संस्करण: 04 मार्च-2013

8 मार्च विश्व महिला दिवस पर विशेष

नारी-अस्मिता : समूची दुनिया में हाशिए पर

? डॉ ग़ीता गुप्त

                 ज स्त्रीवाद या स्त्री विमर्श एक फैशन बन गया है। हालांकि स्त्री के मुद्दों पर चिंता जतलाने के लिए आन्दोलन भी हो रहे हैं। परन्तु यह कोई नई बात नहीं है।  नारी अस्मिता और उससे जुड़े तमाम सवालों का हल दो सौ से भी अधिक वर्षों से ढूंढ़ा जा रहा है तथापि समस्याएं यथावत् हैं। अठारहवी शताब्दी के मय में ही दुनिया की तमाम स्त्रियों को बराबरी का हक़ दिलवाने की ज़रूरत महसूस की गई और पहली बार 'राइट्स ऑफ विमेन' के मायम से स्त्री-अधिकारों के लिए आवाज़ मुख़र हुई। इंग्लैण्ड की मैरी वोलस्टोन क्राफ्ट पहली महिलावादी थीं जिन्होंने महिला शिक्षा और अधिकारों को लेकर महिला आंदोलन की शुरूआत की। अपनी पुस्तक 'अ विंडीकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ विमेन' में उन्होंने स्त्री के पारिवारिक एवं नागरिक जीवन में अधिकारों व कर्तव्यों को परिभाषित किया है। उन्होंने शोषण से स्त्री की मुक्ति हेतु पुरुषों में बदलाव की आवश्यकता पर बल दिया है।

              स्वीडन की फ्रेडरिका बेमर ने भी 1849 में स्त्री जीवन की विडंबनाओं को स्वयं अनुभव किया। उन्होंने अमेरिका जाकर वहां की स्त्रियों की स्थिति का अययन किया। फिर स्वीडन लौटकर अपना उपन्यास ''हेर्था''लिखा। जिसमेंस्त्री को परम्परागत भूमिका से मुक्त रूप में चित्रित किया। यही उपन्यास स्वीडन की संसद में स्त्रियों के हित में बनाये जाने वाले क़ानूनों का आधार बना। 1791में फ्रांस में ओलिम्पी दे गाज द्वारा महिलाओें के नागरिकअधिकारों पर घोषणापत्र प्रस्तुत किया गया। इसमें स्त्रियों के लिए पुरुषों के समान अधिकारों की घोषणा की गई। भारत में सरोजिनी नायडू पहली ऐसी महिला थीं जिन्होंने एनी बेसेण्ट और अन्य लोगों के साथ मिलकर भारतीय महिला संघ की स्थापना की।

                उन्नीसवीं शताब्दी की महिला आन्दोलनकारियों में फ्रांस की सिमोन द बोउवा का नाम सर्वोपरि है। उनकी पुस्तक 'द सेकेण्ड सेक्स' स्त्री विमर्श की चर्चित कृति है। सिमोन मानती थी'' कि स्त्री का जन्म भी पुरुष की तरह ही होता है मगर परिवार व समाज द्वारा उसमें स्त्रियोचित गुण भर दिए जाते हैं। प्रसिद्ध दार्शनिक ज्यां पाल सार्त्र के साथ बिना विवाह किए संगिनी की तरह रहने वाली सिमोन ने स्त्री अधिकारों और मातृत्व की नयी परिभाषा गढ़ी। 1970 में फ्रांस के नारी मुक्ति आंदोलन में भाग लेने वाली सिमोन स्त्री के लिए पुरुष के समान स्वतंत्रता की पक्षार थीं।

                  प्रसंगवश यहां अमेरिका की रॉबिन मोर्गन, बैटी फ्रीदां, एंड्रिया ड्वार्किन, सुजेन फलूदी और ग्लोरिया स्टीनेम जैसी प्रसिद्ध महिलावादियों का नामोल्लेख उचित है। रॉबिन ने महिला-आन्दोलन पर 'सिस्टरहुड इज़ पावरफुलजैसी चर्चित पुस्तक लिखी। 1960के दशक में वे लेस्बियन के रूप में जानी गईं और महिला मुक्ति आन्दोलन में भी सक्रिय रहीं। बैटी फ्रीदां अमेरिका में राष्ट्रीय महिला संघ की संस्थापक और अध्यक्ष रहीं। उन्होंने अपपुस्तक 'द फेमिनिन मिस्टीक' में गृहिणी शिक्षा पर प्रश्न उठाया। वे गर्भपात-क़ानून की विरोधी और समान अधिकारों की समर्थक थीं। इस विवेचन का आशय यही है कि समान अधिकारों के लिए महिलाओं का संघर्ष नया नहीं है। यह सर्वकालिक और सार्वदेशिक है। महिलाएं चाहे जिस भी नस्ल, वर्ण, जाति, धर्म, संस्कृति या देश की हो, उनके संघर्ष लगभग एक समान हैं।

