संस्करण: 04 मार्च-2013

मोदी की सोशल इंजिनीयरिंग :

मिथक एवम यथार्थ

? सुभाष गाताड़े

               स्पृश्यता की प्रणाली हिन्दुओं के लिए सोने की खान है। इस व्यवस्था के तहत 24 करोड़ हिन्दुओं का मैला ढोने और सफाई करने के लिए 6 करोड अस्पृश्यों को तैनात किया जाता है, जिन्हें ऐसा गन्दा काम करने से उनका धर्म रोकता है। मगर चूंकि यह गन्दा काम किया ही जाना है और फिर उसके लिए अस्पृश्यों से बेहतर कौन होगा ?

              - डा अम्बेडकर

            वर्णाश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत दलितों को उच्चवर्णीय हिन्दुओं का मैला ढोने और उन्हें ताउम्र सफाई करने के लिए मजबूर करने वाली सामाजिक प्रणाली को बेपर्द करनेवाले डा अम्बेडकर के उपरोक्त वक्तव्य की प्रासंगिकता पिछले दिनों नए सिरेसे सूबा गुजरात में जान पड़ी, जब सामाजिक समरसता के नाम पर मोदी सरकार ने अपने ताजा बजट में एक नयी योजना का ऐलान किया।

            खबर आयी कि गुजरात सरकार की तरफ से पिछले दिनों सफाई कर्मचारियों के लिए बजट में एक विशेष प्रावधान किया गया। इसके अन्तर्गत बजट में लगभग 2250लाख रूपयों का प्रावधान इसलिए रखा गया है ताकि सफाई कर्मचारियों को कर्मकाण्ड का प्रशिक्षण दिया जा सके। वैसे इस योजना का ऐलान करते वक्त गुजरात सरकार इस बात को सहसा भूल गयी कि यह उसकी एक पुरानी योजना का ही संशोधित रूप है,जिसके अन्तर्गत अनुसूचित तबके के सदस्यों को धार्मिक कार्यों को अंजाम देने के लिए 'गुरूब्राहमण' का प्रशिक्षण दिया जा रहा है,जिस योजना की विफलता पहले ही प्रमाणित हो चुकी है क्योंकि इसमें प्रशिक्षित लोग रोजगार की तलाश में आज भी भटक रहे हैं।

             गौरतलब था कि जिन दिनों गुजरात सरकार इस योजना का ऐलान कर रही थी, उन्हीं दिनों सूबे की हुकूमत के दलितद्रोही रवैये को उजागर करती दो घटनाएं सामने आयीं। पहली थी अहमदाबाद से महज सौ किलोमीटर दूर ऱान्डुका तहसील के गलसाना ग्राम के पांच सौ दलितों पर कई माह से जारी सामाजिक बहिष्कार की ख़बर। गांव के उंची जातियों ने गांव में बने पांच मन्दिरों में से किसी में भी दलितों के प्रवेश पर पाबन्दी लगा रखी है। राज्य के सामाजिक न्याय महकमे के अधिकारियों द्वारा पिछले दिनों किए गए गांव के दौरे के बाद उनकी पूरी कोशिश इस मामले को दबाने को लेकर थी। दूसरी ख़बर थी थानगढ़ में दलितों के कतलेआम के दोषी पुलिसकर्मियों की चार माह बाद गिरफ्तारी।

              मालूम हो कि सितम्बर माह में गुजरात के सुरेन्द्रनगर के थानगढ़ में पुलिस द्वारा दलितों पर तब गोलीचालन किया गया था, जब वह इलाके में थानगढ नगरपालिका द्वारा आयोजित मेले में स्टाल्स की नीलामी में उनके साथ हुए भेदभाव का विरोध कर रहे थे। इलाके की पिछड़ी जाति भारवाडों द्वारा जब एक दलित युवक की पिटाई की गयी जिसको लेकर उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज की थी। इस शिकायत पर कार्रवाई करने के बजाय पुलिस ने टालमटोल का रवैया अख्तियार किया था और जब दलित उग्र हो उठे तो उन्हें गोलियों से भुना गया था, जिसमें तीन दलित युवाओं की मौत हुई थी। याद रहे दलितों के इस संहार को अंजाम देनेवाले सबइन्स्पेक्टर के पी जाडेजा को बचाने की पुलिस महकमे ने पूरी कोशिश की थी, दलितों पर दंगा करने के केस भी फाइल किए गए थे, अन्तत: जब दलितों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया तभी चार माह से फरार चल रहे तीनों पुलिसकर्मी सलाखों के पीछे भेजे जा सके थे।

