामना कर चुके हैं । दोनों  ही पार्टियों के  बड़े नेता कई बार कह चुके हैं कि वे किसी भी हालत में बीजेपी के साथ नहीं जायेगें । बड़े राज्यों में बिहार को भी शामिल किया जा  सकता है जहां नीतीश कुमार, लालू प्रसाद और राम विलास पासवान नरेंद्र मोदी का समर्थन किसी भी हालत में नहीं करेगें।  महाराष्ट्र में शिव सेना  तो बीजेपी की मुख्य समर्थक है लेकिन बाकी कोई भी पार्टी उसके साथ नहीं जाने वाली है । पिछले दिनों शरद पवार की कुछ मुलाकातों के हवाले से माहौल बनाने की कोशिश की गयी कि उनकी पार्टी बीजेपी के साथ जा सकती है लेकिन जब पार्टी के अंदर की राजनीति के जानकारों से बात  हुई तो समझ में आ गया कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है ।ऐसी हालत में  बीजेपी की राजनीति का समर्थन मय प्रदेश, छत्तीस गढ़, गुजरात , राजस्थान । तमिल नाडू और दिल्ली के अलावा कहीं से आने की  संभावना नहीं है । कर्णाटक में बीजेपी का अर्थ पूरी तरह से येदुरप्पा हुआ  करता था । येदुरप्पा की राजनीति के जानकार जानते हैं कि येदुरप्पा के मन में दिल्ली वाले बीजेपी नेताओं के बारे में इतनी तल्खी है कि वे किसी भी हाल में इन लोगों को  समर्थन नहीं देगे।

              कुल मिलाकर जो राजनीतिक हालात विकसित हो रहे हैं उन से साफ संकेत मिल रहे हैं कि देश में परिपक्वता की राजनीति का युग आने वाला है । कांग्रेस में भी अब चापलूसी करने  वालों का महत्व घटने के संकेत साफ नजर आ रहे हैं । प्रधान मंत्री बनाने वालों की मंडली को फटकार बता कर राहुल गाधी ने संगठन को महत्व देने की बात करके अपनी पार्टी की राजनीति को गरिमा देने की कोशिश की है। बीजेपी में भी नितिन गडकरी को हटाकर राजनाथ सिंह को  पार्टी का अध्यक्ष  बनाया  जाना इस बात का संकेत है कि वे नरेंद्र मोदी और उनके समर्थकों की ओर से मीडिया के जरिये चलने वाले अभियानों को उतना महत्व नहीं देने वाले  हैं ।जाहिर है कि  देश में परिपक्व राजनीति का युग आने ही वाला है ।

? शेष नारायण सिंह