संस्करण: 04अगस्त-2008

किसान और कृषि राजनीति

 

चन्द्रशेखर दुबे

भारत एक कृषि प्रधान देश है। भले ही पिछले 15 वर्षों में हमारे आर्थिक विकास की दिशा और दशा बदल गई हो, और कृषि की तुलना में आर्थिक क्षेत्र की दूसरी गतिविधियों ने तेजी से प्रगति करते हुए कृषि को पीछे छोड़ दिया है, लेकिन हमारे लोकतंत्र में चुनावी दृष्टि से आज भी राजनीति में किसान और खेती का मुद्दा महत्वपूर्ण बना हुआ हैं। चुनाव में खेती और कृषि उत्पादन का महत्व चुनाव परिणाम बताते हैं। चुनाव के वर्ष में जब प्रकृति की कृपा से फसल अच्छी हो जाती है तो भोले भाले, ग्रामीण किसान और खेतीहर मजदूर बड़े जोश में सत्ताधारी दल के पक्ष में मतदान करते हैं और यदि फसल खराब हो गई तो सत्ताधारी दल के विरोध में मतदान हो जाता है। भारतीय जनता पार्टी इस तथ्य को भली प्रकार जानती है। इसीलिए उसने हमेशा चुनाव के दौरान किसान और खेती के मुद्दे को अपने धार्मिक साम्प्रदायिक मुद्दों के साथ मिलाकर महत्व दिया है। वर्ष 2003 के दिसम्बर माह में हुए चुनाव में यही हुआ। मध्य प्रदेश में कई क्षेत्रों में मौसम कृषि के प्रतिकूल रहा और ऐसे में प्रकृति से छले गए किसान और खेतीहर मजदूरों ने सत्तधारी दल कांग्रेस पर अपना गुस्सा निकाला। भाजपा ने 2008 के विधानसभा चुनाव के बारे में अनुमान लगा रखा है कि वर्षा अनुकूल होगी और मौसम भी खेती के अनुकूल रहेगा। अत: चुनाव पूर्व उसने सीहोर जिले के गांव जैत के किसान परिवार में जन्में शिवराज सिंह मुख्यमंत्री को ''किसान पुत्र'' और किसान हितैषी के रूप में प्रोजेक्ट किया है। इसमें कुछ गलत नहीं है।

 

भाजपा का प्रचार जोरों पर है और होना भी चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में अपने पक्ष में जनादेश लेने के लिए सभी राजनैतिक दल अपने-अपने तरीके से कोशिश करते हैं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी की किसान और खेती पर केन्द्रीत राजनीति एक छलावा है और मध्यप्रदेश की ग्रामीण जनता को भ्रम में डालने की एक हास्यास्पद कोशिश ही है। सच तो यह है कि तीन मुख्यमंत्री वाली पांच साल की भाजपा सरकार के शासन में किसानों और खेती के हितों की कोई चिन्ता नहीं की गई। चुनाव वर्ष में अचानक मुख्यमंत्री को किसानों की सुधा आई और उन्होंने अपने निवास पर संघ प्रायोजित किसान पंचायत का आयोजन कर कई ढपोरशंखी घोषणाऐं कर डाली, लेकिन उन पर अमल नहीं हुआ। अब जब गांव में बिजली, पानी, रोजगार, जैसी समस्याओं को लेकर चर्चा हो रही है, तब अपनी कृषि राजनीति और किसान हितैषी राजनीति को साम्प्रदायिक धार्मिक भावुक मुद्दों की चादर में लपेटकर गांव में फैलाया जा रहा है।

 

जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा अमरनाथ तीर्थ यात्रियों के लिए सुविधायें, उपलब्धा कराने हेतु राज्य सरकार के श्राइन बोर्ड को भूमि देने की घोषणा और फिर उसे वापिस लेने की कार्यवाही, कोई भड़काऊ मुद्दा नहीं है। सरकार द्वारा अपने ही एक संस्थान को भूमि देने या न देने से न तो अमरनाथ तीर्थ यात्रा रूकने वाली है और न ही तीर्थ यात्रियों की सुख सुविधा के संसाधानों में किसी प्रकार की कोई कमी आने वाली है, बल्कि तीर्थ यात्रियों की सुरक्षा की दृष्टि से यह अच्छा ही हुआ कि अब अमरनाथ तीर्थयात्रा का पूरा इंतजाम अब जम्मू कश्मीर सरकार खुद करेगी। यहां देश की हिन्दू जनता को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि यदि वास्तव में अमरनाथ तीर्थ यात्रियों की सुविधा की भाजपा और संघ परिवार को कोई चिन्ता रही होती, तो 1998 से 2004 तक जब केन्द्र में श्री अटल बिहारी वाजपेयी और श्री लालकृष्ण आडवाणी की सरकार सत्ता में थी, और जम्मू कश्मीर में फारूख अब्दुल्ला की नेशनल कांन्फ्रेंस सरकार सत्ता में थी तब तीर्थ यात्रियों के लिए दोनों सरकारों ने कोई चिन्ता क्यों नहीं की। अब्दुल्ला के बेटे तो वाजपेई-आडवाणी की सरकार में मंत्री भी थे, जो आज श्राईन बोर्ड को जमीन देने के विरोधा में आवाज उठा रहे है औ भाजपा को देश भर में साम्प्रदायिक उन्माद और हिंसा फैलाने का एक मुद्दा सौंपने में मदद कर रहे हैं। गौरक्षा, राममंदिर और दूसरे कई धार्मिक साम्प्रदायिक मामलों को अपने तरीके से उकसा कर भाजपा और संघ परिवार देश की भोली भाली जनता विशेषकर ग्रामीण जनता को भड़काती आई है। लेकिन अब आर्थिक वैश्वीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी के विकास विस्तार के इस दौर में ग्रामीणों और खेतीहरों के हितों कोचोट पहुंचाने वाल ताकते धर्म, जाति के नाम पर उनकी वोट की ताकत को व्यर्थ बरबाद न कर सके।