              सफाई कर्मचारियों को कर्मकाण्ड का प्रशिक्षण देने की चर्चा जब चली तब यह बात भी सामने आयी कि आखिर मोदी उन्हें करने पड़ते इस अमानवीय पेशे को लेकर क्या सोचते हैं ?किस तरह उन्होंने इस पेशे का महिमामण्डन किया है ? याद रहे कि वर्ष 2007 में जनाब मोदी की एक किताब 'कर्मयोग' का प्रकाशन हुआ था। आई ए एस अधिकारियों के चिन्तन शिविरों में जनाब मोदी द्वारा दिए गए व्याख्यानों का संकलन इसमें किया गया था। यहां उन्होंने दूसरों का मल ढोने, एवं पाखाना साफ करने के वाल्मिकी समुदाय के 'पेशे' को ''आयात्मिकता के अनुभव'' के तौर पर सम्बोधित किया था। उनका कहना था कि ''मैं नहीं मानता कि वे इस काम को महज जीवनयापन के लिए कर रहे हैं। अगर ऐसा होता तो उन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी इस काम को नहीं किया होता क़िसी वक्त उन्हें यह प्रबोधन हुआ होगा कि वाल्मिकी समुदाय का काम है कि समूचे समाज की खुशी के लिए काम करना,इस काम को उन्हें भगवान ने सौंपा है ;और सफाई का यह काम आन्तरिक आयात्मिक गतिविधि के तौर पर जारी रहना चाहिए। इस बात पर यकीन नहीं किया जा सकता कि उनके पूर्वजों के पास अन्य कोई उद्यम करने का विकल्प नहीं रहा होगा। ''गौरतलब है कि जाति प्रथा एवं वर्णाश्रम की अमानवीयता को औचित्य प्रदान करनेवाला उपरोक्त संविधानद्रोही वक्तव्य टाईम्स आफ इण्डिया में नवम्बर मय 2007में प्रकाशित भी हुआ था। यूं तो गुजरात में इस वक्तव्य पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, मगर जब तमिलनाडु में यह समाचार छपा तो वहां दलितों ने इस बात के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किए जिसमें मैला ढोने को ''आयात्मिक अनुभव'' की संज्ञा दी गयी थी। उन्होंने जगह जगह मोदीके पुतलों का दहन किया। अपनी वर्णमानसिकता के उजागर होने के खतरे को देखते हुए जनाब मोदी ने इस किताब की पांच हजार कापियां बाजार से वापस मंगवा लीं, मगर अपनी राय नहीं बदली।

               मोदी सरकार के इस ताजा शिगूफे को लेकर मानवाधिकार कर्मियों का वक्तव्य बताता है कि किस तरह दो साल बाद सफाई कर्मचारियों की एक सभा को सम्बोधित करते हुए उन्होंने सफाई कर्मचारियों के काम को मंदिर के पुरोहित के काम के समकक्ष रखा था। उन्होंने कहा ''जिस तरह पूजा के पहले पुजारी मन्दिर को साफ करता है, आप भी मन्दिर की ही तरह शहर को साफ करते हैं।'' अपने वक्तव्य में मानवाधिकार कर्मी लिखते हैं कि अगर जनाब मोदी सफाई कर्मचारियों को इतना सम्मान देते हैं तो उन्होंने इस काम को तीन हजार रूपए की मामूली तनखाह पर ठेके पर देना क्यों शुरू किया है ? क्यों नहीं इन 'पुजारियों' को स्थायी आधार पर नौकरियां नहीं दी जातीं। अपने मनुवादी चिन्तन को उजागर करनेवाले ऐसे वक्तव्य देने वाले मोदी आखिर कैसे यह समझ पाएंगे कि गटर में काम करनेवाला आदमी किसी आयात्मिक कार्य को अंजाम नहीं दे रहा होता, वह अपनी पेट की आग बुझाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाला रहता है।

