संस्करण: 04 मार्च-2013

आपदाग्रस्त किसानों को मिले कर्जमुक्ति उपहार है

? डॉ सुनील शर्मा

               केंद्र सरकार ने किसानों की बेहतरी के लिए 2009 में 74 हजार करोड़ रूपये की कर्जमाफी की सौगात दी थी। तथा केंन्द्र सरकार ने राष्ट्रीयकृत बैंकों,नाबार्ड तथा सहकारी बैंकों के मायम से कृषि ऋण आवंटन की सीमा भी कई गुना बढ़ाई है। वर्ष 2000 की तुलना वर्ष 2012 में यह 755 फीसदी तक बढ़ गई है।किसानों को जीरो फीसदी से लेकर चार फीसदी ब्याज दर पर ऋण उपलब कराने का भी प्रावधान किया है। लेकिन इसका लघु और सीमांत किसान कितना फायदा ले पा रहें हैं यह विचारणीय है। क्योंकि पिछले पन्द्रह सालों में 2 लाख 90 हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं। मप्र में भी प्रतिदिन तीन किसानों द्वारा आत्महत्या करने की बात सामने है। हालॉकि सरकार कभी पारिवारिक विवाद और कभी बीमारी और अन्य कारण बताकर जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करती हैं।लेकिन इन आत्महत्याओं के पीछे मुख्य रूप से आर्थिक कारण ही जिम्मेदार रहता है। क्योंकि आर्थिक परेशानी के चलते ही पारिवारिक विवाद होतें हैं अथवा अर्थाभाव के कारण बीमारी का समुचित ईलाज का अभाव भी आत्मघात को मजबूर कर देता है। वैसे समुचित इलाज का अभाव भी किसानों को असमय ही काल का ग्रास बना देता है। प्रश्न यह है कि सरकार द्वारा किसानो को अर्थाभाव से मुक्ति दिलाने  हेतु इतने प्रयास किये जा रहें हैं लेकिन नतीजा सिफर है आखिर क्यों? तो इसका सीधा सा उत्तर है  -किसानों के लिए आवंटित राशि की बंदरबॉट। सरकार तो किसानों की बेहतरी के लिए समुचित व्यवस्था कर रही है लेकिन आवंटित राशि चाहे वो अनुदान हो या फिर ऋण सबका बंदरबॉट बैंक अधिकारी ,नौकरशाह ,राजनेता और बड़े किसानों द्वारा कर लिया जाता है। जहॉ तक 2009 की कर्जमुक्ति की बात है तो नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ है कि इसमें से कुल राशि का एक तिहाई हिस्सा बंदरबाट में चला गया है। बैंक अधिकारियों ने फर्जी किसानों के नाम पर खाते खोले और सब्सिडी की राशि ढकार गए। और वास्तविक किसान कर्जदार ही रह गए जिनकी जमीने नीलाम की जा रही है।

                  किसानों को कर्ज उपलब कराने वाली किसान क्रेडिट कार्ड जैसी महत्वपूर्ण योजना का लाभ मात्र 6 फीसदी छोटे एवं मयम किसानों को मिला है शेष 94 फीसदी लाभार्थी बड़े प्रभावशाली लोग,कार्पोरेट जगत,और व्यापारी रहें है। यह ऐसा वर्ग है जिसने कभी खेती नहीं की है केवल उसका फायदा उठा कर धन को या तो व्यापार में लगाया या बैंकों में एफ डी कर दी।जिससे जरूरतमंद किसान को आत्महत्या करने मजबूर होना पड़ा।एक आम किसान  के लिए के्रडिट कार्ड का लाभ उठा पाना आकाश से तारे तोड़ने से कम नहीं हैं क्योंकि वो बैंकों की प्राथमिकता में नहीं होते हैं तथा बैंक कर्मचारी,दलाल और सर्च रिपोर्ट बनाने वाले वकीलों की गठजोड़ किसान को इतना तंग कर देते हैं कि वो बैंक  से दूर रहने में ही भलाई समझता है। बैंक अधिकारी किसानों की बजाए उन कर्मचारी और व्यापारी किसानों को क्रेडिट कार्ड की सुविधा उपलब उपलब कराने में दिलचस्पी लेते है जो उस राशि को उसी बैंक में एफडी में डालने तैयार रहते है। वास्तव में नकली किसान बैंक अधिकारी की यह शर्त स्वीकार कर सकता है लेकिन जरूरतमंद किसान के लिए यह सहज नहीं है। किसानों को जीरो प्रतिशत पर कर्ज उपलब कराने की घोषणा कर सरकारें वाहवाही लूटती है लेकिन इसमें समय सीमा की शर्त डाल देती है। प्रश्न ये है कि कितने किसान इस जीरो प्रतिशत के ऋण से लाभांवित हो रहें है। पहली बात तो बैंक अधिकारियों के रवैये के चलते सुपात्रों को यह फायदा नहीं मिलता है दूसरी बात किसानी में उत्पादन की अनिश्चितता के चलते कर्जवापसी हेतु समय समय सीमा की शर्त किसान को या तो साहूकार का कर्जदार बना देती है या फिर बैंक का डिफाल्टर? बढ़ती फसल लागत के कारण किसान आर्थिक रूप से इतना कमजोर हो रहा है वो वगैर ब्याज के 50 हजार के कर्ज को भी सूदखोर के पास जमीन गिरवी रखकर चुकता है। किसानी जोखिम का व्यवसाय है इसमें मिनिटों में किसान के सपने धाराशयी हो जातें है।पाला और ओले जैसी आपदा का कहर किसानों को बर्बाद कर देता है पूरी की पूरी फसल नष्ट हो जाती है ऐसी स्थिति में जब उसके पास खाने को नहीं बचता है तो बैंकों का कर्ज कैसे वापिस कर सकता है?सरकार कर्जवसूली स्थगित करने की वाहवाही लूटती है लेकिन ब्याज चलता रहता है?अगर किसानों को बचाना है तो ऐसे आपदाग्रस्त किसानों को ऋणमुक्ति के साथ नए ऋण की सौगात मिलना चाहिए ताकि वो आत्मघात जैसा कोई कदम न उठा सकें।बैंकों की शाखाओं अपने कार्यक्षेत्र के शतप्रतिशत किसानों को कृषिऋण के क्रेडिट बनाने के लिए लक्ष्य दिया जाना चाहिए। तथा उन्हें आदेशित किया जाए कि छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता से और बगैर परेशान किए कर्ज उपलब कराएॅ।

              यह तय है कि गरीब किसानों को ऋण उपलबता की सुनिश्चित व्यवस्था उन्हें संजीवनी के समान होगी। इससे वो खेती को लाभ के धंधे में परिवर्तर्ित करने में कामयाब होगें। आपदाग्रस्त किसानों को अब भी कर्जमुक्ति का प्रावधान सबसे बड़ा और संबंल देने वाला उपहार है जिसपर योजनाकारों और सरकार को विचार करना चाहिए। इसके साथ ही किसान के हिस्से की सरकारी सहायता और अनुदान राशि की बंदरबॉट न हो सके सरकार को इस बात की सुनिश्चित व्यवस्था करनी चाहिए और आज के डिजीटल युग में यह असंभव नहीं है।

? डॉ सुनील शर्मा