                 आश्चर्यजनक तो यह है कि स्त्रीवादियों के आन्दोलन की जो लहर पहले पहल अठारहवी शताब्दी के मय में उठी थी, अब तक अपनी मंजिल नहीं पा सकी है। यद्यपि स्त्री की एक नयी छवि अवश्य उभर रही है। सदियों से बांनों में जकड़ी स्त्री अब स्वावलंबी और सबला बनने हेतु सचेष्ट है। अतएव विश्व के अधिकतर देशों में सकल घरेलू उत्पाद में उनकी सक्रिय भागीदारी बढ़ रही है। अमेरिका, कनाड़ा, चीन, ब्राजील, मेक्सिको, युगांडा, भारत और बांग्लादेश जैसे तमाम विकसित व विकासशील देशों में जहां रोजगार सृजन का कार्य व्यापक पैमाने पर हो रहा है, वहां की समृद्धि का आधार स्तंभ महिलाएं हैं। इस महिला श्रम की अनदेखी नहीं की जा सकती। प्रथम विश्व युद्ध के उपरान्त विश्व की आर्थिक एवं सामाजिक उन्नति में महिलाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। लेकिन सभी क्षेत्रों में अपनी क्षमता साबित कर देने के बावजूद समूची दुनिया में आज भी स्त्री हाशिए पर है।

                 मधय एशिया के सबसे बड़े देश ईरान में 36 विश्वविद्यालयों ने 80 अलग-अलग पाठयक्रमों में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है। ऐसे पाठयक्रमों में इंजीनियरिंग,कम्प्यूटर साइन्स,नाभिकीय भौतिकी,अंग्रेजसाहित्य और पुरातत्व जैसे विषय भी शामिल हैं। आर्यों की ज़मीन माने जाने वाले ईरान में स्त्रियों की ज़ुबान पर ताले हैं। उन्हें सिर्फ़ चेहरा खुला रखने की आज़ादी है। वहां कोई महिला संगठन नहीं है, जो महिला अधिकारों की बात करें। कोई महिला राजनेता नहीं है। तीन वर्ष पूर्व विरोधी प्रदर्शन के दौरान एक युवती नेहा आग़ा सुल्तान मारी गई थी तदुपरान्त किसी महिला ने आगे आने की हिम्मत नहीं दिखाई। ईरान की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता शीरीन इबादी ईरान से बाहर रहकर स्त्रियों की आज़ादी की लड़ाई लड़ रही हैं।

                  वैश्विक स्तर पर स्त्री की स्थितियों में अधिक अन्तर नहीं है। हम चाहे सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक या पारिवारिक परिदृश्य की बात करें, हर कहीं स्त्री का शोषण बदस्तूर जारी है। धार्मिक परिदृश्य में झांके तो इस्लामिक कट्टरपंथियों को महिलाओं के प्रति संकीर्णता के लिए अक्सर ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। जैसे, नवनिर्मित व आधुनिक राष्ट्र इज़रायल भी अपनी स्त्रियों को 'पवित्र दीवाल' को पूजने नहीं देता। जबकि 60 वर्ष पूर्व यह प्रतिबां नहीं था। धार्मिक नेता और समाज के ठेकेदार युवतियों के रहन-सहन, परिाधन, संचार साधनों के उपयोग और जीवनसाथी के चयन जैसे सर्वथा निजी मामलों में भी अपनी राय थोपकर उनकी स्वतंत्रता का हनन करते हैं। ग़ौरतलब है कि फ्रांस की राजधानी पेरिस में महिलाओं को पैण्ट पहनने का अधिकार अब जाकर मिल पाया है। फ्रांस सरकार ने दो सौ वर्ष पुरानी पाबंदी हटाकर हाल ही में महिलाओं को परिाधन सम्बंधी यह स्वतंत्रता दी है।