 

महंगाई का रोना रो रहे भाजपा के नेताओं ने अपनी सरकार की कार गुजारियों और आर्थिक नीतियों पर कभी  ध्यान नहीं दिया। यह सर्वविदित है कि मध्यप्रदेश सरकार की आमदनी का मुख्य जरिया जनता पर टैक्स लगाना ही है। राज्य सरकार के बजट आंकड़े बताते हैं कि राज्य सरकार के कर राजस्व में भाजपा सरकार के पहले तीन वर्षों में 19 प्रतिशत की औसत वार्षिक चक्रवृध्दि दर से वृध्दि हुई है। करों में वृध्दि का सीधा अर्थ है जनता पर कर बोझ लादना और इसका नतीजा है महंगाई। मध्यप्रदेश में डीजल और रसोई गैस पर सबसे ज्यादा टैक्स दरे हैं। पड़ोसी राज्यों में मध्यप्रदेश से कम दर पर इन वस्तुओं पर टैक्स वसूला जाता है। इसी प्रकार खाद्यान्न, तिलहन और दूसरी उपभोक्ता वस्तुओं पर भी विभिन्न टैक्सों की दरे, अन्य राज्यों से ज्यादा हैं। खाद्यान्नों के दाम में यदि कुछ वृध्दि हुई है, तो इसका किसानों को लाभ जरूर मिला है। भारत सरकार ने पहली बार हिम्मत से गेहूं, चावल, मक्का, ज्वार, चना और दलहनों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 50 से 120 रुपये प्रति क्विंटल की दर से वृध्दि की है, जिसका सीधा लाभ किसानों को मिला है। इसके साथ ही गांव का किसान पहले की तुलना में अब शहरी बाजार के छल प्रपंच को ज्यादा समझने लगा है। इसीलिए फल सब्जी उत्पादन किसानों में शहरों के बाजारों के भाव के अनुसार ही अपना उत्पादन बेचना शुरू कर दिया है।

 

इससे किसानों को लाभ हुआ है लेकिन इस लाभ में मध्यप्रदेश सरकार का कोई योगदान नहीं है, बल्कि भाजपा ने खाद्यान्नों, दलहनों और खाद्य तेलों के दाम में वृध्दि का भ्रमक प्रचार कर शहरी उपभोक्ताओं को किसानों के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की है। किसानों को इस साजिश को समझ लेना चाहिए। वर्षों से भारत के किसान अपनी उपजों के लिए लाभदायक समर्थन मूल्य की मांग करते आए है, लेकिन निहित स्वार्थी वेतन भोगी प्रशासन तंत्र, मुनाफा खोर व्यापारी एक संगठित लॉबी बनाकर उपभोक्ताओं के हित बताकर कृषि उपजों के समर्थन मूल्य में वृध्दि का विरोधा करते आए हैं। खुशी की बात है कि पहली बार भारत के प्रधानमंत्री ने हिम्मत से किसानों के हित में कृषि उपजों के समर्थन मूल्य में वृध्दि की है और निजी कम्पनियों को बाजार से सीधी खरीद की पूरे देश में सुविधा दी है। यह सही है कि सरकारी खरीद कभी भी किसी भी सरकार के समय में निर्दोश नहीं रही है। सरकारी खरीद की व्यवस्था सरकारी कर्मचारियों के भरोसे चलती रही और इसमें किसानों को भारी परेशानी होती थी। इसीलिए इस सरकार ने इस व्यवस्था को बदला है और अब पहले की तुलना में किसानों को अपनी उपज का कुछ ज्यादा मूल्य मिलने लगा है, लेकिन अभी भी किसान संतुष्ट नहीं है। जरूरत है किसान चेतना की और किसानों में अपने हितों के प्रति जागरूक होने की। खुशी की बात है कि पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के किसान अपने हितों के प्रति जागरूक है और वे समय-समय पर सरकार और निहित स्वार्थी तत्वों को अपनी ताकत का एहसास कराते आए हैं।

 

इन राज्यों में किसानों ने अपने हित की राजनीति को ही स्वीकार किया है। जरूरत पड़ने पर उन्होंने कांग्रेस को सबक सिखाया है तो अपने हित के लिए छोटे से क्षेत्रीय दल को सत्ता में बिठाया है लेकिन कभी भाजपा को समर्थन नहीं दिया है। मध्यप्रदेश के किसान को समझ लेना चाहिए कि आज यह राज्य खेती के मामले में देश में सबसे पिछड़ा राज्य है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2004-06 में घटकर 1.42 करोड़ मैट्रिक टन रह गया, और इसके बाद भी अनाज उत्पाद में उल्लेखनीय वृध्दि नहीं हो रही है। यह और भी चिन्ता की बात है कि राज्य के गरीब, आदिवासी, वनवासी और कम उपजाउ कृषि भूमि क्षेत्र में रहने वाले गरीबों का मुख्य सस्ता भोजन को दो, कुटकी का उत्पादन भी राज्य में भाजपा सरकार के दौरान कम हुआ है। वर्ष 2003-04 में राज्य में कोदो कुटकी का फसल क्षेत्र 373000 हेक्टेयर से घटकर 2005-06 में 308000 हेक्टैयर रह गया और उत्पादन 108000 मैट्रिक टन से घटकर 88680 मैट्रिक टन रह गया। इसका अर्थ यही हुआ कि गरीबों के भोजन की इस सरकार को कोई चिन्ता नहीं है।
 

चन्द्रशेखर दुबे