            दलित आदिवासियों पर अत्याचार की रोकथाम के लिए बने प्रभावशाली कानून 'अनुसूचित जाति और जनजाति(अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अन्तर्गत यह इलाके के पुलिस आीक्षक की जिम्मेदारी बनती है कि वह अनुसूचित तबके पर हुए अत्याचार की जांच के लिए कमसे कम पुलिस उपाधीक्षक के स्तर के अधिकारी को तैनात करे। दलित-आदिवासियों पर अत्याचार के मामलों में न्याय दिलाने में गुजरात फीसड्डी राज्यों में से एक है, जिसके जड़ में मोदी सरकार की नीतियां एवं चिन्तन साफ झलकता है।

              16 अप्रैल 2004 में गुजरात विधानसभा पटल पर जनाब मोदी से यह प्रश्न पूछा गया था कि क्या यह प्रावधान सही है या नहीं ?जनाब मोदी का जवाब सदन को चौंकानेवाला था। उनका कहना था कि ''इस अधिनियम के नियम 7(1)के अन्तर्गत पुलिस उपाधीक्षक स्तर तक के अधिकारी के तैनाती की बात कही गयी है और जिसके लिए पुलिस आीक्षक की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती।'इसके मायने यही निकलते हैं वह पुलिस सबइन्स्पेक्टर या इन्स्पेक्टर हो सकता है। याद रहे कि इसी लापरवाही के चलते, जिसमें दलित-आदिवासियों पर अत्याचार का मामला पुलिस सबइन्स्पेक्टर को सौंपा गया, तमाम मामले अदालत में खारिज होते हैं। गुजरात के सेन्टर फार सोशल जस्टिस ने 150 ऐसे मामलों का अययन कर बताया था कि ऐसे 95 फीसदी मामलों में अभियुक्त सिर्फ इसी वजह से छूटे हैं क्योंकि अधिकारियों ने मुकदमा दर्ज करने में, जाति प्रमाणपत्र जमा करने में लापरवाही बरती। कई सारे ऐसे मामलों में जहां अभियुक्तों को भारतीय दण्ड विधान के अन्तर्गत दण्डित किया गया, मगर अत्याचार के मामले में वह बेदाग छूटे।

              पिछले दिनों जब गुजरात में पंचायत चुनाव सम्पन्न हो रहे थे तो नाथु वाडला नामक गांव सूर्खियों आया, जिसकी आबादी बमुश्किल एक हजार थी। लगभग 100 दलितों की आबादी वाले इस गांव के चुनाव 2001 के जनगणना रिपोर्ट पर आधारित संचालित होनेवाले थे, जिसमें दलितों की आबादी शून्य दिखाई गयी थी। लाजिम था पंचायत में एक भी सीट आरक्षित नहीं रखी गयी थी। इलाके के दलितों ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ बुलन्द की, वह मोदी सरकार के नुमाइन्दों से भी मिले ; मगर किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी कि गांव की दस फीसदी आबादी को अपने जनतांत्रिक अधिकारों से भी वंचित किया जा रहा है। अन्तत: गुजरात की उच्च अदालत ने 'जनतंत्र के इस माखौल' के खिलाफ हस्तक्षेप कर चुनाव पर स्थगनादेश जारी किया ; तभी प्रक्रिया रूक सकीस्पष्ट है कि कार्पोरेट सम्राटों के लिए पलक पांवड़े बिछानेवाली, उन्हें माटी के मोल जमीनें देने वाली गुजरात सरकार तब खामोश हो जाती है जब वंचित तबकों के सशक्तिकरण का असली मसला सामने आता है। और अपनी नाकामी छिपाने के लिए तरह तरह के शगूफे छोड़ती रहती है, सफाई कर्मचारियों को कर्मकाण्ड का प्रशिक्षण देने की योजना इसी का एक अंग दिखता है।

? सुभाष गाताड़े