                 यहां सऊदी अरब का जिक्र भी ज़रूरी है। जहां सऊदी औद्योगिक सम्पत्ति प्राधिकरण (मोडोन) को आधुनिक दुनिया के हिसाब से केवल महिलाओं के लिए एक शहर बसाने का काम सौंपा गया है। यह कार्य अगले वर्ष आरंभ होगा। नये शहर में कड़े इस्लामी क़ानून के दायरे में ही महिलाओं को काम करने की अनुमति होगी। हालांकि सऊदी शरिया कानून महिलाओं के काम पर रोक नहीं लगाता किन्तु आंकड़ों से स्पष्ट है कि कार्य स्थल पर महिलाओं की भागीदारी मात्र 15 प्रतिशत है। माना जा रहा है कि अलग शहर की योजना होने से देश के विकास में महिलाएं अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकेंगी। युवतियों को इसमें काफ़ी रोजगार मिलेगा। मोडोन के उप महानिदेशक सालेहअल रशीद के अनुसार, महिलाओं के लिए दूसरे औद्योगिक शहर पर भी काम अब हो रहा है और देश के कई भागों में सिर्फ़ महिलाओं के लिए उद्योग स्थापना की भी योजना है। महिलाओं के लिए पृथक उद्योग धां ध ों की बात तो समझ में आती है लेकिन अलग शहर बसाने की स्थिति में परिवार और विवाह जैसी अवध ारणाओं का क्या होगा ? यह जिज्ञासा स्वाभाविक है।

                 वस्तुत: महिलाओं के संदर्भ में रोज़गार, शिक्षा और क़ानून को लेकर समानता की मांग बेमानी नहीं है। क्योंकि वे हर जगह भेदभाव से पीड़ित हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनड़ीपी) क़े दस्तावेज़ मानविकास रपट से ज्ञात होता है कि समूचे विश्व में महिलाएं शोषण का शिकार हैं। पुरुष प्रधान समाज में उसकी उन्नति के मार्ग में हर क़दम पर अवरोध दिखाई देते हैं। जनसंख्या व विकास पर जब काहिरा में विश्व सम्मेलन हुआ तो धार्मिक पुरोहितों ने गर्भपात और अनचाहे गर्भ को रोकने के लिए सम्मेलन के प्रस्ताव का विरोध किया। फलत: एक स्त्री-हितैषी निर्णय खटाई में पड़ गया। यह भी कटु सत्य है कि संसार के दो तिहाई कठिन परिश्रम वाले कार्य महिलाएं ही करती हैं परन्तु इसके बदले उन्हें बहुत कम पारिश्रमिक मिलता है। उन्हें पुरुषों की आय के दसवें भाग के बराबर मिल पाता है और सम्पत्ति तो बमुश्किल सौ में से एक महिला के नाम पर होती है। दरअसल स्त्री अपने परिवार के लिए अथक परिश्रम करती है पर उसके श्रम को कोई सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं हैं। भारत में तो कर्तव्य और प्रेम की ओट में उसके श्रम की अनदेखी कर दी जाती है।

                   आज नारी का अस्तित्व खतरे में है। यदि हम भारत की बात करें, तो यहां परिवार की व्यवस्था के लिए एक सौभाग्यवती ब्याहता की मांग होती है। मगर कम्पनियों और बाज़ारवादी व्यवस्था को स्वयं निर्णय लेने में सक्षम, स्वावलंबी और सौन्दर्यचेता स्त्री चाहिए। इन दोनों बातों को यान में रखते हुए मीडिया स्त्री की जो छवि रच रहा है वह नकारात्मक अधिक है। नारी मुक्ति आन्दोलन स्त्री की स्वतंत्रता पर बल देता है, जबकि असल मुद्दा यह है कि उसे इंसान के रूप में मान्यता दी जाए। तब उसे पुरुष के समान अधिकारों की मांग अलग से करने की आवश्यकता नहीं रहेगी। देश और समाज के प्रति उसकी भूमिका और उत्तरदायित्व इंसान के रूप में ही सुनिश्चत हो जाएंगे। मगर दु:ख की बात यह है कि भारतीय महिलाओं की स्थिति सरकार के समस्त प्रयासों के बावजूद दयनीय होती जा रही है।

                  आज सबसे बड़ी समस्या स्त्री की स्वतंत्रता की नहीं, सुरक्षा की है। दु धमुंही बच्ची से लेकर वृद्धा तक के साथ बलात्कार हो रहे हैं। समूचे विश्व में स्त्री यौन उत्पीड़न और हिंसा से जूझ रही है। उसकी महत्वाकांक्षाओं के लिए समाज में कोई स्थान नहीं है। उसे इसके लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। आख्धिर कब तक उसकी योग्यता और क्षमता की अवहेलना होती रहेगी ? कब तक उसका शोषण जारी रहेगा ? औपचारिक तौर पर किसी एक दिन 'महिला दिवस' मनाने से उसकी समस्याओं का हल नहीं निकलेगा। अब विश्व महिला दिवस एक विशेष दिन के रूप में मनाने की बजाय ऐसी पहल की जानी चाहिए जिसमें हर दिन महिला अपने को सुरक्षित और सम्मानित महसूस कर सके। अपने देश की उन्नति में एक इन्सान और मज़बूत नागरिक के रूप में योगदान कर सके। अपने स्त्री होने पर गर्व कर सके।

? डॉ ग़ीता गुप्त